Kalium bichromicum
Constantine Hering द्वारा — हमारी Materia Medica के मार्गदर्शक लक्षण
चिकित्सकों और विद्यार्थियों के लिए ऐतिहासिक संदर्भ। नीचे दिए गए कथन उल्लिखित लेखक की होम्योपैथिक शिक्षाओं को दर्शाते हैं और उपचार की प्रभावशीलता को प्रमाणित नहीं करते। यह पाठ चिकित्सकीय सलाह नहीं है और इसे उचित निदान या देखभाल का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।
पोटैशियम बाइक्रोमेट। K 2 Cr 2 O 7 .
1797 में Vauquelin द्वारा साइबेरिया के सीसा-क्रोमेट से निर्मित खनिज में खोजी गई क्रोमियम धातु से तैयार।
Drysdale ने इसे प्रस्तुत किया और उन्होंने स्वयं तथा Dudgeon, Hamilton, Russell, Wright, Neidhard, Norton, Walker, Taylor, Turner, ऑस्ट्रियाई औषध-परीक्षकों, Berridge एवं अन्य ने इसका व्यापक औषध-परीक्षण किया।
नैदानिक प्राधिकारी।
- सिरदर्द (3 मामले), Drysdale's Monog., p. 39 ; माइग्रेन , Epps, Hom. Rev., vol. 20, p. 679 ; नेत्रगुहा के ऊपर का तंत्रिकाशूल (2 मामले), Drysdale's Monog., p. 39 ; सिर पर उद्भेद , Wright, Drysdale's Monog., p. 50 ; सिर की त्वचा का एक्ज़िमा , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 678 ; सिर पर फोड़े , Drysdale's Monog., p. 50 ; पैनस सहित ट्रेकोमा , Allen, Norton's Oph. Therap., p. 102 ; कॉर्निया और नेत्रश्लेष्मला पर व्रण एवं फुंसियाँ ; कॉर्निया की अपारदर्शिताएँ ; Descemet झिल्ली का शोथ , Norton's Oph. Therap., p. 102 ; स्क्रॉफुलस नेत्रशोथ और कॉर्निया में व्रण (3 मामले), Drysdale's Monog., p. 40 ; प्रतिश्यायी नेत्रशोथ , Drysdale's Monog., p. 40 ; आँखों का रूमैटिक शोथ , Drysdale's Monog., p. 40 ; प्रतिश्यायी और स्क्रॉफुलस नेत्रश्लेष्मलाशोथ , Klauber, Allg. Hom. Ztg., vol. 112, p. 131 ; क्रूपस नेत्रश्लेष्मलाशोथ , Norton's Oph. Therap., 102 ; नेत्रश्लेष्मला के पॉलिप , Fowler, Norton's Oph. Therap., 102 ; नाक बंद होना , Russell, p. 40 ; गंध और स्वाद के लोप सहित जुकाम , Ludbeck, B. J. H., vol. 15, p. 497 ; नाक का प्रतिश्याय , Hawkes, Org., vol. 2, p. 233 ; Miller, Raue's Rec., 1873, p. 80 ; नाक का प्रतिश्याय , Drysdale's Monog., p. 40 ; नाक का जीर्ण प्रतिश्याय , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 676 ; नाक की श्लेष्मकला का जीर्ण शोथ , Goullon, Raue's Rec., 1872, p. 94 ; ओज़ीना , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 210 ; नाक का घातक व्रणीकरण , Ransford, B. J. H., vol. 24, p. 304 ; नाक और गले का सिफिलिटिक रोग , Drysdale's Monog., p. 40 ; नाक के पॉलिप (2 मामले), Watzke, Rück. Kl. Erf., vol. 1, p. 402 ; परागज ज्वर , Black, Drysdale's Monog., p. 43 ; मुखपाक , Pope, B. J. H., vol. 11, p. 691 ; बहरापन सहित बढ़े हुए टॉन्सिल , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 676 ; ग्रासनली का रोग , Hirsch, Rück. Kl. Erf., vol. 5, p. 241 ; गले में पीड़ा , Lippe, B. J. H., vol. 24, p. 249 ; व्रणयुक्त गले की पीड़ा , E. B. N., Hom. Clinics, vol. 4, p. 81 ; सिफिलिटिक गले की पीड़ा , Watzke, Drysdale's Monog., p. 41 ; गले का सिफिलिटिक व्रणीकरण ; जीभ का सिफिलिटिक व्रणीकरण , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 212 ; डिप्थीरिया , Lippe, Hahn. Mo., vol. 1, p. 32 ; N. A. J. H., vol. 14, p. 209 ; p. 216 ; B. J. H., vol. 24, p. 249 ; (4 मामले), Nichol. Times Retros., vol. 3, p. 28 ; माल्ट-मदिराओं का अत्यधिक सेवन , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 211 ; वमन , Drysdale's Monog., p. 41 ; मितली और आमाशय-विकार , Drysdale's Monog., p. 41 ; आमाशय का रोग , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 677 ; Lilienthal, Hah. Mo., vol. 15, p. 98 ; अपच , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 211 ; Hawkes, Raue's Rec., 1875, p. 141 ; Clifton, Hom. Rev., vol. 17, p. 155 ; आमाशय का गोल व्रण , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 211 ; आंत्र-श्लेष्मकला का जीर्ण व्रणीकरण , Hilbers, Drysdale's Monog., p. 42 ; अतिसार , Lippe, Raue's Rec., 1875, p. 146 ; जीर्ण अतिसार , Drysdale's Monog., p. 42 ; पेचिश , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 212 ; जलने के बाद , Drysdale's Monog., p. 43 ; कब्ज़ , Lippe, N. E. M. G., vol. 9, p. 559 ; बवासीर , Drysdale's Monog., p. 43 ; गुर्दों का रोग (2 मामले), Drysdale's Monog., p. 43 ; हैजे में मूत्रावरोध , Drysdale, B. J. H., vol. 7, p. 561, vol. 8, p. 161 ; गर्भावस्था का वमन , Simpson, Raue's Rec., 1885, p. 182 ; स्वरभंग (2 मामले), Drysdale's Monog., p. 44 ; तीव्र स्वरयंत्रशोथ , Teller, Rück. Kl. Erf., vol. 5, p. 739 ; Russel, Drysdale's Monog., p. 46 ; स्वरयंत्र और श्वासनली का जीर्ण शोथ , Black, Drysdale's Monog., pp. 46 and 47 ; ग्रसनीमुख और स्वरयंत्र का रोग , Moore, Drysdale's Monog., p. 41 ; क्रूप , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 208 ; Bayard, Drysdale's Monog., p. 46 ; झिल्लीदार क्रूप (3 मामले), Von Tagen, Trans. Hom. Med. Soc. Pa., 1872, pp. 128, 130 ; डिप्थीरियाजन्य क्रूप (5 मामले), Allegheny Co. Soc., Trans. Hom. Med. Soc. Pa., 1872, pp. 261, 262, 269, 270, 277 ; तीव्र श्वसनी-प्रतिश्याय , p. 47 ; काली खाँसी के बाद श्वसनी के दौरे , Drysdale's Monog., p. 48 ; जीर्ण श्वसनीशोथ , Johnson, Hah. Mo., vol. 7, p. 96 ; खाँसी , Stens, B. J. H., vol. 34, p. 725 ; काली खाँसी , Fischer, B. J. H., vol. 36, p. 366 ; क्षय रोग , Proell, Hah. Mo., vol. 15, p. 96 ; हाथों का इम्पेटिगो , Guernsey, Trans. Hom. M. S. Pa., 1881, p. 156 ; कटिस्नायुशूल , Wilkinson, Raue's Rec., 1870, p. 294 ; Walker, Trans. Hom. Med. Soc. Pa., 1882, p. 162 ; अग्रजंघास्थि में दर्द , Black, Drysdale's Monog., p. 49 ; अस्थ्यावरणशोथ , Drysdale's Monog., p. 47 ; खसरा , Lippe, N. A. J. H., vol. 14, p. 207-8 ; सिफिलिस , Brasol, Allg. Hom. Ztg., vol. 113, p. 89 ; द्वितीयक सिफिलिस , Schlosser, Rück. Kl. Erf., vol. 5, p. 559 ; दुर्दम्य सिफिलिस , Liedbeck, B. J. H., vol. 15, p. 498 ; सिफिलिटिक अस्थ्यावरणशोथ , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 679 ; ल्यूपस , Blake, B. J. H., vol. 32, p. 643 ; Herpes exedens अथवा ल्यूपस , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 677 ; एक्ज़िमा , Drysdale's Monog., p. 50 ; पैपुलयुक्त उद्भेद , Drysdale's Monog., p. 50 ; फुंसीदार उद्भेद , Drysdale's Monog., p. 50 ; शरीर पर उद्भेद , Dudgeon, Drysdale's Monog., p. 50 ; उद्भेद और अस्थ्यावरणशोथ , Drysdale, B. J. H., vol. 15, p. 679.
मन [1]
स्मरणशक्ति की अत्यंत दुर्बलता।
मानव-द्वेष और चिड़चिड़ापन, यहाँ तक कि जीवन से घृणा।
विचारों का बार-बार लोप हो जाना ; किसी वस्तु को निर्बुद्धि भाव से एकटक देखना।
उदासीनता, शिथिलता ; मानसिक या शारीरिक श्रम के प्रति अत्यधिक अनिच्छा।
तनिक-सी झुँझलाहट के बाद उदासीन या खिन्नचित्त, साथ में आमाशय में कष्ट।
चिड़चिड़ा ; खिन्नचित्त।
चलने-फिरने से अरुचि ; लेटने की इच्छा।
छाती से उठती हुई व्याकुलता।
मनुष्यों से भय ; अल्पभाषिता ; मानव-द्वेष।
संवेदन-तंत्र [2]
झुकने पर माथे के आर-पार सिर में हलकापन ; < प्रातःकाल।
बैठे स्थान से उठने पर चक्कर के अचानक, क्षणिक दौरे।
चक्कर, साथ में मितली, वमन की इच्छा ; अधिजठर में दर्द।
सिर में भ्रमित-सा भाव और भारीपन।
सिर का भीतरी भाग [3]
एक आँख के ऊपर माथे में सिरदर्द।
भोजन के शीघ्र बाद आँखों के ऊपर मंद, भारी, धड़कता दर्द, मानो सिर फट जाएगा ; लेटने, सिर को किसी वस्तु से दबाने अथवा खुली हवा में > ; झुकने या इधर-उधर चलने से <।
दर्द दाहिनी अधिनेत्रगुहा-कटक से आरम्भ होकर सिर के एक ओर फैलता है, दिन में जल्दी आता है और दस घंटे तक रहता है, तथा सिर की त्वचा में दुखन छोड़ जाता है। θ नेत्रगुहा के ऊपर का तंत्रिकाशूल।
बाईं कनपटी में दर्द, जो माथे के आर-पार दाईं कनपटी तक तथा दाईं आँख और कपोलास्थि के चारों ओर फैलता है ; दाईं आँख की दृष्टि पूर्णतः चली जाती है और दर्द के समय कपोलास्थि पर फूली हुई सूजन रहती है ; दौरा 9 A. M. पर आरम्भ होकर दोपहर बाद समाप्त हो जाता है। θ नेत्रगुहा के ऊपर का तंत्रिकाशूल।
भौंह के ऊपर तीर मारने जैसे दर्द।
दाईं भौंह के मध्य में तीव्र धड़कता दर्द, जो प्रातः आरम्भ होकर पूरे दिन रहता है और जिसके साथ बिना आराम मिले लगातार उबकाइयाँ तथा भोजन और पित्त का वमन होता है। θ माइग्रेन।
सिर के बाएँ भाग और बाईं आँख के ऊपर दर्द ; रात में < ; छाती के दाएँ भाग में दर्द, जो अंसफलक से घूमते हुए सामने के भाग तक जाता है ; भोजन के बाद अधिजठर में कुतरता दर्द ; मासिक स्राव अल्प ; श्वेतप्रदर। θ सिरदर्द।
कनपटियों में अचानक तीव्र दर्द ; कनपटियों और आँखों के ऊपर बाहर की ओर तीर मारने जैसा दर्द, जो दिन-रात बना रहता है, किंतु रात में कम तीव्र होता है ; झुकने से <, जिससे चक्कर भी आता है ; जुकाम नहीं। θ सिरदर्द।
एक कनपटी में डंक मारने जैसा सिरदर्द।
अंधापन, जिसके बाद तीव्र सिरदर्द होता है, लेटना पड़ता है ; प्रकाश और शोर से अरुचि ; सिरदर्द बढ़ने के साथ दृष्टि लौट आती है।
दृष्टि-तंत्रिका को प्रभावित करने वाला सिरदर्द ; प्रातः आता है, दृष्टि धुँधली रहती है ; दर्द बढ़ने पर दृष्टि की धुँधलाहट घटती है ; सूर्य के साथ आता-जाता है और मितली के साथ होता है।
चक्कर सहित जलता हुआ सिरदर्द, जिसके दौरान सभी वस्तुएँ पीली धुंध में लिपटी हुई प्रतीत होती हैं ; गरम शोरबे से >।
सिर के बाएँ भाग में, गंडास्थि-प्रवर्ध पर तीव्र दर्द ; उस पर लेटने से < ; भीतर और गले की ओर तीर मारने जैसा दर्द ; गला कुछ लाल, किंतु सूजा हुआ नहीं ; आमाशय-संबंधी लक्षण उपस्थित। θ सिरदर्द।
सिर के एक ओर छोटे-छोटे स्थानों पर समय-समय से सिरदर्द के दौरे, जिन्हें उँगली की नोक से ढका जा सकता था ; मितली, डकार, वमन।
चक्कर और मितली सहित आवधिक सिरदर्द, प्रातः जागने पर और सायंकाल भी ; प्रायः दबाव, खुली हवा या खाने से >।
सिर में एक बिंदु पर दर्द।
प्रातः जागने पर माथे और शिखर में दर्द ; बाद में सिर के पिछले भाग तक फैलता है।
नाक से होने वाले स्राव के दब जाने से सिरदर्द।
सिर का बाहरी भाग [4]
नाक की जड़ से बाईं नेत्रगुहा-कमान के साथ आँख के बाहरी कोण तक तीव्र, तीर मारने जैसे दर्द, साथ में धुँधली दृष्टि, मानो आँख पर पपड़ी हो ; प्रातः आरम्भ होता है, दोपहर तक बढ़ता है और शाम की ओर समाप्त हो जाता है।
ललाट का सिरदर्द ; सामान्यतः एक आँख के ऊपर ; दाईं कनपटी में अंतराल से तीर मारने जैसा दर्द।
छोटे-छोटे स्थानों पर अथवा कुछ तंत्रिकाओं के मार्ग के साथ एकतरफा सिरदर्द।
एक ओर झपटते हुए या दुखते दर्द ; इधर-उधर उड़ते दर्द।
सिर के शिखर पर ऐसा दबाव, मानो कोई भार रखा हो।
सिर की हड्डियों में दुखन-सी लगती है ; हड्डियों में तीखी चुभनें। θ रूमैटिक सिरदर्द।
सिर की त्वचा का एक्ज़िमा, जिसमें पूरी त्वचा और नीचे भौंहों तक लाल, छिली हुई थी तथा उससे पतली नमी रिसती थी, जो इधर-उधर सूखकर पीली पपड़ियाँ बना देती थी ; बाल पतले और विरल तथा लगभग सभी झड़ चुके थे ; प्रभावित भागों में अत्यधिक रेंगने, खुजली और तीखी जलन की अनुभूति।
उद्भेद के स्पष्ट सीमांकित चकत्ते, जिनका आकार बहुत भिन्न था, अधिनेत्रगुहा-प्रदेशों से आरम्भ होकर लगभग पूरी सिर की त्वचा को ढक रहे थे ; उद्भेद अनेक अत्यंत छोटे, पास-पास सटे पुटकों से बना था, जो पारदर्शी, चिपचिपे द्रव से भरे थे और फटकर गंदले धूसर रंग की मोटी, परतदार पपड़ियाँ बनाते थे ; उद्भेद के चकत्तों के बीच की त्वचा में न शोथ, न सूजन ; बहुत खुजली ; पलकें आपस में चिपकी हुई और आँख के भीतरी कोण से पीपयुक्त पदार्थ का स्राव ; चेहरे पर उद्भेद के चकत्ते और नथुनों के चारों ओर मोटी पपड़ियाँ ; बाहरी कान अत्यधिक सूजे, लाल और चमकीले, कानों के पीछे त्वचा छिली हुई तथा सीरमी द्रव का प्रचुर स्राव ; गर्दन की त्वचा की सिलवटों में लगभग 1 1/2 इंच लंबे, गहरी दरारों वाले उद्भेद के चकत्ते, साथ में सीरम-पीपयुक्त स्राव ; चिड़चिड़ा, ठीक से विश्राम नहीं करता ; नथुने बंद होने के कारण कठिनाई से दूध चूसता है ; कृशता ; हरा, श्लेष्मायुक्त अतिसार।
उद्भेद कान पर आरम्भ होकर आधे सिर पर फैल गया ; हरिताभ पपड़ियाँ, जिनसे श्वेताभ, गाढ़ा पदार्थ रिसता था।
सिर के पिछले भाग पर दर्दयुक्त छोटे फोड़ों का उद्भेद।
दृष्टि और आँखें [5]
केवल दिन के प्रकाश में प्रकाशभीति ; पलकें खोलने पर वे फड़कती हैं।
आँखों के सामने विभिन्न रंग और चमकीली चिनगारियाँ।
चक्कर सहित जलता हुआ सिरदर्द, जिसके दौरान वस्तुएँ पीले परदे से ढकी हुई प्रतीत होती हैं।
नेत्रगोलक रगड़ने पर दर्द-संवेदनशील, विशेषकर बायाँ ; कलम की नोक दो दिखाई देती है।
दृष्टि धुँधली, अस्पष्ट : सिरदर्द से पहले ; चक्कर के साथ ; सब कुछ पीला दिखाई देने के साथ।
रूपरेखा अस्पष्ट ; आकृतियों को देखने पर वे गायब हो जाती हैं।
दानेदार पलकें, दाईं आँख में पूर्ण पैनस, जिससे उँगलियाँ भी कठिनाई से गिन सकता था, और बाईं आँख में आंशिक पैनस ; पर्याप्त स्राव ; उसे प्रत्येक वस्तु कुछ लाल दिखाई देती थी ; चेहरे के बल लेटने से >। θ पैनस सहित ट्रेकोमा।
अत्यधिक दर्द और प्रकाशभीति सहित रूमैटिक श्वेतपटल-परितारिका-शोथ। θ सिफिलिस।
परितारिका-शोथ के पश्चात् प्रभाव ; चुभते, डंक मारते, भटकते दर्द ; अधिकांशतः बाईं आँख में ; लेंस के अग्र संपुट अथवा कॉर्निया की पिछली भित्ति पर लसीका और वर्णक का जमाव ; प्रकाशभीति शोथ की मात्रा के अनुपात में नहीं ; पलकों का शोफ ; पलकों को रगड़ने की तीव्र इच्छा ; नेत्रश्लेष्मला का रसायुक्त शोफ, जिसमें इधर-उधर छोटे धब्बे नील-चिह्नों जैसे हैं।
कॉर्निया के सुस्त व्रण ; कॉर्निया के चारों ओर फीका वलय।
दाईं आँख में शोथ ; पलकों में व्रण ; कॉर्निया पर व्रण ; हल्का पलक-संकुचन।
प्रकाशभीति और लालिमा के बिना कॉर्निया के व्रण और फुंसियाँ।
सुबह हल्की प्रकाशभीति और पलकें चिपकने के साथ व्रण ; रगड़ने के बाद चुभनयुक्त जलन < ; आँख से डोरीदार स्राव। θ कॉर्निया का व्रणीकरण।
कॉर्निया के ऐसे व्रण जिनमें पार्श्व दिशा में फैलने के बजाय भीतर की ओर धँसने की प्रवृत्ति होती है।
बाएँ कॉर्निया पर छोटी, सफेद, दानेदार फुंसियाँ, चुभने वाले दर्द के साथ।
कॉर्निया पर एक बड़ा अपारदर्शी धब्बा, जिसकी ओर रक्तसंकुल कंजंक्टाइवा से बड़ी लाल रक्तवाहिकाएँ स्वच्छ किनारे को पार करते हुए जाती थीं ; कॉर्निया के चारों ओर नेत्रगोलक पर महीन रक्तसंकुलता का एक क्षेत्र। θ प्रतिश्यायी-गंडमालाजन्य नेत्रशोथ।
दोनों आँखों के नेत्रगोलक और पलकों की कंजंक्टाइवा में बहुत अधिक रक्तसंकुलता ; कॉर्निया के किनारों पर अत्यधिक लालिमा और किनारे पर फ्लिक्टेन्यूल ; कॉर्निया पर कई गहरे व्रण ; अत्यधिक प्रकाशभीति और आँसू बहना ; दर्द नहीं। θ गंडमालाजन्य नेत्रशोथ।
कॉर्निया की लंबे समय तक बनी रहने वाली घनी अपारदर्शिताएँ।
बाएँ कॉर्निया पर फुंसी, जिसके चारों ओर मंद सूजन।
बाईं आँख अत्यधिक रक्तसंकुल ; कॉर्निया धुँधला ; दोनों आँखों में अत्यधिक प्रकाशभीति ; दाईं आँख पर एक पुराना दाग ; पूरे शरीर पर पपड़ीदार एक्ज़िमा ; θ गंडमालाजन्य कंजंक्टिवाइटिस।
क्रूपस कंजंक्टिवाइटिस के हल्के मामले (पूययुक्त और वास्तविक क्रूपस सूजन के बीच की अवस्था), जिनमें छद्मझिल्ली ढीली चिपकी होती है, आसानी से अलग हो जाती है और लिपटकर चिंदियों के रूप में अलग होने की प्रवृत्ति रखती है ; ये चिंदियाँ स्राव के साथ निकलती हैं और उसे डोरीदार रूप देती हैं ; कंजंक्टाइवा में बहुत अधिक सूजन, यहाँ तक कि कीमोसिस भी ; पलकें सूजी हुई और कॉर्निया धुँधला हो सकता है।
Descemet झिल्ली की वास्तविक सूजन ; Descemet झिल्ली में, विशेषकर पुतली के ऊपर, महीन बिंदुनुमा अपारदर्शिताएँ, जबकि आँख में केवल मध्यम उत्तेजना।
परितारिका मटमैली और सुस्त ; कॉर्निया उभरा हुआ दिखाई देता था ; उसके चारों ओर श्वेतपटल में महीन रक्तसंकुलता और कंजंक्टाइवा में भी कुछ रक्तसंकुलता ; दृष्टि अत्यंत धुँधली, मानो जाली लगी हो ; खुले वातावरण के संपर्क में आने पर आँसू बहना ; बाहरी नेत्रकोण में अकड़न ; ऊपरी पलक को छूने पर जलनयुक्त दर्द। θ आमवाती सूजन।
कंजंक्टाइवा में छोटी सफेद फुंसियाँ।
आँखें खोलने पर आँसू बहना और जलन।
दोनों आँखों में खुजली और जलन, आँसू बहना और प्रकाशभीति।
आँखों में जलन।
आँखों में गर्मी और दबाव।
आँखों में गर्मी और लालिमा, उन्हें रगड़ने की इच्छा के साथ।
कंजंक्टाइवा लाल और बड़ी रक्तवाहिकाओं से आच्छादित ; अथवा कीमोसिस, जिसमें यहाँ-वहाँ नीलरक्तस्राव जैसे छोटे धब्बे।
आँखों की सूजन ; कंजंक्टाइवा लाल, रक्तसंकुल और कीमोसिसयुक्त ; बहुत अधिक आँसू बहना ; पलकें लाल और चिपकी हुई, किनारों पर गाढ़े स्राव के साथ।
कंजंक्टिवाइटिस, पलकों और नेत्रगोलक में रक्तसंकुलता ; प्रकाशभीति नहीं ; पढ़ने या आँखों का उपयोग करने से आँखों में दुखन <, उपयोग करने पर चुभनयुक्त जलन के साथ आँसू बहना।
प्रतिश्यायी सूजन, डोरीदार स्राव अथवा अल्प स्राव, सुबह जागने पर <।
आँखों की सूजन, पीले स्राव और सुबह पलकें चिपकने के साथ।
आँख का सफेद भाग मैला-पीला, फूला हुआ और पीले-भूरे बिंदुओं से ढका हुआ।
सुबह पलकें चिपकी हुई ; नेत्रकोणों में पीला स्राव।
पलकों की सूजन ; उन्हें रगड़ने की तीव्र इच्छा।
जागने पर ऊपरी पलकों में भारीपन ; उन्हें खोलने के लिए प्रयास करना पड़ता है।
पलकें लाल, खुजलीयुक्त और स्पर्श-संवेदनशील ; पलक-उपास्थियों में खुरदरापन प्रतीत होता है, जिससे आँखों में रेत होने जैसी अनुभूति होती है ; दानेदार पलकें।
पलकों के किनारे अत्यंत लाल।
पलकों में जलन और सूजन, अत्यधिक फूली हुई ; दानेदार।
पलकों पर बड़ी, तीव्र कणिकाएँ।
ऊपरी पलक की कंजंक्टाइवा से निकलने वाला बड़ा पॉलिप।
श्रवण और कान [6]
बाएँ कान और बाईं कर्णमूल ग्रंथि में सुई-चुभन जैसे दर्द, सिरदर्द के साथ।
बाएँ कान में तीव्र सुई-चुभन जैसे दर्द, जो तालु, सिर के पार्श्व भाग और गर्दन तक फैलते हैं ; ग्रंथियाँ सूजी हुईं, गर्दन छूने पर दर्दनाक।
बाहरी कर्णमार्ग से भीतरी कान तक डंक मारने जैसी अनुभूति।
रात में स्पंदनशील दर्द, पूययुक्त कर्णस्राव ; सुई-चुभन जैसे दर्द मुँह के भीतर अथवा गर्दन में नीचे की ओर फैलते हैं, कर्णमूल ग्रंथि बढ़ी हुई।
रात में कानों में स्पंदनशील दर्द, साथ ही डंक मारने जैसी अनुभूति ; बाहरी कर्णमार्ग सूजा हुआ और शोथयुक्त।
दोनों कानों से गाढ़ा, पीला, दुर्गंधयुक्त स्राव। θ स्कार्लेट ज्वर के बाद।
जीर्ण पूयस्राव ; कर्णपटल में छिद्र ; छिद्र के किनारों का पूर्ण व्रणरोपण ; ऊतक ऐसे दिखाई देते हैं मानो श्लेष्मा-झिल्ली में बदल गए हों और स्राव प्रायः पूय की अपेक्षा अधिक श्लेष्मायुक्त होता है ; स्राव पीला, गाढ़ा और चिपचिपा, इतना कि उसे छिद्र से डोरियों के रूप में खींचा जा सकता है ; छेदनकारी तीव्र दर्द और चुभने जैसी अनुभूतियाँ, जिनका स्थान किसी भी निश्चितता के साथ निर्धारित नहीं किया जा सकता।
कर्णपटल पर शुष्क व्रण, जो तेज सुई-चुभन जैसे दर्द को छोड़कर अन्यथा दर्दरहित हैं।
कानों में तीव्र गुदगुदी और खुजली।
बाएँ कान का बाहरी कर्णमार्ग सूजा हुआ और शोथयुक्त।
बाहरी कानों में लालिमा ; गर्मी और खुजली।
दोनों कानों और आसपास की त्वचा के काफी भाग को ढकने वाला उद्भेदन ; गर्म और खुजलीयुक्त तथा पानी जैसे स्राव का लगातार रिसना। θ एक्ज़िमा।
दाएँ कान की लौ में खुजली, जिससे वह जाग जाता है।
दाईं ओर गलसुआ, होंठ पर।
गंध और नाक [7]
गंधज्ञान का लोप।
नाक से दुर्गंध।
नाक में शुष्कता।
नाक अत्यंत शुष्क, नासास्थियों में दबाव की अनुभूति के साथ।
नाक में दर्दयुक्त शुष्कता ; वायु अत्यंत आसानी से उसमें से निकलती है।
नाक में शुष्कता ; लगातार बंद होने की अनुभूति ; जलन और सूजन की अप्रिय अनुभूति तथा कभी-कभी वास्तविक सूजन ; तनने की अनुभूति, मानो नाक फट जाएगी ; ऊपरी होंठ गर्म ; आँखें प्रभावित ; गर्म तापमान में <, ठंडे तापमान में >। θ नाक की श्लेष्मा-झिल्ली की जीर्ण सूजन।
नाक में शुष्कता, जड़ पर दबावयुक्त अनुभूति, मानो अवरोधयुक्त प्रतिश्याय आरंभ हो रहा हो ; दबावयुक्त दर्द कनपटियों तक फैलता और सिर को प्रभावित करता है।
नाक में अप्रिय अनुभूति, मानो वह सूजी हुई हो, श्लेष्मा-झिल्ली शुष्क ; नाक की भित्तियाँ कड़ी और मखमली लगती हैं।
किसी कठोर पदार्थ की अनुभूति, जो नाक साफ करने को विवश करती है, किंतु कोई स्राव नहीं।
मानो नाक सूजी हुई और कड़ी हो ; लगता है कि किसी गाढ़े पदार्थ को बाहर फूँकना पड़ेगा, किंतु कोई स्राव नहीं ; मानो उससे कोई भारी वजन लटक रहा हो।
मानो नासाछिद्र चर्मपत्र के बने हों।
नाक की जड़ के भीतर जलन और धड़कन ; बाहर से गर्मी और नाड़ी की लय के अनुरूप स्पष्ट स्पंदन ; नाक की जड़ सूजी हुई और गर्म, पर लाल नहीं ; नाक मोटी और भरी हुई प्रतीत होती थी, “नाक से बोलता था” ; भीतर गाढ़ा पदार्थ होने की अनुभूति के कारण बार-बार नाक साफ करने की इच्छा, किंतु कुछ नहीं निकलता था ; नाक शुष्क ; मानो उससे कोई भारी वजन लटक रहा हो।
नाक की जड़ से बाईं नेत्रगुहा की चाप के साथ आँख के बाहरी कोण तक तीव्र, वेग से दौड़ने वाले दर्द, दृष्टि ऐसी धुँधली मानो आँख पर परदा पड़ा हो ; सुबह आरंभ होकर दोपहर तक बढ़ता है और शाम की ओर कम हो जाता है। θ Ozæna।
नाक की जड़ में दबाव और दबावयुक्त दर्द।
नाक की जड़ में मंद दर्द, तीक्ष्ण स्राव के साथ।
नाक में दुखन ; नासापट के निचले (बाहरी) पृष्ठ पर पीली पपड़ी ; नासापृष्ठ छूने पर दर्दनाक।
नाक साफ करने पर दाईं ओर तीव्र सुई-चुभन जैसे दर्द, मानो दो ढीली हड्डियाँ परस्पर रगड़ रही हों।
नाक अत्यधिक भारी लगती है।
नाक में छोड़ी गई साँस गर्म लगती है।
बाएँ नासाछिद्र में बहुत ऊपर, बाल जैसी गुदगुदी।
बार-बार छींकना : सुबह ; खुली हवा में जाने पर।
गर्म, नम मौसम में लगातार नाक सुड़कना।
पानी जैसा स्राव, नाक में अत्यधिक दुखन और स्पर्श-संवेदनशीलता।
दाएँ नासाछिद्र से जलनकारी, त्वचा को छीलने वाला, पानी जैसा स्राव ; नासाछिद्र में सफेद-सी पपड़ियाँ ; नाक की जड़ में दबाव की अनुभूति ; आँखों से पानी आना, हवा में < ; झुकने और सीढ़ियाँ चढ़ने पर चक्कर ; आसानी से सर्दी लगती है। θ नासिकीय प्रतिश्याय।
पानी जैसा स्राव, नाक की लालिमा और सड़ी हुई दुर्गंध के साथ।
नाक से अल्प, तीक्ष्ण, श्लेष्मायुक्त स्राव, जिससे नासापट में जलन होती है।
बहता प्रतिश्याय, जो नाक और होंठ की त्वचा छील देता है ; नासाछिद्र संवेदनशील और व्रणयुक्त ; नासापट पर गोल व्रण अथवा पपड़ियाँ।
नासापट पर छोटा छेदकारी व्रण।
ललाटीय साइनसों की सूजन से कष्ट और भराव।
प्रतिश्याय, नाक की जड़ में दबाव और कसाव के साथ ; शाम को और खुली हवा में < ; सुबह दायाँ नासाछिद्र अवरुद्ध और उससे रक्तस्राव।
कष्टप्रद प्रतिश्याय तथा गंध और स्वाद की संवेदना का लोप ; उपदंश और पारे की बड़ी मात्राओं के बाद।
आँखों और नाक से लगातार स्राव, ललाटीय साइनसों में तीव्र दर्द, कुछ ज्वर और अत्यधिक दुर्बलता ; खाँसी सोने नहीं देती ; रात में हमेशा <।
छींकना, Schneiderian झिल्ली और नासापंखों की लालिमा, रक्तसंकुल आँखें, आँसू बहना, गले में कच्चापन और अत्यधिक शिथिलता। θ परागज ज्वर।
नाक बंद ; विशेषकर ऊपरी भाग, गाढ़े श्लेष्मा को अलग करने में कठिनाई के साथ, जो पश्च नासाछिद्रों से अधिक आसानी से निकलता है।
नासाछिद्रों में ठोस डाटों का बनना।
नाक लगातार गाढ़े श्लेष्मा से भरी रहती है।
नाक में कठोर पपड़ियाँ ; यदि उन्हें कुछ दिन रहने दिया जाए तो आसानी से अलग की जा सकती हैं ; किंतु बहुत शीघ्र खींचकर हटाने पर नाक की जड़ में दुखन और प्रकाश-असहिष्णुता होती है।
नाक से गाढ़े, स्वच्छ श्लेष्मा के बड़े पिंड निकलना ; यदि यह स्राव बंद हो जाए तो उसे तीव्र सिरदर्द होता है ; दर्द पश्चकपाल से ललाट तक।
नासासेतु में चुटकी काटने जैसा दर्द, जोर से दबाने पर > ; नाक से छोटा, गाँठदार स्राव ; इसका बड़ा भाग, जो चिपचिपा और डोरीदार है, पश्च नासाछिद्रों से नीचे गले में जाता है और बड़ी कठिनाई तथा घृणा के साथ खखारकर निकाला जाता है। θ नासिकीय प्रतिश्याय।
डोरीदार, चिपचिपा स्राव, प्रायः पश्च नासाछिद्रों से ; दुर्गंधयुक्त अथवा बिना दुर्गंध का।
नासिकीय प्रतिश्याय, पश्च नासाछिद्रों से तीक्ष्ण अथवा गाढ़े, पीले, डोरीदार स्राव के साथ।
बाएँ नासाछिद्र से गाढ़े पीले पदार्थ का निरंतर स्राव, अधिकतर सुबह जल्दी, और प्रत्येक नई सर्दी के बाद दुर्गंध ; गर्दन के बाएँ भाग की मांसपेशियों से ऊपर सिर के पार्श्व भाग के एक छोटे बिंदु तक तीव्र दर्द, जो नाक साफ करने से उत्पन्न और बढ़ जाता है ; बाएँ नासाछिद्र में आधी ऊँचाई पर तीव्र चुभनयुक्त जलन, जो आँख के नीचे गाल की हड्डी तक फैलती है ; कब्ज ; जीभ सफेद। θ Schneiderian झिल्ली की जीर्ण सूजन।
चिपचिपे, हरे पिंडों अथवा कठोर डाटों का स्राव।
नाक साफ करने पर नाक की दाईं ओर तीव्र चुभन, मानो दो ढीली हड्डियाँ परस्पर रगड़ रही हों ; दुर्गंधयुक्त हरे रंग के पिंडों का बार-बार स्राव, जो पश्च नासाछिद्रों से गुजरते समय अत्यंत अप्रिय स्वाद देते हैं ; दायाँ नासाछिद्र कठोर पिंडों से भरा हुआ ; नासाछिद्रों के बाहरी किनारों पर छोटे व्रण।
श्लेष्मा चिपचिपा, डोरीदार, हरा और रक्तयुक्त ; स्वच्छ पिंडों में निकलता है और स्राव बंद होने पर पश्चकपाल से ललाट तक तीव्र दर्द होता है।
नासाछिद्र शुष्क, कठोर पपड़ी से भरे हुए, जो निकलने पर किनारों पर रक्तयुक्त होती है ; जालिका अस्थि में खुजलीयुक्त दर्द ; crista nasalis अथवा septum narium में ऐसी उत्तेजना, जो प्रायः ऊपरी जबड़े के अस्थ्यावरण को प्रभावित करती है। θ प्रतिश्याय।
रक्त से किंचित रँगी पपड़ियों का स्राव।
भीतरी व्रणीकरण, पतले पानी जैसे स्राव अथवा लचीली डाटों के जमाव के साथ, जिन्हें निकालने पर अत्यधिक दर्द होता है और नाक में बहुत अधिक दुखन रह जाती है।
नासापट की झिल्ली पर अत्यंत छोटे-छोटे व्रण बिखरे हुए।
Septum narium का व्रणीकरण ; पूरी नासिकीय श्लेष्मा-झिल्ली की पूययुक्त सूजन।
पूरा उपास्थिमय नासापट नष्ट और समस्त नासिकीय श्लेष्मा-झिल्ली पूययुक्त सूजन की अवस्था में ; रोग को भूलवश उपदंश समझा गया।
Septum narium व्रणीकरण से पूर्णतः नष्ट।
दाएँ नासाछिद्र में अत्यधिक रक्तवाहिकायुक्त स्पंजी संरचना की सूजन, जो उसे फैलाती और स्पष्टतः ऊपर की ओर बढ़ती थी, अंततः नीचे की ओर भी बढ़कर बाहर निकल आई ; बायाँ नासाछिद्र भी इसी प्रकार प्रभावित हुआ ; alæ nasi के कोमल भाग प्रभावित, किंतु अस्थि-संरचना अप्रभावित ; बहुत ही अल्प और कभी-कभार श्लेष्मा-पूययुक्त स्राव ; दुर्गंध ; कभी-कभी प्रभावित भागों में छेदनकारी तीव्र दर्द के गंभीर दौरे, जिनसे वह चीख उठता था ; अर्बुदों की निरंतर वृद्धि और दबाव से आसपास के कोमल ऊतक अवशोषित हो गए, जिससे बहुत अधिक विकृति हुई ; आवाज कर्कश। θ नाक का घातक व्रणीकरण।
Septum narium का उपदंशजन्य अस्थिक्षय।
दाएँ नासाछिद्र के किनारों पर छोटे व्रण, छूने पर तीव्र जलन।
दाईं अश्रु-अस्थि का एक स्थान सूजा हुआ और स्पंदित ; नासाछिद्र से प्रचुर स्राव।
ललाटीय साइनसों में व्रण, नाक की जड़ और ललाटीय उभारों में तीव्र सिरदर्द के साथ, यदि स्राव रुक जाए।
नासिकीय पॉलिप, हाल में बने हुए अथवा बहुत पुराने।
नाक से गाढ़ा, गहरा लाल रक्तस्राव ; नाड़ी अनियमित, छोटी और संकुचित।
नासिकीय ल्यूपस।
ऊपरी चेहरा [8]
चेहरा : पीला, पीताभ ; लाल, चकत्तों में ; रक्तिम ; भाव चिंतित।
नेत्रकोटर के नीचे, ऊपरी जबड़े की अस्थियों में स्पर्श-संवेदनशीलता।
बाईं ऊपरी जबड़े की अस्थि में कान की ओर जाने वाला तीर-जैसा दर्द।
बाईं कपोल-अस्थि में दबाव के साथ भीतर की ओर तीर-जैसा दर्द ; ऐसा ही दर्द नासिका-सेतु के आर-पार भी ; बारी-बारी से गरमी और ठंड ; खाँसी सुबह < ; बलगम हरिताभ-पीला, कड़वा ; रोने की प्रवृत्ति ; कभी-कभी आँख के ऊपर की अस्थि में तीर-जैसा दर्द ; खाँसने से गाल के पीड़ित भाग में दर्द होता है।
मोटी भूरी पपड़ियाँ, जिनके नीचे पीला पदार्थ बनता था ; बहुत खुजली ; उद्भेद नाक की जड़ से ऊपरी होंठ तक फैला हुआ। θ उपदंशीय उद्भेद।
बीस वर्ष पूर्व नाक की दाईं ओर एक छोटी गुलिका प्रकट हुई ; वह धीरे-धीरे गल गई और व्रण बन गया, जो तब से खाँचों के रूप में धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा तथा पीछे से भरता गया ; अब डेढ़ इंच लंबा एक अनियमित खाँचा उपस्थित है ; इसके अतिरिक्त नाक पर पपड़ियाँ तथा पुराने घावों के स्थान दर्शाने वाले निशान हैं ; कष्टदायक खुजली। θ ल्यूपस।
निचला चेहरा [9]
बाएँ चेहरे और गर्दन में तारों के झनझनाने-जैसी अनुभूति, जिसके बाद जलन होती है, मानो वह अपना विवेक खो रही हो।
बाएँ गाल पर बड़े बादाम के आकार का घाव ; तल साफ और कच्चा ; साफ, पानी-जैसे, अत्यंत गरम और दाहकारी द्रव का विपुल स्राव। θ Herpes exedens अथवा ल्यूपस।
गालों, ललाट और ठोड़ी पर फुंसियाँ, जो पदार्थ रिसे बिना भूरी पपड़ी से ढक जाती हैं ; धोने के बाद खुजली।
चेहरे पर इम्पेटिगो-जैसा उद्भेद ; फुंसियाँ बार-बार बनती हैं, पानी-जैसा मवाद छोड़ती हैं और भूरी पपड़ी छोड़ जाती हैं तथा उनके साथ बहुत खुजली होती है।
ऊपरी होंठ पर पसीना।
निचला होंठ सूजा और फटा हुआ।
दोनों होंठों की श्लैष्मिक सतह पर कठोर किनारों वाले व्रण तथा चुभती-जलती पीड़ा।
निचले जबड़े की शाखाओं में खोदने-जैसा दर्द।
दाईं ओर गलसुआ।
कर्णमूल ग्रंथियाँ सूजी हुईं ; दर्द कानों से ग्रंथियों में जाता है।
दाँत और मसूड़े [10]
दाएँ निचले जबड़े के मसूड़े अत्यधिक सूजे हुए, मैले सफेद रंग के और स्पर्श के प्रति अत्यंत संवेदनशील ; उस ओर के दाँत बहुत ढीले और तनिक-सा दबाव भी सहन नहीं करते ; विपुल लारस्राव ; मुँह के दोनों ओर के मसूड़े असामान्य रूप से संवेदनशील ; कोई भी भोजन चबा नहीं सकता ; तरल भोजन से भी मसूड़ों में बहुत दुखन और जीभ में खुरदरापन महसूस होता है ; जीभ पर मैला लेप, किनारों पर मैला भूरा, मध्य में लाल और क्षुब्ध दिखाई देती है ; गला सूजा और दर्दयुक्त ; मुँह में खट्टा स्वाद ; भोजन करने के बाद कुछ समय तक निरंतर डकारें ; भोजन के बाद ललाट और पश्चकपाल में दुखता हुआ दर्द तथा चक्कर और मूर्छाभास ; वक्ष के निचले भाग में आर-पार हल्का दर्द, जो दोनों अंसफलक के बीच तक फैलता है, विशेषकर खाते समय ; बहुत कमजोर है और दुबला हो गया है। θ Stomacace।
स्वाद, वाणी, जीभ [11]
स्वाद : ताँबे-जैसा ; कुछ मीठा ; खट्टा ; सुबह कड़वा।
जीभ शुष्क, चिकनी, लाल और फटी हुई ; शुष्क तथा लाल।
जीभ चौड़ी और चपटी, किनारे उभरे हुए तथा लगभग सीपी के किनारों-जैसे लहरदार, सतह खुरदरी और पीताभ, शुष्क या नम ; इस पीले खुरदरेपन के नीचे जीभ अत्यंत लाल है, क्योंकि लेप पतला है और लाल आधार पर स्थित है। θ अपच।
जीभ पर लेप : पीताभ-सफेद ; गाढ़ा पीला श्लेष्मा, किनारे लाल और छोटी दर्दयुक्त अल्सरियों से भरे हुए।
जीभ की जड़ की ओर मोटा पीला लेप। θ आमाशय का श्लेष्मल शोथ।
जीभ की पृष्ठ-सतह पर अंकुरिकाएँ बहुत लंबी ; साथ में भूरे रंग का धब्बा।
जीभ पर मोटा भूरा लेप ; जड़ पर मानो मोटा पीला नमदा बिछा हो ; अंकुरिकाएँ उभरी हुईं।
जीभ पर उपदंशीय व्रण ; गहरे ; डंक-जैसी पीड़ा वाले ; आधार पीला।
जीभ के किनारे पर गहरा व्रण।
जीभ में डंक-जैसी और सुई चुभने-जैसी पीड़ाएँ।
जीभ के पिछले भाग और कोमल तालु पर बाल होने की अनुभूति ; खाने या पीने से > नहीं।
मुँह का भीतरी भाग [12]
मुँह में शुष्कता।
मुँह और होंठों में शुष्कता, ठंडा पानी पीने से >।
मुँह और अलिजिह्वा के आसपास गले के ऊपरी भाग में चिपचिपी लार।
लार : बढ़ी हुई, कड़वी, लसदार, झागदार, स्वाद में नमकीन।
तालु के अग्रभाग में जौ के दाने के आकार के अलग-अलग परिसीमित लाल धब्बे, मानो छोटी अल्सरियाँ बनने वाली हों।
मुँह की छत पर व्रण, मृत ऊतक झड़ने के साथ। θ उपदंश।
होंठों की श्लैष्मिक सतह पर कठोर किनारों वाले, चुभती-जलती पीड़ा करने वाले व्रण।
मुखपाकीय व्रण, गहराई तक क्षरणकारी।
मुँह और ग्रसनी-द्वार के उपदंशीय रोग।
तालु और गला [13]
कोमल तालु थोड़ा लाल ; अलिजिह्वा शिथिल, गले में ढेला होने की अनुभूति के साथ, निगलने से > नहीं।
ऐसी अनुभूति मानो कोई अम्लीय, विदाही द्रव पीछे के नासाछिद्रों से होकर तालु पर बह रहा हो, जिससे खाँसी होती है।
अलिजिह्वा में शोफ।
अलिजिह्वा की जड़ पर गहरा, गड्ढेनुमा घाव, जिसके चारों ओर लाल घेरा है और जिसमें पीला, चिपचिपा पदार्थ भरा है ; ग्रसनी-द्वार और तालु रक्तिम, चमकीले या गहरे लाल अथवा ताँबे-जैसे।
अलिजिह्वा और टॉन्सिल लाल, सूजे और दर्दयुक्त, अंततः उनमें व्रण बन जाते हैं।
बच्चों में बहरेपन के साथ टॉन्सिलों की सूजन।
टॉन्सिल सूजे हुए ; जबड़े के कोण के नीचे गर्दन बाहर से मोटी ; Eustachian tubes अवरुद्ध-सी लगती हैं ; बहुत बहरा है ; घड़ी को कान के बहुत पास रखने पर ही सुन सकता था।
बाएँ टॉन्सिल में तीखी, तीर-जैसी पीड़ाएँ, जो कान की ओर फैलती हैं और निगलने से > ; टॉन्सिलों में पूयसंचय।
टॉन्सिलों का मंद, निष्क्रिय बढ़ाव, जिसमें प्रत्यक्ष शोथ बहुत कम होता है ; रोगी का शरीर शिथिल ; श्वेत-कफप्रधान शारीरिक प्रकृति ; जीभ मैली ; नासिका की श्लैष्मिक झिल्ली मोटी और नासाछिद्रों में पपड़ियाँ बनने की प्रवृत्ति।
टॉन्सिलों का उपतीव्र शोथ, ज्वर बहुत कम, किंतु टॉन्सिलों और कोमल तालु पर छोटी अल्सरियाँ बनने की प्रवृत्ति।
टॉन्सिल की मैले लाल रंग की सूजन, निगलने पर तीव्र दर्द ; पूयसंचय नहीं ; ज्वर बहुत कम।
टॉन्सिलों और गले पर व्रण, जिनकी सतह राख-रंगे मृत ऊतक से ढकी हुई लगती थी ; आसपास की श्लैष्मिक झिल्ली गहरी, नीलाभ और सूजी हुई।
सभी वाहिकाओं में रक्तसंकुलता, टॉन्सिलों पर व्रण, अलिजिह्वा पर फुंसियाँ, अलिजिह्वा सूजी और लाल।
ग्रसनी-द्वार में बाल होने की अनुभूति।
मुँह और गले में शुष्कता।
सुबह गले में शुष्कता और जलन ; प्रायः इसके साथ नाक से साँस लेने में असमर्थता।
जीभ बाहर निकालने पर गले का दर्द अधिक।
बहुत अधिक चिपचिपा श्लेष्मा, कभी-कभी गाढ़ा और जिलेटिन-जैसा, सुबह खखारकर निकलता है।
श्लेष्मा इतना लसदार कि ग्रासनली और गले से लंबे धागे की तरह खिंचता है ; लगातार कष्टदायक उबकाई और खाँसी।
गले में अत्यधिक दुखन, निगलने से दर्द बहुत < ; गला कठोर श्लेष्मे से भरा, जिसे वह न निगल सकती थी, न खखारकर निकाल सकती थी ; जीभ बाहर निकालने से दर्द < ; सिर के पार्श्व में दर्द ; बाएँ कान में तीर-जैसा दर्द ; गर्दन का बायाँ भाग स्पर्श से दर्दयुक्त और बहुत सूजा हुआ ; टॉन्सिल, विशेषकर l., बहुत सूजा और शोथयुक्त।
ग्रसनी में जलन, जो आमाशय तक फैलती है ; ठोस पदार्थ निगलने पर दर्द करते हैं और वहाँ कुछ रह जाने-जैसी अनुभूति छोड़ते हैं।
ग्रसनी की पिछली दीवार गहरी लाल, चमकदार और फूली हुई, जिस पर फीकी लाल वाहिकाओं की शाखाएँ दिखाई देती हैं ; मध्य से बाईं ओर एक छोटी दरार, जिससे रक्त रिसता है।
गले के पिछले भाग में दो व्रण, प्रत्येक का व्यास आधे इंच से अधिक, गहरे, पनीर-जैसे पदार्थ से भरे, उभरे किनारों और स्पष्ट सीमाओं वाले ; एक अन्य व्रण कोमल तालु को आर-पार खा चुका था और उससे निरंतर वैसा ही पदार्थ रिसता था जैसा अन्य व्रणों से ; पीला ; कृश ; भूख न लगना ; अत्यंत कमजोर ; "पूरे शरीर में दयनीय अनुभव।" θ व्रणयुक्त गले की दुखन।
ग्रसनी की श्लैष्मिक झिल्ली का पुटकीय बढ़ाव, दीर्घकालिक प्रतिश्याय के साथ, जिसमें श्लेष्मे के कठोर पीले टुकड़े बनते हैं।
ग्रसनी-द्वार और ग्रसनी में व्रण, जिनसे दुर्गंधयुक्त पनीर-जैसी गाँठें निकलती हैं।
ग्रसनी-द्वार में गहराई तक ऊतक खाने वाले व्रण, प्रायः उपदंशीय।
ग्रसनी का दीर्घकालिक व्रण।
टॉन्सिल लाल और व्रणयुक्त ; अलिजिह्वा लगभग नष्ट, केवल बहुत छोटा भाग शेष ; मसूड़ों पर बड़ा व्रण, मैले किनारों और दुर्गंधयुक्त स्राव के साथ धीरे-धीरे आकार में बढ़ता हुआ ; नासिका-पट का विनाश, दुर्गंधयुक्त ozæna, नाक से गाढ़ा मवाद-जैसा स्राव ; पानी पीने पर वह नाक से निकल जाता है ; गर्दन और निचले जबड़े की ग्रंथियाँ बढ़ी हुईं ; निगलने पर तीव्र दर्द ; आवाज कर्कश और अनुनासिक ; कटि के छोटे भाग में असह्य पीड़ाएँ। θ उपदंश।
ग्रसनी-द्वार में बहुत व्यापक व्रण, व्रणयुक्त भागों के आसपास के ऊतक में बहुत लालिमा के साथ ; एक स्थान पर व्रण ने कोमल तालु को छेदकर साफ, अंडाकार छिद्र बना दिया है ; निगलने पर बहुत दर्द ; सुबह खाँसी और गाढ़ा, कालापन लिए श्लेष्मा ; बार-बार गुदगुदी वाली खाँसी ; नाक में सूजन और भरेपन की अनुभूति तथा सड़ी गंध का भान। θ उपदंश।
जेबनुमा गुहाओं से भरा उपदंशीय-पारदजनित गले का घाव।
मुँह और ग्रसनी-द्वार की श्लैष्मिक झिल्ली के स्वस्थ भागों में बढ़ी हुई लालिमा तथा अधिक संवेदनशीलता। θ डिफ्थीराइटिस।
ग्रसनी लाल और सूजी हुई ; टॉन्सिलों पर और उनके बीच मोटी, चिपचिपी, राख-सी धूसर झिल्ली, जो कठोर और लसदार है ; कंठ के ऊपर गाढ़ी गड़गड़ाहट, साथ में ढीली झिल्ली के टुकड़े के फड़फड़ाने-जैसी ध्वनि सुनाई देती है ; चेहरा और विशेषकर ललाट नीलाभ ; नाक पिचकी ; मुँह खिंचा हुआ ; मंद ज्वर ; निगलने में असमर्थ। θ डिफ्थीरिया।
पूरा गला बहुत सूजा हुआ ; मोटी, चिपचिपी झिल्ली दोनों टॉन्सिलों को ढककर ग्रसनी में नीचे तक तथा नासाछिद्रों और आँखों तक फैली हुई ; नाक से दुर्गंधयुक्त स्राव ; कँपकँपी वाली ठंड के बाद शुष्क गरमी ; अत्यंत गहन दुर्बलता। θ डिफ्थीरिया।
डिफ्थीरिया ; छद्म-झिल्ली का दृढ़, मोती-जैसा, फाइब्रिनयुक्त जमाव, जिसके नीचे की ओर कंठ और श्वासनली में फैलने की प्रवृत्ति होती है ; अलिजिह्वा छोटी थैली-जैसी दिखाई देती है, सूजन बहुत, किंतु लालिमा कम।
पूरी ग्रसनी दुर्गंधयुक्त, चिपचिपी, धूसर छद्म-झिल्ली से ढकी हुई ; कर्कश और तीखी शोरयुक्त श्वास ; आवाज आंशिक रूप से बंद ; कठोर खाँसी। θ डिफ्थीरिया।
डिफ्थीरिया के दौरान क्रूपसदृश खाँसी ; कंठच्छद का शीर्ष और दोनों पार्श्व झिल्ली से ढके हुए ; श्वास परिश्रमपूर्ण ; लेट नहीं सकता था ; कठोर खाँसी, जिसमें लंबे, चिपचिपे श्लेष्मे का निष्कासन ; रात में दम घुटने के दौरे ; अत्यधिक तंद्रा। θ डिफ्थीरियाई क्रूप।
दाएँ टॉन्सिल पर धब्बा, क्रूपसदृश खाँसी, मुँह से दुर्गंध, भूख नहीं ; तापमान 101 ; नाड़ी 100। θ डिफ्थीरियाई क्रूप। (दिन में Kali bich. और रात में Spongia)।
तीखी, क्रूपसदृश खाँसी, कभी-कभी सीटी और घरघराहट के साथ ; कठिन श्वास के साथ आवाज खुरदरी और कर्कश, मानो फेफड़ों में रुई ठूँस दी गई हो ; गला बैंगनी, पूरे ग्रसनी-द्वार पर हरिताभ-पीले निःस्राव के अनेक अलग-अलग धब्बे ; जीभ, गाल और मसूड़ों से सड़े मांस-जैसी गंध ; निगलते समय दर्द दाएँ कान तक फैलता है ; बलगम में बार-बार रक्त की धारियाँ ; निःस्राव कठोर, दृढ़ता से चिपका हुआ, ऊपर नासाछिद्रों में और नीचे कंठ में फैलता हुआ ; दूरस्थ श्लैष्मिक झिल्लियों पर डिफ्थीरियाई जमाव बनने की प्रवृत्ति ; अत्यधिक कमजोरी ; क्षयग्रस्त-सा रूप ; सूजी हुई ग्रंथियाँ। θ डिफ्थीरिया।
लगभग अचेत अवस्था ; इस अवस्था से जगाने पर अथवा प्रत्यक्ष निद्रा से जागने पर सबसे अधिक शिकायत करती है या अधिक बुरा अनुभव करती है ; खाँसने अथवा डिफ्थीरियाई जमाव के अलग हुए अंशों को खखारकर निकालने की इच्छा से बार-बार जागती है ; ऐसा प्रयास करते समय कठोर, रस्सी-जैसा, पीला, विवर्ण श्लेष्मा निकालती है ; अत्यधिक दुर्गंध ; जमाव गले, अलिजिह्वा, टॉन्सिलों और यहाँ तक कि मुँह की छत को ढकता है तथा पीताभ-धूसर रंग का है ; आवाज कर्कश हो जाती है ; जीभ या तो बिल्कुल लाल अथवा मोटे पीले पदार्थ से ढकी होती है ; (r.) कर्णमूल ग्रंथि बहुत छोटी है और निगलते समय दर्द प्रभावित ओर के कान तक ऊपर तथा गर्दन में नीचे की ओर तीर की तरह जाता है। θ डिफ्थीरिया।
डिफ्थीरिया : कान का दर्द सूजी हुई कर्णमूल ग्रंथियों और सिर तक फैलता है ; जीभ पर पीला लेप, विशेषकर जड़ पर ; टॉन्सिलों में सुई चुभने-जैसी पीड़ा तथा गले में खुरचने के साथ सिलाई-जैसी चुभनें ; गले में जलन ; Iod. of Mercury के अतिप्रयोग के बाद।
बाएँ कान में हिंसक चुभते दर्द, जो तालू, सिर के उसी ओर तथा गर्दन के उसी ओर तक फैलते थे; गर्दन स्पर्श करने पर दर्दनाक थी और ग्रंथियाँ सूजी हुई थीं। θ डिप्थीरिया।
घायल तालू पर डिप्थीरिया; अत्यधिक शक्तिहीनता; निःस्राव रोटी पर लगी फफूँद जैसा दिखता था; नासाछिद्रों से स्राव।
व्यापक, सुव्यवस्थित निक्षेप, जिससे बहुत खाँसी होती है।
रोग के उस रूप के अनुरूप, जिसमें डिप्थीरियाई निक्षेप में पाया जाने वाला वनस्पति परजीवी spirobacteria जैसा होता है।
भूख, प्यास। इच्छाएँ, अरुचियाँ [14]
भूख नष्ट; प्यास बढ़ी हुई; मैली जीभ; शिथिलता।
बीयर की लालसा; खट्टे पेयों की लालसा, जो बढ़ती जाती है।
मांस से अरुचि।
खाना और पीना [15]
भोजन बोझ की तरह पड़ा रहता है; भरपेट भोजन के बाद ऐसा अनुभव मानो पाचन रुक गया हो। θ अपच।
खाने के तुरंत बाद आमाशय में दबाव और भारीपन। θ अपच।
दोपहर के भोजन के बाद अधिजठर और वक्ष में बाहरी चुभते दर्द, जो स्तनाग्र (पुरुष) तक जाते हैं, तथा दाएँ अधःपर्शु-प्रदेश में भी।
माल्ट-मदिराओं के द्वितीयक दुष्प्रभाव; विशेषतः लागर बीयर के।
हिचकी, डकार, मितली और वमन [16]
दुर्गंधयुक्त डकारें।
वायु की डकारें, जो आमाशय की उस बेचैनी को घटाती हैं मानो उसकी महावक्रता पर वायु बंद होकर अटकी हो।
अचानक मितली।
मितली: चक्कर तथा सिर की ओर रक्त का वेग चढ़ने के साथ पूरे शरीर पर गर्मी का अनुभव; इधर-उधर चलने पर, सुबह, भोजन देखते ही, भोजन के बाद और मलत्याग के बाद <; पीने और धूम्रपान से उत्पन्न; खाने और खुली हवा में >।
मितली, गुदा में जलनयुक्त दर्द और आधे घंटे तक रहने वाले उत्थान के साथ।
चक्कर, जिसके बाद खट्टे, सफेद, श्लेष्मायुक्त द्रव का वमन, साथ में आमाशय में दबाव और जलन। θ आमाशय का व्रण।
खाने के लगभग तुरंत बाद वह अपना सारा भोजन खट्टे रूप में वमन कर देती है; भूख अच्छी; जीभ मध्य में लाल; कड़वा स्वाद; कब्ज।
वमन: खट्टा, अपचित; पित्त का, कड़वा; गुलाबी, लसदार द्रव का; श्लेष्मा और रक्त का; रक्त का, हाथों पर ठंडे पसीने और गर्म चेहरे के साथ; पीले, पूययुक्त श्लेष्मा का।
शराबियों की मितली और वमन।
अधिजठर-गर्त और आमाशय [17]
आमाशय-प्रदेश का फूलना (शाम), परिपूर्णता और दबाव के साथ; कसे हुए वस्त्र सहन नहीं होते; जीभ पीली।
आमाशय में दबाव और भारीपन; खाने के तुरंत बाद।
भोजन आमाशय पर बोझ की तरह पड़ा रहता है; पाचन रुका हुआ।
चौंककर जागता है; अधिजठर-गर्त में गर्मी और रक्त थूकना; 2 A. M.
बेचैनी, दुखन और स्पर्शवेदना के साथ जागा, विशेषतः खड्गाकार उपास्थि के बाईं ओर एक छोटे-से स्थान पर; सिर में एक छोटे-से स्थान पर दर्द।
आमाशय और आँतों में ठंडक का अनुभव।
आमाशय के दर्द और बेचैनी अंगों के दर्द के साथ बारी-बारी से होते हैं।
आमाशय के दर्द खाने के बाद > और गठियावाती दर्द पुनः प्रकट होते हैं; जब आमाशयिक लक्षण किसी भी सीमा तक बढ़ जाते हैं, तब गठियावाती दर्द घट जाते हैं।
आमाशय-मुख का जैविक शूल; डकारें; समुद्री यात्रा जैसी मितली; परिपूर्णता और भारीपन का अनुभव; भोजन के बाद अस्वस्थता; ठिठुरन; अफारा; आमाशय और अधःपर्शु-प्रदेशों में कुतरने वाला, जलनयुक्त और संकुचक दर्द, सुबह और गति के दौरान <, खाने से >।
भोजन के बाद दम घुटना, मानो पूरे ग्रासनली-मार्ग में कोई कठोर वस्तु हो, फिर हिचकी, और उछलना व काँपना मानो आमाशय झटके से ऊपर उठा हो, दर्दरहित; फिर आँतों में कुछ कुतरने जैसा विचित्र अनुभव; भोजन ज्यों-का-त्यों और बिना खट्टेपन के मुँह तक ऊपर आना, पीठ के मध्य भाग में आर-पार दर्द के साथ; कब्ज। θ आमाशयिक रोग।
निरंतर मितली और कभी-कभी वमन; दम घुटने का अनुभव, मानो गले के पिछले भाग में बाल हो, जो अचानक आता और मितली उत्पन्न करता है; अधिजठर में निरंतर फाड़ता दर्द; स्कैपुलाओं के बीच तीखी जलन; खराब स्वाद; जीभ सफेद; उठने पर चक्कर। θ आमाशयिक विकार।
भूख का अभाव; वक्ष में परिपूर्णता, बहुत अधिक वात; सड़े अंडों का स्वाद मुँह में आना, निरंतर मितली के साथ; चर्बीदार मांस से अत्यधिक अरुचि; जीभ लालिमा लिए और खुरदरी; पूरे सिर में तीखे, तीर की तरह दौड़ने वाले, छुरा भोंकने जैसे दर्द, दोपहर बाद और शाम को <; कब्ज; चलते समय पूरे शरीर में गर्मी; आँखें कमजोर; नेत्रगोलकों में दर्द; दिन में उनींदापन और शिथिलता, रात में अनिद्रा; पार्श्वों और पीठ में बार-बार तीखे, तीर की तरह दौड़ने वाले, टीसते दर्द।
इधर-उधर चलने या थोड़ी दूर टहलने पर मितली; आमाशय से गले के गर्त तक उठती मितली का बार-बार अनुभव; चेहरे का पीलापन; मुँह में पानी भरना; ताँबे जैसा स्वाद; मूर्च्छा-जैसी कमजोरी और पूरे शरीर में ठंडक तथा लेटने की इच्छा; अधिजठर में बार-बार दर्द, जो चुभता हुआ पीठ तक जाता है और लगभग आधा घंटा रहता है; प्यास; सुबह जीभ भूरी; आँतों में बहुत अधिक कब्ज; उदर फूला हुआ; निरंतर भूख और खाने की तीव्र लालसा; दूध अनुकूल नहीं पड़ता; लगभग प्रतिदिन सिरदर्द, जो पीछे से आगे की ओर तीर की तरह जाता है; चलने पर दोनों अधःपर्शु-प्रदेशों में दर्द; अत्यधिक शिथिलता तथा शारीरिक और मानसिक परिश्रम से अरुचि; नींद से ताजगी नहीं मिलती। θ आमाशय का रोग।
दाएँ अधःपर्शु-प्रदेश में, अधिजठर की ओर दर्द, स्पर्श और चलने से <; सुबह हरिताभ, पानी-जैसे श्लेष्मा का वमन; जीभ पर मोटी पीली परत; भूख नहीं। θ आमाशयिक अव्यवस्था।
भूख कम, पर बार-बार खाना पड़ता है; अन्यथा उसे मूर्च्छा-जैसी कमजोरी अनुभव होती है; मितली, भोजन के बाद >; अम्लशूल; अधिक वात नहीं; भोजन के बाद डकारें; मुँह में धातु-जैसा स्वाद; भोजन लेते ही आमाशय में दर्द या भार, विशेषतः मांस के बाद; सिरदर्द और चक्कर; कब्ज; मूत्र गहरे रंग का; उदर फूला हुआ; जीभ अत्यधिक लाल और सूखी, किंतु उस पर पीली या भूरी-सी परत; तालू की मेहराबें लाल; मासिक धर्म अनियमित और अत्यधिक; अत्यधिक कमजोरी; स्वस्थ रहने पर भी गठियावात। θ अपच।
बीयर या अन्य माल्ट-मदिराओं के अतिसेवन के दुष्प्रभाव; अधिजठर-गर्त में अत्यधिक भार; वाताधिक्य; भूख न लगना; खाते ही भोजन का दमनकारी बोझ; मितली, मन में अस्पष्टता का अनुभव, विशेषतः सुबह, और श्लेष्मा का वमन; चिड़चिड़ा मिजाज।
6 P. M. पर भोजन करता है और लगभग तीन घंटे बाद मुँह में अम्लयुक्त पानी आता है, लगातार बलगम ऊपर लाता है, आमाशय में बचा हुआ सारा भोजन वमन कर देता है, और मध्यरात्रि से पहले शायद ही कभी सो पाता है, क्योंकि बलगम से उसका दम घुटता है; खाँसी; कब्ज, मल कठोर और कुछ जोर लगाने पर निकलता है। θ आमाशय का रोग।
खाने के एक घंटे बाद मितली के साथ खट्टे भोजन का वमन; अधिजठर-गर्त में पत्थर जैसा दर्द; जीभ सफेद और ढीली; कब्ज; मांस, चाय या कॉफी का तुरंत वमन। θ अपच।
आमाशय की शिकायत, जब यकृत-प्रदेश में दर्द और भीगी-फूली दिखने वाली जीभ हो तथा बहुत अधिक अम्लता या अन्य लक्षण न हों, केवल सामान्य असुविधा और कभी-कभी सफेद मल हो।
अम्लीय वमन के साथ आमाशयिक श्लेष्माशोथ; खाते समय अचानक अपच।
पुराने आमाशयिक श्लेष्माशोथ से अपच और वमन; जीभ पर मोटी, पीली-सी परत।
आमाशय का पुराना श्लेष्माशोथ।
आमाशय और ग्रहणी का व्रणीकरण।
आमाशय का गोल व्रण।
अधःपर्शु-प्रदेश [18]
दाएँ अधःपर्शु-प्रदेश में मंद दर्द या चुभते दर्द, विशेषतः जब वे एक छोटे-से स्थान तक सीमित हों; मिट्टी के रंग का मल; धातु-जैसा स्वाद; सिर में अस्पष्टता।
शाम को दाएँ अधःपर्शु-प्रदेश में हिंसक, टीसता, निरंतर दर्द पकड़ता है, जो उसे नीचे की ओर झुका देता है और अधिजठर से चारों ओर फैलता हुआ कंधे तक जाता है; प्रत्यक्ष सूजन न होने पर भी उसे तुरंत कपड़े उतारने पड़ते हैं; साँस लेने में अत्यधिक दमन; दर्द कई घंटे रहता और किसी मलोत्सर्ग या वायु निकलने के बिना धीरे-धीरे घटता है; कभी-कभी इसके साथ मितली और थोड़ा-सा वमन होता है; जीभ चपटी और परतयुक्त; मलत्याग नियमित; वर्ण पीला नहीं।
दाएँ अधःपर्शु-प्रदेश में एक छोटे-से स्थान पर दर्द; लगभग निरंतर, किंतु बैठने के बाद अचानक गति करने पर तीखे चुभते दर्द तक <; भूख अच्छी और स्वास्थ्य बहुत प्रभावित नहीं।
पसलियों के नीचे अधःपर्शु-प्रदेश में दर्द, जो खाने, दबाव या श्वसन से अप्रभावित रहता है, ठिठुरन अथवा अत्यधिक शारीरिक परिश्रम से <।
दाएँ अधःपर्शु-प्रदेश में निरंतर मंद टीसता दर्द।
पित्त-पथरी के साथ होने वाले दौरों जैसे आक्षेपी दौरे।
यकृत-प्रदेश में मंद, भारी दबाव या चुभते दर्द।
प्लीहा-प्रदेश में चुभते दर्द, जो कटि-प्रदेश तक फैलते हैं, गति या दबाव से <।
उदर और कटि [19]
उदर का वातजन्य ढोल-जैसा फूलना; उदर फूला हुआ लगता है, जिसके बाद डकारें आती हैं।
तनिक-से दबाव के प्रति भी उदर की संवेदनशीलता।
उदर के आर-पार चुभते दर्द, जो मेरुदंड तक फैलते हैं।
खाने के तुरंत बाद चाकुओं से काटने जैसा दर्द; रात में शूल, जो नाभि पर काटने वाले दर्द के साथ बारी-बारी से होता है।
निचली आँतों में काटने वाले दर्द और ऊपरी भाग में वायु की गड़गड़ाहट।
ठंडी हवा के किसी भी संपर्क के बाद नाभि के चारों ओर होने वाला मंद, मरोड़-जैसा दर्द।
खाने के लगभग तुरंत बाद ठंडक और मितली की शिकायत करता है, पीला दिखता है और उदर में दर्द होता है, फिर ज्यों-के-त्यों भोजन का वमन, जो कभी-कभी खट्टा या पित्त से रंगा होता है; वमन से राहत मिलती है; शेष दिन शिथिल और उनींदा रहता है तथा ठंड लगने की शिकायत करता है, यद्यपि शरीर गर्म होता है; उदर में बार-बार मरोड़-जैसे दर्द; जीभ सफेद, परतयुक्त; प्यास; दिन में कई बार मलत्याग; मल पीला-सफेद और तरल। θ जठरांत्रीय उत्तेजना।
आँतों के आवधिक आक्षेपी संकुचन के दौरे, मितली के साथ, जिसके बाद लुगदी-जैसा मल और गुदा में जलन, साथ में मलत्याग की निष्फल हाजत।
आंत्रशोथ जैसा दर्द; पित्तयुक्त, रक्तमिश्रित पदार्थ का एक के बाद एक शीघ्रता से वमन; रक्त चमकीला और थक्केदार; उदासीन, निरपेक्ष, शिथिल मनोदशा। θ आंत्र-अंतःप्रवेशन।
जठरांत्रीय शोथ, यहाँ-वहाँ ऐंठन, पिंडलियों और जाँघों के भीतरी भागों में <।
श्लेष्मकला का पुराना व्रणीकरण, जो ग्रहण किए हुए पदार्थ के वमन, क्षयजन्य ज्वर और कृशता के साथ होता है।
मल और मलाशय [20]
सुबह पानी-जैसा, वेग से निकलता अतिसार; तीव्र हाजत से जागती है; इसके बाद हिंसक मलत्याग की निष्फल हाजत, जिसके कारण वह उठ नहीं पाती; बाद में उदर में जलन, मितली और वमन के लिए हिंसक जोर लगना।
भूरा, झागदार, पानी-जैसा अतिसारी मल, गुदा में अत्यधिक पीड़ादायक दबाव, हाजत और मलत्याग की निष्फल हाजत के साथ।
बार-बार मल, मिट्टी के रंग का, पतला, गाँठों सहित, रक्त की धारियों और बहुत जोर लगाने के साथ; भूख थोड़ी, प्यास नहीं, ज्वर नहीं; जीभ पर द्वीप-जैसे बड़े चकत्ते।
मिट्टी के रंग का मल। θ पुराना अतिसार।
सुबह का पुराना अतिसार; खाँसी; तड़के, दाएँ फेफड़े के आर-पार तीर की तरह जाने वाले दर्द, स्तन के नीचे से पीठ में दाएँ स्कैपुला के नीचे तक; बाएँ कूल्हे के पीछे से बाईं जाँघ के बाहरी भाग में नीचे की ओर और कभी-कभी पिंडली तक जाने वाले अत्यंत तीव्र दर्द; बाईं आँख के आसपास और ललाट की l. ओर गंभीर तीव्र दर्द।
बच्चों में यकृत की अव्यवस्था के साथ पुराना सफेद-सा अतिसार।
लागर बीयर से अतिसार <।
मल: कालापन लिए, पानी-जैसा; पीलापन लिए, पानी-जैसा; मिट्टी के रंग का, पानी-जैसा और गाँठदार; जेली-जैसा; अनैच्छिक और प्रायः दर्दरहित तथा गंधरहित; रक्तयुक्त और अत्यंत दर्दनाक।
पेचिश: भूरापन लिए, झागदार, पानी-जैसे अथवा बार-बार रक्तयुक्त मलोत्सर्ग, नाभि के आसपास कुतरने जैसा दर्द, मलत्याग की निष्फल हाजत; जीभ चिकनी, लाल, फटी हुई; जलने की दुर्घटना के बाद।
गठियावात के बाद अतिसार या पेचिश।
हर वर्ष आवधिक पेचिश; ग्रीष्म ऋतु के आरंभिक भाग में।
Canthar. द्वारा खुरचन-जैसा मल दूर कर दिए जाने के बाद कभी-कभी जेली-जैसा मल प्रकट होगा; तब Kali bich. उपचार पूरा करेगा। θ पेचिश।
मलत्याग से पहले: उदर में दर्द; उत्थान।
मलत्याग के दौरान: दर्दनाक हाजत; गुदा में जलन और जोर लगना; succus prostaticus; नाभि के आसपास कुतरने जैसा दर्द; प्लीहा-प्रदेश में दर्द; मुँह में धातु-जैसा स्वाद; दुर्गंधयुक्त श्वास; सिर में अस्पष्टता।
मलत्याग के बाद: शिकायतों में कमी; मलत्याग की निष्फल हाजत; मितली के साथ गुदा में जलनयुक्त दुखन या खिंचाव।
लुगदी-जैसे मलोत्सर्ग, आँतों में बहुत गड़गड़ाहट के साथ।
कब्ज, दुर्बलता, जीभ पर परत, सिरदर्द, ठंडे हाथ-पैर; मल सूखा, गाँठदार।
अत्यधिक कब्ज; मल आकार में बहुत बड़ा और निकालने में अत्यंत दर्दनाक; जीभ पर द्वीप-जैसे बड़े चकत्ते।
एक ही पिंड के रूप में अत्यधिक कठोर मल।
कठोर, सूखा, गाँठदार, कठिनाई से निकलने वाला मल।
कठोर मलोत्सर्ग, जिसके बाद गुदा में जलन और दबाव।
अल्प, गाँठदार मल, जिसके बाद गुदा में जलन।
पुराना कब्ज़; मल अल्प, गाँठदार, जिसके बाद गुदा का पीड़ापूर्ण संकुचन होता है।
मल शुष्क, साथ में गुदा में जलन।
कब्ज़ की प्रवृत्ति, विशेषतः जब उसकी उपस्थिति के फलस्वरूप सामान्य लक्षण बढ़ जाते हों।
हर तीन या छह महीने में आवधिक कब्ज़।
गुदा से वायु निकलते समय पूरे शरीर पर, किंतु विशेषतः चेहरे पर पसीना, जहाँ से वह धाराओं में बहता है।
मलाशय का बाहर निकलना।
गुदा में नीचे की ओर दबाव और ज़ोर लगाने की अनुभूति, साथ में मलत्याग की निष्फल हाजत।
शुष्क और गाँठदार मल के बाद गुदा में जलन।
गुदा में डाट लगी होने की अनुभूति; बैठना लगभग असंभव।
गुदा में दुखन, जिससे चलना अत्यंत पीड़ादायक होता है।
बवासीर की रक्तवाहिनियों में भराव।
पीड़ादायक शुष्क बवासीर, जो मलत्याग के बाद बाहर निकल आती है।
आँतों से रक्तस्राव; शक्ति बहुत क्षीण; होंठ पूर्णतः विवर्ण; तनिक-से परिश्रम पर हृदय की धड़कन; अंधांत्र के ऊपर स्पर्शवेदना; मल कभी सामान्य, कभी रक्त की धारियों वाला श्लेष्मा, और कभी लगभग शुद्ध रक्त; उदर कुछ फूला हुआ; ठोस मल से कभी पीड़ा नहीं होती थी, किंतु श्लेष्मा या रक्त होने पर कुछ निष्फल हाजत होती थी।
मूत्र-अंग [21]
पीठ के आर-पार पीड़ा, साथ में लाल मूत्र।
वृक्क-प्रदेश में तीर-सी चुभती पीड़ा, नाड़ी छोटी, अत्यधिक शक्तिहीनता; मूत्रावरोध।
वृक्कों के प्रदेश में निरंतर मद्धिम पीड़ा, दाईं ओर <, जहाँ से पीड़ा प्रायः आर-पार आँतों तक तीर-सी जाती थी; आमाशय-प्रदेश में दुखन और अम्लता; मूत्र गहरे रंग का और अल्प।
दिन में लगातार मूत्रत्याग की इच्छा।
तेज़ गंध वाले पानी-जैसे मूत्र का बार-बार निकलना, जिससे वह रात में जाग जाता है।
मूत्रावरोध, साथ में वृक्क-प्रदेश में बहुत पीड़ा।
हैजे के बाद मूत्रावरोध।
अल्प, लालिमा लिए मूत्र।
अल्प, गहरे रंग का मूत्र, साथ में प्रचुर श्वेताभ तलछट और पीठ में पीड़ा।
अल्प मूत्र, जिस पर सफेद झिल्ली और श्वेताभ निक्षेप; श्लेष्मिक तलछट।
मूत्र क्षारीय और तारदार।
मूलाधार से मूत्रमार्ग में खिंचती हुई पीड़ा।
मूत्रत्याग से पहले: अनुत्रिक में पीड़ा, जो मूत्रमार्ग तक फैलती है।
मूत्रत्याग के समय: मूत्रमार्ग में गर्मी; मूत्रमार्ग के ग्रंथिल भाग में जलन, जो बाद में भी लंबे समय तक रहती है; नौकाकार खात अथवा मूत्रमार्ग के बल्ब में जलन; पीठ-दर्द।
मूत्रत्याग के बाद: मूत्रमार्ग के पिछले भाग में जलन, साथ में ऐसी अनुभूति मानो एक बूँद पीछे रह गई हो और उसे निकालने का निष्फल प्रयास; मूत्रमार्ग में टाँके-सी चुभन।
पुरुष जननांग [22]
स्थूलकाय व्यक्तियों में कामेच्छा अनुपस्थित।
लिंगमूल में कसने वाली पीड़ा; सुबह जागने पर।
रोमयुक्त भागों में खुजली; त्वचा में शोथ हो जाता है और आलपिन के सिर के आकार की छोटी फुंसियाँ बनती हैं।
शैंकर, जो गहराई तक व्रणित होते हैं।
कठोरित शैंकर।
शिश्नमुण्ड में सुई-सी चुभन और खुजली; व्रण।
चलते समय पुरःस्थ ग्रंथि में टाँके-सी चुभन, स्थिर खड़ा होना पड़ता है; मलत्याग के समय पुरःस्थ द्रव निकलता है। θ पुराना पुरःस्थशोथ।
पुराना मूत्रमार्गीय स्राव, जो प्रचुर, तारदार अथवा जेली-जैसा होता है।
स्त्री जननांग [23]
गर्भाशय का बाहर खिसकना, प्रत्यक्षतः गर्म मौसम के कारण।
गर्भाशय का अपूर्ण प्रत्यावर्तन।
झिल्लीदार कष्टार्तव।
मासिक धर्म: समय से बहुत पहले, साथ में चक्कर, सिरदर्द, मितली और ज्वरग्रस्तता; हठीला मूत्रावरोध अथवा लाल मूत्र।
योनि में दुखन और छिली हुई-सी अवस्था।
जननांगों में सूजन।
भग के आसपास खुजली, जलन और उत्तेजना; वास्तविक तीव्र खुजली।
प्रदर पीला, तारदार; कटि के आर-पार पीड़ा और दुर्बलता तथा अधोदर में मद्धिम, भारी पीड़ाएँ।
ऐसा प्रदर जिसे लंबी तारों की तरह खींचा जा सकता है; पीला, तारदार, जो कपड़े को कड़ा कर देता है।
गाढ़े, चिपचिपे श्लेष्मा का संचय।
रजोनिवृत्ति-काल में चेहरे पर गर्मी की लहरें।
गर्भावस्था। प्रसव। स्तनपान [24]
अचानक मितली; जीभ पर पीली परत; भीतर से ठंडक और चेहरे पर गर्मी; कब्ज़; उदर में तीव्र पीड़ाएँ; मूर्च्छा-जैसी कमजोरी। θ गर्भावस्था की वमनावस्था।
गर्भावस्था में दीर्घकालीन और लगातार वमन; आमाशय में कोई भोजन नहीं टिकता; अत्यधिक कृशता और दुर्बलता।
स्तन से बहता हुआ-सा दूध ऐसा दिखाई देता है मानो वह तारदार पिंडों और पानी से बना हो।
स्वर और स्वरयंत्र। श्वासनली और श्वसनी [25]
स्वर खुरदरा, बैठा हुआ अथवा अनुनासिक।
सुबह स्वर बैठना और स्वरयंत्र में श्लेष्मा का संचय।
शाम को स्वर बैठना।
स्वरयंत्रशोथ के साथ स्वर का पुराना बैठापन।
गला शुष्क और खुरदरा, साथ में स्वर का अत्यधिक बैठापन अथवा स्वरहीनता।
गले में गुदगुदी, जिससे खाँसी होती है।
स्वरयंत्र में कड़े श्लेष्मा का संचय, जिससे खँखारना पड़ता है।
सुबह खँखारकर प्रचुर, गाढ़ा, नीला श्लेष्मा निकालता है।
स्वरयंत्र में व्रण होने जैसी अनुभूति।
स्वर बैठने, खाँसी और निगलने में कठिनाई के बार-बार दौरे; गले में दुखन और गाँठ की अनुभूति, निगलने से आंशिक रूप से >; स्वर बैठना और आवाज़ निकलना बंद होना; कालेपन लिए कफ के साथ खाँसी, सुबह सबसे अधिक, साथ में उरोस्थि में “सुइयाँ चुभने जैसी” पीड़ा।
गले में पीड़ा और स्वरयंत्र में सूजन की अनुभूति; बैठा हुआ, भर्राया स्वर; ऐसा कफ जिसके निकलने में कठिनाई हो, उसके साथ खाँसी; सुबह खाँसी और श्वासकष्ट; अधिजठर और उदर के आर-पार पीड़ा; कब्ज़। θ स्वरयंत्र का रोग।
ठंड लग जाने के बाद गले में शुष्कता की अनुभूति, जो कभी-कभी जलन बनकर स्वरयंत्र तक फैलती थी; स्वर खुरदरा, बैठा हुआ; कभी-कभी छोटी, सूखी खाँसी; ग्रसनी की पिछली भित्ति पर धूसर-सफेद परत; दुर्बलता और शिथिलता। θ स्वरयंत्रशोथ।
छाती में दबाव; खाँसी के बिना श्लेष्मा में मिला रक्त निकलना, जो किसी भी परिश्रम अथवा ऊँची आवाज़ में पढ़ने, बोलने या हँसने से आरंभ होता है; सुबह <; छाती या गले पर कसे वस्त्र सहन नहीं होते, अन्यथा मूर्च्छा-जैसी अनुभूति होने लगती है; गले की बाईं ओर दुखन और चिरचिराहट, निगलने से कुछ >; गले में मानो धुले चमड़े का अस्तर लगा हो; शुष्क, गर्म वायु से >; नम मौसम में <, चाहे वह गर्म हो या ठंडा। θ मुख-ग्रसनी और स्वरयंत्र का रोग।
प्रतिश्यायजन्य स्वरयंत्रशोथ और स्वरहीनता; शाम को, मौसम बदलने वाला हो तब और लंबे समय तक बोलने के बाद <।
श्वासकष्ट के दौरे और हर समय श्वास भीतर लेने में न्यूनाधिक कठिनाई; कड़ा, दुर्गन्धयुक्त कफ; स्वर लगातार बैठा हुआ; भूख कम; कृशता। θ स्वरयंत्र और श्वासनली का पुराना शोथ।
ग्रसनी नीली, साथ में अपस्फीत शिराएँ; स्वर-रज्जुएँ और स्वरयंत्र के पिछले भाग लाल, फूले हुए तथा धूसर श्लेष्मा से ढके; शुष्कता की अनुभूति; बोलते समय स्वरयंत्र में गुदगुदी; स्वर खुरदरा और खोखला; बोलने और हँसने से उत्पन्न खाँसी, साथ में अल्प, तारदार कफ; पुराना स्वरयंत्रशोथ।
रक्तसंकुलता के साथ पुराना स्वरयंत्रशोथ; ऊतकों में सूजन और चिपचिपे द्रव का बढ़ा हुआ स्राव; सुबह की ओर <, जब कड़ा श्लेष्मा उसका लगभग दम घोंट देता है। θ पुटकीय स्वरयंत्रशोथ।
क्रमिक और कपटपूर्ण आरंभ; पहले केवल मुँह बंद होने पर साँस लेने में थोड़ी कठिनाई; रोग बढ़ने पर ज्वर, साँस लेने में बढ़ी हुई कठिनाई, बैठा स्वर और अंतरालों पर निरंतर खाँसी; खाँसी बैठी हुई, सूखी, भौंकने जैसी, धात्विक; निगलना पीड़ादायक; गलतुण्डिकाएँ और स्वरयंत्र लाल, सूजे हुए, अलग करने में कठिन कूटझिल्ली से ढके, साथ में कड़ा, तारदार श्लेष्मा निकलना; अंततः श्वसन केवल उदर, गर्दन और कंधों की पेशियों द्वारा होता है; सिर पीछे की ओर झुका हुआ, श्वास दुर्गन्धयुक्त; तापमान कम होना, अत्यधिक शक्तिहीनता, मूर्च्छित जड़ता और, राहत न मिले तो, श्वासावरोध से मृत्यु। θ झिल्लीदार क्रूप।
क्रूप-सदृश खाँसी; परिश्रमयुक्त और तेज़ श्वसन; कंठच्छद पर हल्की, फीकी, मोती-जैसी परत; खाँसी सूखी और तीव्र; स्वरयंत्र में पीड़ा और दुखन; जेली-जैसा कफ। θ झिल्लीदार क्रूप।
ज्वर, बहता हुआ जुकाम, क्रूप-सदृश खाँसी, सुबह <; पूरे मुख-ग्रसनी में झिल्ली, जिसकी स्वरयंत्र की ओर नीचे फैलने की प्रवृत्ति; कंठच्छद पर हल्की परत; खाँसकर कड़ा, टुकड़ेदार श्लेष्मा निकाला। θ झिल्लीदार क्रूप।
डिफ्थीरिया के हल्के आक्रमण के चौथे दिन अचानक क्रूप-सदृश खाँसी; श्वसन परिश्रमयुक्त; लेट नहीं सकता था; खाँसी कठोर; लंबा, चिपचिपा श्लेष्मा निकलना; अत्यधिक उनींदापन; कंठच्छद का शीर्ष और पार्श्व झिल्ली से ढके। θ डिफ्थीरियाजन्य क्रूप।
क्रूप-सदृश खाँसी और सीटी की आवाज़ के साथ कठिन श्वसन; पीला, कुछ तारदार श्लेष्मा निकलना, जिसे उँगली से हटाना पड़ता था; गलतुण्डिकाएँ और मुख-ग्रसनी सफेद, मोती-जैसी परत से आच्छादित, जो नीचे स्वरयंत्र तक फैली थी; दाईं ओर <। θ झिल्लीदार क्रूप।
ठंडी पश्चिमी हवा के विपरीत दिशा में सवारी करने के बाद सिर और गले में सर्दी, जिसके बाद क्रूप-सदृश खाँसी; रात में गले की शुष्कता बढ़ी हुई, साँस की आवाज़ पूरे घर में स्पष्ट सुनी जा सकती थी; खाँसी दौरे के रूप में, नींद के बाद भयावह रूप से बढ़ी हुई। θ क्रूप।
स्वरयंत्र, श्वासनली और यहाँ तक कि श्वसनियों पर चढ़ने वाला झिल्लीदार अथवा डिफ्थीरियाजन्य क्रूप; स्वर बैठा और अनिश्चित, खाँसी बैठी हुई, धात्विक; निगलना पीड़ादायक, गलतुण्डिकाएँ लाल, सूजी हुई अथवा अलग करने में कठिन कूटझिल्ली से ढकी, साथ में कड़ा, तारदार श्लेष्मा निकलना; खाँसकर प्रत्यास्थ, फाइब्रिनयुक्त ढले हुए टुकड़े निकलना; तेज़ श्लेष्मिक खरखराहट; नींद में सीटी और घरघराहट; कपटपूर्ण आरंभ; मोटे, गोल-मटोल, हल्के रंग के बालों वाले बच्चे।
क्रूप की आरंभिक, विकसित होती अवस्था; 2 से 3 A. M. <; कड़ा श्लेष्मा उसका दम घोंटता है।
श्वासनली के ऊपरी भाग में गाँठ और जीभ के आधार के आर-पार बाल पड़े होने की अनुभूति, जिसे खँखारने, निगलने या खाने में से किसी से भी राहत नहीं मिलती।
मुख-ग्रसनी और श्वासनली का प्रतिश्याय; तारदार श्लेष्मा का अत्यधिक संचय; स्वर बैठना; खाँसी; दबी हुई आवाज़; श्लेष्मकला में जलन, जो ऊपर नासाछिद्रों तक फैलती है; बढ़ी हुई गलतुण्डिकाएँ, जिनसे सुनाई देना मंद पड़ता है; ग्रसनी और स्वरयंत्र में व्रण; श्वसन में दबाव।
श्वासनली और श्वसनियों में जलन की अनुभूति।
सुबह श्वसनियों में शुष्कता की अनुभूति।
तीव्र, गूँजती खाँसी; कठिनाई से निकलने वाला पीताभ-सफेद कफ; गले में नीचे की ओर और उरोस्थि के साथ-साथ जलती, छिली हुई-सी पीड़ा; श्वासकष्ट और सीटी की आवाज़, बिस्तर पर आधा उठकर बैठना पड़ता है; नाड़ी तेज़ और छोटी; पूरी रात तनिक भी नींद नहीं। θ तीव्र श्वसनी-प्रतिश्याय।
लगातार खाँसी, जो उसे पूरी रात जगाए रखती और छाती की उस पीड़ा से बहुत कष्ट देती जिसे उसने फाड़ने वाली और जलती हुई बताया; नाक से लगातार स्राव; ललाटीय वायु-विवरों में पीड़ा; शिथिलता और सुस्ती की सामान्य अनुभूति। θ वक्षीय प्रतिश्याय।
खाँसी के बार-बार तीव्र दौरे, ढीली और सीटीदार ध्वनि, कफ नहीं; पसीना रात में <; तेज़ सीटी और घरघराहट; लेटने पर श्वासकष्ट। θ श्वसनी-प्रतिश्याय।
खाँसी के तीव्र दौरे, साथ में थोड़ा कफ, और वह भी तारदार श्लेष्मा का; इससे रोगी अत्यधिक थक जाता है; कभी-कभी सूखी उबकाइयाँ भी आती हैं। θ श्वसनीशोथ।
तीव्र सूक्ष्म-श्वसनीशोथ।
हर दो या तीन सप्ताह में, तनिक-सा अनावरण होने के बाद, आधे दिन के लिए ठिठुरन और सुस्ती, साथ में चेहरा तमतमाना, सिरदर्द और हाथ गर्म होना; फिर पूरे शरीर में गर्मी; रात में अशांत नींद और चीखना, जिसके बाद खाँसी के दौरे, साथ में अंडे की सफेदी जैसा कड़ा श्लेष्मा और पीला, अम्लीय द्रव वमन होना; फिर कई दिनों तक खाँसी; भूख का अभाव; मैली जीभ; कब्ज़। θ काली खाँसी के बाद श्वसनी-आक्रमण।
सामान्य श्वसनीशोथ, जिसमें रोग का स्वरूप तीव्र और सुस्त, जड़ जमाए पुराने रूप के बीच बदलता रहता हो, विशेषतः जब उसके साथ पुराने प्रकार की अस्थ्यावरणीय अथवा आमवाती पीड़ाएँ हों।
तीव्र, कसी हुई, सूखी खाँसी, दिन में <, और धुएँ के तनिक भी संपर्क से हमेशा भड़कती है; रात को बिस्तर में सीटी की आवाज़। θ पुराना श्वसनीशोथ।
छाती में घरघराहट, लेटने पर श्वासकष्ट। θ पुराना श्वसनीशोथ।
कई महीनों से पुराना श्वसनीशोथ; खाँसी हल्की, किंतु धूसर ढेलों के रूप में बहुत-सा गाढ़ा, चिपचिपा कफ; गले में हल्की दुखन; अधिजठर में पीड़ा; पेट में वायु।
एक वर्ष पहले ठंड लगने के बाद से खाँसी, साथ में छाती पर बहुत दबाव और गर्दन की शिराओं में सूजन; कड़े, काले ढेलों के रूप में कफ; खाने या पीने के बाद खाँसी <; श्वासकष्ट
परिश्रम से। θ पुराना श्वसनीशोथ।
तारदार कफ; लेटने पर दम घुटने की अनुभूति। θ पुराना श्वसनीशोथ।
आर्सेनिक की वाष्प भीतर लेने से उत्पन्न पुराना श्वसनीशोथ।
स्वरयंत्र अथवा श्वसनी-नलिकाओं में अर्धतीव्र और जीर्ण शोथकारी प्रक्रियाएँ, जिनमें नलिकाओं का रक्तसंकुलन और सूजन तथा चिपचिपे श्लेष्म का बढ़ा हुआ स्राव होता है, जो आवाज को ढक देता और बदल देता है।
दुर्गंधयुक्त श्वास और कफोत्सर्ग के साथ श्वसनियों का विस्फारण।
श्वसन [26]
श्वास में दबाव, रात 2 बजे जगा देता है ; हृदय-स्पंदन ; लेटकर साँस न ले पाना, आगे झुककर बैठता है ; श्लेष्म, क्रूप, क्रूपस डिफ्थीरिया, जीर्ण श्वसनीशोथ, झिल्लीदार श्वसनीशोथ अथवा परिसंचरण में विकार के कारण ; हृदय के आसपास ठंडक की अनुभूति और कसाव, फेफड़ों के निचले भागों में दबाव।
छाती पर दबाव और भारीपन, मानो कोई बोझ रखा हो ; रात में इसी अनुभूति से जागता है और उठने के बाद राहत मिलती है।
नींद से जागते समय छाती पर मानो भारी बोझ रखा हो।
जागने पर घरघराहट और हाँफना ; फिर ऐसी खाँसी जो उसे आगे झुककर उठ बैठने को विवश करती है।
काली खाँसी के बाद रात में घरघराहट।
श्वास-कष्ट।
सुबह उठने पर हल्का श्वास-कष्ट, मानो श्वसनियों की श्लेष्मकला मोटी हो गई हो।
श्वसनियों के द्विभाजन-स्थल पर कसाव।
लेटने पर दम घुटने की अनुभूति।
खाँसी [27]
खाँसी इनसे उत्पन्न होती है : स्वरयंत्र अथवा श्वसनियों के द्विभाजन-स्थल में गुदगुदी ; अधिजठर पर दबाव अथवा स्वरयंत्र में श्लेष्म का संचय।
सूखी, छोटी, निरंतर गुदगुदी वाली खाँसी और स्वरयंत्र में दर्द, मानो किसी व्रण के कारण हो।
खाँसी के साथ छाती के भीतर दुखन, विशेषकर एक स्थान पर, मानो वहाँ व्रण हो।
खाँसी के साथ मध्य उरोस्थि से पीठ तक दर्द ; तीव्र सिलाई-जैसा दर्द अथवा छाती में भारीपन और दुखन।
सूखी खाँसी, छाती में सिलाई-जैसे दर्द, कटि-प्रदेश में दर्द, चक्कर, श्वास-कष्ट और छाती में झटके से उठने वाले चुभते दर्द के साथ।
खाँसी के दौरान : मुँह में रक्त जैसा स्वाद ; मितली ; गले में व्रण-जैसा दर्द ; उरोस्थि और स्वरयंत्र में दबाव, जो os hyoides तक फैलता है ; उरोस्थि में जलनयुक्त दर्द, जो कंधों तक फैलता है ; छाती में भारीपन, स्पर्श-संवेदनशीलता और दर्द ; गले में घरघराहट के साथ हृदय-स्पंदन ; पार्श्वों और कटि-प्रदेश में दर्द, जो दबाव से >।
अलग-अलग समय पर एक-एक बार आने वाली ऊँची, कठोर खाँसी, जो एक-दो घंटे रहती है और फिर कई घंटों तक नहीं आती ; सुबह जागने पर सर्वाधिक।
सुबह जागने पर श्वास-कष्ट के साथ खाँसी, लेटने से >।
विशेषकर सुबह खाँसी, सफेद श्लेष्म के कफोत्सर्ग के साथ, "डामर जैसा चिपचिपा," जिसे खींचकर धागों के रूप में लंबा किया जा सकता है।
लगातार छोटी, कठोर, पुनरावर्ती खाँसी, कभी-कभी रक्त के कफोत्सर्ग के साथ ; रात में पसीना ; खाँसी से रात की नींद बाधित ; स्वरयंत्र में गुदगुदीपूर्ण उत्तेजना ; भूख नहीं ; पीला चेहरा ; क्षय-प्रवृत्ति वाली देह-रचना।
लगातार खाँसी, रक्त के कफोत्सर्ग के साथ ; खाँसी की उत्तेजना स्वरयंत्र से आती है ; रात में सोते समय पसीना।
खाँसी < : कपड़े उतारने पर ; सुबह जागने पर ; भोजन के बाद ; गहरी साँस लेने पर ; बिस्तर में गरम हो जाने के बाद >।
घरघराहट और हाँफना, फिर उबकाई और श्लेष्म के कठिन कफोत्सर्ग के साथ तीव्र खाँसी ; श्लेष्म इतना लसदार कि उसे धागों के रूप में पैरों तक खींचा जा सकता है।
खाने से खाँसी ; दोपहर के भोजन के बाद सूखी खाँसी।
ग्रसनी और कंठद्वार की चिकनी अथवा पुटकीय शोथयुक्त लालिमा के साथ खाँसी।
छह सप्ताह तक श्वास-कष्ट और सूखी खाँसी, जिसके बाद अंडे की सफेदी जैसी गाढ़ता वाले गहरे धूसर श्लेष्म का कफोत्सर्ग, साथ में छाती में दुखन और दबाव।
गूँजती, सीटी जैसी खाँसी, मितली और गाढ़े श्लेष्म के कफोत्सर्ग के साथ ; छाती में सीटी और तेज घरघराहट।
दम घोंटने वाली खाँसी, सख्त, धागेदार श्लेष्म के साथ, जो गले, मुँह और होंठों से चिपकता है।
क्रूप (झिल्लीदार अथवा डिफ्थीरियाजन्य) में कर्कश, धात्विक खाँसी, सख्त श्लेष्म अथवा तंतु-प्रत्यास्थ साँचे के कफोत्सर्ग के साथ।
छाती में दर्द और पीलेपन लिए भारी, सख्त पदार्थ के कफोत्सर्ग के साथ अवरोधकारी खाँसी।
पीले-हरे, सख्त पदार्थ के कफोत्सर्ग के साथ खाँसी।
गाढ़े, भारी कफोत्सर्ग तथा श्लेष्म की नीली-सी गाँठों के साथ खाँसी।
पारदर्शी, गंदे, स्लेटी रंग के थूक के साथ खाँसी।
छह महीने पहले हुई काली खाँसी के बाद भी खाँसी जारी रही—ढीली, घरघराहट और गुदगुदी वाली, जो रात में दौरों में आती है ; दिन में बिना खाँसी के घरघराहट ; कभी-कभी श्लेष्मयुक्त वमन।
काली खाँसी ; श्लेष्म इतना लसदार कि मुँह से भूमि तक लंबे धागों में खिंच जाता था।
कफोत्सर्ग अत्यंत लसदार और चिपचिपा है ; कंठद्वार, दाँतों, जीभ और होंठों से चिपकता है तथा अंततः लंबे, धागेदार और अत्यंत दृढ़तापूर्वक चिपके पिंड के रूप में मुँह से निकलता है।
रक्त की धारियों के साथ कफोत्सर्ग।
छाती का भीतरी भाग और फेफड़े [28]
पीठ से उरोस्थि तक दर्द ; अथवा मध्य उरोस्थि से कंधों के बीच की ओर तेजी से जाता दर्द।
उरोस्थि के पीछे खुजली, जिससे तीव्र, शरीर को झकझोरने वाली, दौरेदार खाँसी होती है।
चेहरा थोड़ा तमतमाया हुआ ; नासिका की श्लेष्मकला उत्तेजनशील, या तो शुष्क रहती है अथवा प्रचुर मात्रा में पीला श्लेष्म स्रावित करती है ; आँखें अब स्वस्थ, कोनों में प्रायः प्रतिश्याय ; सभी दाँत नष्ट (पारे का उत्तरप्रभाव) ; जीभ का अग्रभाग साफ और लाल बिंदुओं से ढका, मूल पर पीली मोटी परत ; मुँह में अत्यधिक शुष्कता, बारी-बारी से लार बहना ; मसूड़े नीलाभ ; कंठद्वार और ग्रसनी लाल कणिकाओं से ढके, जिनके बीच सफेद धारियाँ गुंथी हैं और जो नीचे ग्रासनली तक पहुँचती हैं ; गले में बाहरी वस्तु जैसी निरंतर उत्तेजना, कभी-कभी तीव्र जलन और खरोंचने जैसी अनुभूति ; स्वाद खट्टा, प्रायः धातु जैसा ; अत्यधिक प्यास ; आमाशय फूला हुआ, स्पर्श-संवेदनशीलता, परिपूर्णता और दबाव के साथ ; कभी-कभी वमन ; मलाशय का क्षेत्र दबाव के प्रति संवेदनशील ; मूत्र अत्यंत अम्लीय ; मल कठोर और मलत्याग कठिन ; कष्टार्तव ; छाती के दाहिने ऊपरी अग्र और पश्च भाग पर थपथपाने से मंद ध्वनि ; दाएँ फेफड़े के शीर्ष पर क्षीण, घरघराहटयुक्त श्वास-ध्वनि ; बाईं ओर भी वही लक्षण, किंतु कम तीव्र ; खाँसी अधिकांशतः सूखी, पर कष्टदायक, विशेषकर सुबह कपड़े पहनने के बाद और देर शाम ; गाढ़ा, सख्त, सफेद थूक ; खाँसने से पहले स्वरयंत्र में गर्मी और गुदगुदी, जिससे बेचैनी और अधीरता होती है। θ क्षय रोग।
प्रचुर, पीले, धागेदार कफोत्सर्ग और बहुत पसीने के साथ खाँसी ; स्वरयंत्र में व्रण जैसा दर्द, जिससे लगभग प्रत्येक साँस पर खाँसी होती है ; स्वरयंत्र में जकड़न की अनुभूति। θ Phthisis pulmonalis.
दोनों फेफड़ों का कठोर तंतुमय अपक्षय, कफोत्सर्ग इतना लसदार कि उसे मुँह से एक गज तक खींचा जा सकता था ; खाँसी अत्यंत तीव्र, जो नींद और विश्राम नहीं होने देती।
रक्तयुक्त कफोत्सर्ग ; निमोनिया।
हृदय, नाड़ी और परिसंचरण [29]
हृदय के आसपास ठंडक की अनुभूति ; छाती में कसाव ; श्वास-कष्ट।
खाने के बाद हृदय पर दबाव।
हृदय-प्रदेश में सुई चुभने जैसा दर्द।
हृदय-स्पंदन, श्वास-कष्ट, तेज नाड़ी, गर्मी ; रात 2 बजे चौंककर अचानक जागता है।
हृदय की अतिवृद्धि ; महाधमनी कपाटों की अपर्याप्तता।
नाड़ी : अनियमित, छोटी, संकुचित, नकसीर के साथ ; तेज, प्रायः कोमल, कमजोर, यहाँ तक कि फड़फड़ाती हुई।
सभी धमनियों में स्पंदन अनुभव होता है।
छाती का बाहरी भाग [30]
दाहिने पार्श्व में एक सीमित स्थान पर मंद दर्द, साँस लेने पर <।
गर्दन और पीठ [31]
सिर झुकाने पर गर्दन के पिछले भाग में जकड़न।
गले पर झाइयों जैसे भूरे धब्बे।
तीसरी ग्रीवा कशेरुका से पाँचवीं वक्षीय कशेरुका तक छुरा भोंकने जैसा दर्द, जो छाती के आर-पार आगे उरोस्थि तक जाता है, चलने-हिलने से < ; झुकने के बाद मेरुदंड सीधा करने में असमर्थता।
पीठ का दर्द खाँसी और सख्त, काले श्लेष्म के कफोत्सर्ग के साथ आर-पार उरोस्थि तक जाता है।
कमर के निचले भाग में दर्द।
तीखे, तेजी से फैलने वाले दर्द, पहले बाएँ फिर दाएँ वृक्क-प्रदेश में, जो नीचे जाँघों तक फैलते हैं, चलने-हिलने से <।
वृक्क-प्रदेश में तीखा, चुभता दर्द।
पीठ में दुखन, जो बाईं ओर नीचे नितंब-संधि तक जाती है।
कटि-प्रदेश के आर-पार चाकू जैसा दर्द ; चल नहीं सकता।
कटि-प्रदेश में आर-पार दर्द, हाथ-पैरों की ठंडक के साथ।
पीठ में आमवाती दर्द ; झुकते समय ऐसा लगा मानो त्रिकास्थि के आर-पार कुछ चटक गया हो ; दर्द के कारण न झुक सकता है, न हिल सकता है ; विश्राम में भी दर्द लगातार रहता है, पर धड़ अथवा टाँगों की तनिक-सी गति से <।
त्रिकास्थि के एक छोटे स्थान पर तीव्र दुखता दर्द, "मानो फोड़ा पक रहा हो," स्थिर, स्पंदित दर्द, जो रात में सर्वाधिक अनुभव होता है और सोने नहीं देता ; दिन में उठकर चलने-फिरने पर >, पर कुछ भी उठा नहीं सकता।
त्रिकास्थि में दर्द ; स्वयं को सीधा नहीं कर सकता।
त्रिकास्थि के बाएँ बाहरी भाग में काटने वाला दर्द, जो ऊपर और नीचे की ओर तेजी से जाता है।
os coccygis में दर्द, चलने अथवा छूने से < और लंबे समय तक बैठने के बाद उठने पर भी <।
बैठे रहने पर पुच्छास्थि में दर्द।
ऊपरी अंग [32]
दोनों कंधों में आमवाती दर्द, रात में <।
बाएँ कंधे की पंखास्थि के निचले कोण पर सिलाई-जैसे दर्द।
कंधे की संधि में जकड़न।
दाहिनी बाँह में दर्दयुक्त जकड़न।
दाहिनी बाँह में अशक्तता की अनुभूति, मानो वह सोकर सुन्न पड़ गई हो।
अग्रबाहु के मध्य में जलनयुक्त दर्द, जो कलाई तक फैलता है।
बाँह में सूजन, जिसके बाद फोड़े जैसा उभार हुआ और वह अधिलंबित किनारों वाले बड़े व्रण में बदल गया।
बाँहों पर आधे मटर के आकार की फुंसियाँ, जिनके केंद्र में एक बाल था।
अग्रबाहुओं और हाथों में खुजली, फिर असहनीय दर्द और अनेक व्रणों का बनना ; बाँह को जोर से थपथपाने पर उनमें से एक दर्जन से अधिक लगभग ठोस मवाद-पिंड गिर पड़े और साफ, शुष्क गुहाओं वाले व्रण रह गए, जो धीरे-धीरे भरकर ठीक हुए।
कोहनियों और कलाई की संधियों में आमवाती दर्द ; बाईं कोहनी में चुभन।
अग्रबाहुओं पर पिटिकामय उद्भेद, जो कुछ दिनों तक रहता और बार-बार लौटता है।
कलाई के एक स्थान पर लालिमा, सूजन और खुजली ; फिर अत्यधिक दर्द ; कुछ समय बाद मवाद बना, त्वचा को फोड़कर निकला और दो या तीन महीने तक रिसता रहा ; फिर ठीक होकर ऐसा धँसा हुआ निशान छोड़ गया मानो उसे खोदकर निकाला गया हो।
हाथों में अत्यधिक कमजोरी।
हाथों का ऐंठनयुक्त संकुचन।
हाथों का Psoriasis diffusa, जो कुछ समय बाद बिगड़कर impetigo बन जाता है।
हाथ पूरी तरह धँसे हुए निशानों से ढके हैं, जो ऐसे दिखते हैं मानो गोल वाडिंग-कटर से छेदकर निकाले गए हों।
हाथ गहरे, चुभन करने वाले निशानों से ढक जाते हैं।
दबाने पर हाथों की हड्डियाँ मानो कुचली हुई हों ; उँगलियों पर व्रण, अस्थिक्षय के साथ।
उँगलियों की संधियों में आमवाती दर्द।
उँगली में कुछ स्पंदित दर्द के साथ लालिमा और सूजन होने के बाद तर्जनी की संधि पर व्रण बना, जिसके किनारे सफेद और अधिलंबित तथा केंद्र में गहरे रंग के कोथयुक्त बिंदु थे ; त्वचा और कोशिकीय ऊतक ऐसे हिलते थे मानो अपने संलग्न स्थानों से अलग हो गए हों।
नाखूनों की जड़ों पर छोटी फुंसियाँ, जो हाथों पर फैलकर कलाइयों तक पहुँच गईं ; बाँह लाल हो गई और कांख की ग्रंथियों में पूय बना ; हाथों की छोटी फुंसियाँ फूटने पर पानी जैसा द्रव स्रावित करती थीं ; यदि उन्हें न छुआ जाता तो द्रव गाढ़ा होकर पीले, सख्त पिंड में बदल जाता था।
अँगूठे के नाखून के नीचे दर्दयुक्त व्रण।
निचले अंग [33]
चलने अथवा हिलने पर नितंब-संधियों और घुटनों में आमवाती दर्द, डिफ्थीरिया में बेचैनी के साथ भी।
बाईं आसनिका तंत्रिका के मार्ग में, वृहद् ट्रोकैंटर के पीछे से पिंडली तक दर्द ; गति से >।
छाती के दाहिने पार्श्व और बाईं आसनिका तंत्रिका में सिलाई-जैसे दर्द।
आसनिका-शूल : पुरुषों में ; बाईं ओर, नितंब-संधि से घुटने तक दौड़ता दर्द ; इधर-उधर घूमने वाले अनियत दर्द, घुटने और नितंब-संधि में तीखा दर्द, टाँग में दुखन और कंपन ; दर्द शीघ्र आता और जल्दी शांत हो जाता है ; नितंब-संधि में झटकेदार दुखता दर्द ; चलने और टाँग मोड़ने से दर्द > ; गरम मौसम में तथा खड़े रहने, बैठने अथवा बिस्तर में लेटने से < ; दबाव से तंत्रिका की पूरी लंबाई में दर्द तेजी से दौड़ता है। θ आसनिका-शूल।
नितंब-संधि में और जाँघ के बाहरी भाग से नीचे की ओर तीव्र दर्द ; दोपहर बाद और शाम को <, बिस्तर में > ; मौसम में किसी भी परिवर्तन से <। θ आसनिका-शूल।
खड़े रहने, बैठने अथवा बिस्तर में लेटने से दर्द बढ़ता है ; चलने और टाँग मोड़ने से > ; दबाव देने पर दर्द तंत्रिका की पूरी लंबाई में तेजी से दौड़ता था ; बाईं टाँग प्रभावित। θ आसनिका-शूल।
कपड़े नम हो जाने से आसनिका-शूल ; बाईं नितंब-संधि में दर्द, गति से >।
दाहिनी नितंब-संधि में दर्द, जो घुटने तक फैलता है।
टाँगों में भारीपन ; चलने अथवा सीढ़ियाँ चढ़ने पर पिंडलियों में दुखन और कमजोरी।
टाँगों और जाँघों पर लाल, कठोर गाँठों वाला उद्भेद, जिनका आकार आलपिन के सिर से आधे मटर तक था ; केंद्र में धँसी हुई गहरी पपड़ी और आधार पर शोथ था।
पिंडली की हड्डियों में तीव्र दर्द और जलन, जो टाँगों में ऊपर की ओर फैलती है ; जाँघों और घुटनों के सामने दुखन तथा तेजी से फैलने वाले दर्द ; रात में <, बिना सूजन के।
पिंडली की मांसपेशियों के कंडरों में मानो खिंचे हुए होने जैसा दर्द, जिससे लँगड़ापन होता है।
दाहिनी tibia में फाड़ने वाला दर्द।
तृतीयक syphilis से tibia में फाड़ने वाले दर्द।
Tibia के मध्य में दर्द।
त्वचा पर लगी चोट से अस्थिपरिवेष्टशोथ, जिससे उस स्थान पर लगभग एक शिलिंग के आकार का व्रण रह गया ; उसके आसपास की त्वचा और कोशिकीय ऊतक में बहुत अधिक शोथ ; खड़े होने पर पैर में बहुत दर्द ; घुटने तक ऊपर की ओर जाती तीव्र तीर-सी पीड़ा ; घुटने की आकुंचक पेशियों में अकड़न।
दायीं पिंडली के अग्रभाग पर लाल, पीड़ायुक्त, आटे-जैसी नरम सूजन ; स्पर्श और खड़े रहने के बाद संवेदनशील, किंतु विशेषतः रात में पीड़ायुक्त, जब कुतरने और खुरचने-जैसी पीड़ाएँ उसे जगाए रखती हैं ; श्वेतप्रदर और भग में खुजली। θ उपदंशजन्य अस्थिपरिवेष्टशोथ।
पैर पर कई छोटे, अनियमित व्रण, जो भरने पर धँसा हुआ दाग छोड़ते हैं। θ उपदंश।
पैरों पर छोटी फुंसियाँ, जो फैलकर बड़े सुर्ख लाल चकत्ते बन जाती हैं और उनसे पीला पदार्थ निकलता है।
बाएँ टखने में स्थानच्युति-जैसा संवेदन।
टखने और एड़ी के आसपास तीव्र जलनकारी गर्मी, भीतर गहराई में, जो नींद में बाधा डालती है ; तीन छोटे, अनियमित, उथले व्रण ; कब्ज़ ; हृदय में फड़फड़ाहट।
चलने पर एड़ियों में दुखन।
दाएँ पैर के तलवे पर सीरम से भरा फफोला।
पहले से शोथग्रस्त पैरों पर व्रण।
सर्वांगीन अंग [34]
चुभती हुई तीर-सी पीड़ाएँ, सुबह <।
अंगों में बार-बार और तीव्र पीड़ा, विशेषतः भुजाओं में, साथ में हाथों की ऐंठन ; जब अंगों की पीड़ा नहीं होती, तब आमाशय में पीड़ा और बेचैनी तथा गाल की हड्डियों में दर्द होता।
आवधिक, इधर-उधर घूमती पीड़ाएँ, हड्डियों के साथ-साथ भी ; सामान्यतः किसी स्थानविशेष की शोथकारी प्रक्रिया के बिना।
अंगों की पीड़ा एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदलती रहती है।
हड्डियाँ चोट खाई और कुचली हुई-सी लगती हैं ; गति से संधियों में चटकने की आवाज़।
सर्वांग में अकड़न, सुबह कठिनाई से ही हिल-डुल पाता।
सभी अंग अकड़े हुए, तीर-सी पीड़ाओं के साथ, सुबह <।
अंगों का वातरोग, विशेषतः संधियों में।
वातजन्य पीड़ाएँ : अंगों में ; नितंब-संधियों और उँगलियों में, दिन के समय <।
शीत-प्रकृति का जीर्ण वातरोग ; हड्डियाँ दुखती और चोट खाई-सी लगती हैं।
अस्थिपरिवेष्ट तथा उपदंशजन्य वातरोग।
कलाइयों, टखनों और मेरुदंड को थोड़ा-सा हिलाने पर संधियों में सुनाई देने योग्य चटकना, गति से <।
विश्राम। स्थिति। गति [35]
लेटना : आँखों के ऊपर की धड़कन > ; पीड़ायुक्त करवट पर < ; श्वासकष्ट ; दम घुटने-जैसा संवेदन ; खाँसी > ; सायाटिका < ; जानुचक्र से पैर तक की पीड़ाएँ <।
मुँह के बल लेटना : आँखों का पैनस >।
सिर झुकाना : गर्दन के पिछले भाग में अकड़न।
सिर पीछे की ओर झुका हुआ : झिल्लीदार क्रूप।
सिर मरोड़ना : मिर्गी के दौरे के समय।
लेटना ही पड़ता है : तीव्र सिरदर्द के कारण।
लेटने की इच्छा।
लेट नहीं पाता : डिप्थीरिया के समय।
झुकना : सिर में हलकापन ; आँखों के ऊपर धड़कन < ; कनपटियों और आँखों के ऊपर तीर-सी पीड़ा < ; चक्कर ; ऐसा लगा मानो त्रिकास्थि के आर-पार कुछ चटक गया हो।
झुकने के बाद : मेरुदंड सीधा नहीं कर पाता।
नींद के बाद उठना : छाती पर भार का संवेदन >।
आसन से उठना : चक्कर।
बैठना : अनुत्रिकास्थि में पीड़ा ; सायाटिका < ; पीठ पर प्रचुर पसीना।
बहुत देर बैठने के बाद उठने पर : अनुत्रिकास्थि की पीड़ाएँ <।
बैठने में भी अत्यधिक कठिनाई : गुदा में डाट-जैसा संवेदन।
बिस्तर में आंशिक रूप से उठकर बैठना पड़ता है : श्वासकष्ट के कारण।
आगे की ओर झुककर बैठता है : ऑर्थोप्निया ; घरघराहट के कारण।
खड़ा रहना : सायाटिका < ; पैर में बहुत दर्द।
खड़े रहने के बाद : दायीं पिंडली के अग्रभाग पर आटे-जैसी नरम सूजन।
गति : इससे अरुचि ; अंगगत हृद्शूल < ; बैठने के बाद अचानक गति से दाएँ अधःपर्शु प्रदेश में तीखा टाँका ; छाती के आर-पार उरोस्थि तक पीड़ा < ; वृक्क-प्रदेश में तीर-सी पीड़ा < ; धड़ और अंगों को हिलाने पर वातजन्य पीड़ा < ; नितंब-संधियों और घुटनों में वातजन्य पीड़ाएँ ; सायाटिक तंत्रिका के मार्ग में पीड़ा > ; संधियों का चटकना।
तनिक-सी गति : मेरुदंड के दाएँ पार्श्व के रक्त-फोड़े में पीड़ा।
तनिक-सा परिश्रम : हृदय-स्पंदन उत्पन्न करता है ; बलगम-मिश्रित रक्त निकलना ; श्वासकष्ट।
इधर-उधर चलना : आँखों के ऊपर धड़कन < ; मितली <।
झुक या हिल-डुल नहीं सकता : त्रिकास्थि के आर-पार ऐसी पीड़ा के साथ, जो विश्राम में भी निरंतर रहती है।
जीभ बाहर निकालना : गले की पीड़ा <।
सीढ़ियाँ चढ़ना : चक्कर ; पिंडलियों में मृदु पीड़ा।
पैर मोड़ना : नितंब-संधि की पीड़ा >।
चलना : पूरे शरीर में गर्मी ; दोनों अधःपर्शु प्रदेशों में पीड़ाएँ ; दाएँ अधःपर्शु प्रदेश में पीड़ा ; गुदा की दुखन के कारण चलना पीड़ायुक्त ; प्रोस्टेट में टाँके, स्थिर खड़ा होना पड़ता है ; त्रिकास्थि की पीड़ा > ; अनुत्रिकास्थि की पीड़ा < ; नितंब-संधियों और घुटनों में वातजन्य पीड़ाएँ ; नितंब-संधि में झटकेदार मृदु पीड़ा > ; पिंडलियों में मृदु पीड़ा ; एड़ियों में दुखन।
पैप्यूलयुक्त उद्भेदन की जलनकारी खुजली के कारण पूरी रात कमरे में ऊपर-नीचे चलते रहना पड़ता है।
चल नहीं सकता : कटि के आर-पार पीड़ा के कारण।
भुजाएँ पटकना : नींद के समय।
तंत्रिकाएँ [36]
अत्यधिक थकान और सर्वांगीन अस्वस्थता ; लेटने की इच्छा के साथ दुर्बलता।
पीड़ाएँ घटने पर अंगों में थकान।
घोर शक्तिहीनता ; चेहरा पीला, चेहरे और शरीर पर ठंडा पसीना।
प्रतिदिन उसी समय तंत्रिकाशूल।
मिर्गी के दौरे ; हाथ अशक्त हो जाते हैं ; मितली, जिसके बाद ठिठुरन, जंभाई, मूर्छा-जैसा अनुभव और सिरदर्द ; सिरदर्द के साथ चेतना चली जाती है ; दौरे के समय पलकें झपकती हैं ; सिर मरोड़ना ; जोर से चीखना ; चेहरे का रंग बदलता रहता है, कभी पीला, कभी लाल ; मुँह पर झाग ; मुँह से गाढ़ा, तारदार द्रव बहता है, जिसे खींचकर छह गज लंबा धागा बनाया जा सकता था।
नींद [37]
जंभाई लेने और अंगड़ाई लेने की अत्यधिक इच्छा।
खुली हवा में उनींदापन।
नींद से ताज़गी नहीं मिलती ; दुर्बलता अनुभव होती है, विशेषतः हाथ-पैरों में।
नींद के समय बार-बार चौंकना, असंगत बातें करना, भुजाएँ पटकना।
नींद खुलती है : मूत्रत्याग की इच्छा के साथ ; श्वासकष्ट से ; हृदय-स्पंदन से ; गर्मी से ; सिरदर्द से।
जागने पर अधिक खराब : विशेषतः सिर और छाती के लक्षण।
समय [38]
अधिकांश लक्षण सुबह प्रकट होते हैं अथवा उसी समय सर्वाधिक तीव्र होते हैं।
2 A. M. पर : अधिजठर गर्त में गर्मी और रक्त थूकना ; अवरुद्ध श्वास से नींद खुलती है ; चौंककर जागता है।
2 से 3 A. M. तक : क्रूप <।
सुबह : सिर में हलकापन < ; सिर के एक पार्श्व में पीड़ा आरंभ होती है ; भौंहों में तीव्र धड़कन, जो पूरे दिन रहती है ; दृष्टि धुँधली ; जागने पर सिरदर्द ; ललाट और शीर्ष में पीड़ा ; हल्का प्रकाशभीति ; जागने पर प्रतिश्यायी शोथ < ; आँखों का शोथ और पलकों का चिपकना ; बार-बार छींकें, दायीं नासिका का अवरोध और रक्तस्राव ; बायीं नासिका से गाढ़ा, पीला स्राव ; खाँसी < ; स्वाद ताँबे-जैसा, मीठा-सा, खट्टा, कड़वा ; गले में सूखापन और जलन ; बहुत-सा लसदार श्लेष्मा खँखारकर निकलता है ; गले से काला श्लेष्मा ; मितली < ; अंगगत हृद्शूल < ; जीभ भूरी ; उलझन-सा अनुभव ; पानी-जैसा, वेग से निकलता अतिसार ; जीर्ण अतिसार ; दाएँ फेफड़े के आर-पार वेग से जाती पीड़ाएँ ; जागने पर शिश्नमूल में संकोचक पीड़ा ; स्वरभंग और स्वरयंत्र में श्लेष्मा का संचय ; प्रचुर, गाढ़ा, नीला श्लेष्मा खँखारकर निकालता है ; काले-से थूक के साथ खाँसी ; खाँसी और श्वासकष्ट ; बलगम-मिश्रित रक्त का निष्कासन < ; जीर्ण स्वरयंत्रशोथ सुबह की ओर <, जब लसदार श्लेष्मा लगभग उसका दम घोंट देता है ; ज्वर और क्रूप-जैसी खाँसी < ; श्वासनलिकाओं में सूखापन ; उठने पर हल्का श्वासकष्ट ; जोरदार, कठोर खाँसी < ; श्वासकष्ट के साथ खाँसी ; खाँसी < ; तीर-सी पीड़ाओं के साथ अंगों की अकड़न < ; अत्यधिक प्यास।
9 A. M. पर : सिर की पीड़ा का दौरा आरंभ होता है और दोपहर बाद समाप्त हो जाता है।
सुबह आरंभ होता है, दोपहर तक बढ़ता है, संध्या की ओर समाप्त हो जाता है ; नासामूल से आँख के बाहरी कोण तक तीव्र तीर-सी पीड़ा।
दिन : कनपटियों और आँखों के ऊपर तीर-सी पीड़ा ; उनींदापन और शिथिलता ; मूत्रत्याग की निरंतर इच्छा ; तीव्र, कसी हुई खाँसी < ; खाँसी के बिना घरघराहट ; त्रिकास्थि की मृदु पीड़ा > ; नितंब-संधियों और उँगलियों का वातरोग <।
दोपहर बाद : पूरे सिर में तीखी पीड़ाएँ ; सायाटिका <।
संध्या : सिरदर्द ; प्रतिश्याय < ; आमाशय में सूजन ; पूरे सिर में तीखी पीड़ाएँ ; दाएँ अधःपर्शु प्रदेश में तीव्र मृदु पीड़ाएँ ; स्वरभंग ; प्रतिश्यायी स्वरयंत्रशोथ ; प्रतिश्यायी स्वरहीनता < ; खाँसी < ; सायाटिका <।
रात : सिर के बाएँ पार्श्व की पीड़ा < ; कनपटियों और आँखों के ऊपर तीर-सी पीड़ा ; कानों में स्पंदनशील पीड़ा ; नाक और आँखों से बहना, सदा < ; दम घुटने के दौरे ; अनिद्रा ; नाभि पर काटने-जैसी पीड़ा ; तीव्र गंध वाले पानी-जैसे मूत्र का बार-बार निकलना, जिससे उसकी नींद खुलती है ; गले का सूखापन < ; खाँसी के कारण नींद नहीं ; पसीना < ; अशांत नींद और चीखना ; बिस्तर में घरघराहट ; छाती पर भार का संवेदन ; पसीना ; खाँसी ; गुदगुदी वाली खाँसी ; त्रिकास्थि में एक छोटे स्थान पर मृदु पीड़ा < ; कंधों में वातजन्य पीड़ा ; जाँघों और घुटनों के अग्रभाग में मृदु पीड़ा < ; दायीं पिंडली के अग्रभाग पर आटे-जैसी नरम सूजन ; त्वचा में गर्मी और खुजली ; पैप्यूलयुक्त उद्भेदन में जलनकारी खुजली ; निगलने पर गले में दुखन।
तापमान और मौसम [39]
गर्म मौसम में शिकायतें।
खुली हवा में आसानी से सर्दी लगती है।
उद्भेदन गर्म मौसम में आरंभ होता है। (Rhus में ठंडे मौसम में)।
मामूली ठंडी हवा भी अत्यंत अप्रिय लगती है।
बाहर रहने पर सामान्यतः बेहतर अनुभव, विशेषतः खुली हवा में चलते समय चक्कर > ; खुली हवा में ठिठुरन और आमाशय की शिकायतें <।
शरीर उघाड़ना < ; लपेटकर ढकना >।
खुली हवा : आँखों के ऊपर धड़कन > ; सिरदर्द > ; बार-बार छींकें और प्रतिश्याय < ; मितली > ; उनींदापन।
बिस्तर में : सायाटिका > ; जानुचक्र से पैर तक की पीड़ा <।
गर्म स्थान खोजता है : पीठ में ठिठुरन के कारण।
शुष्क, गर्म हवा : गला >।
गर्म तापमान : नाक का सूखापन < ; खाँसी > ; त्वचा की खुजली।
गर्म, नम मौसम : निरंतर नाक सुड़कना ; गला <।
गर्म सूप : जलनकारी सिरदर्द >।
गर्म मौसम : गर्भाशय-भ्रंश, मानो इसी के कारण ; सायाटिका < ; उद्भेदन की तीव्र खुजली < ; उद्भेदन आरंभ होता है।
हवा : दायीं नासिका से पानी-जैसा स्राव <।
ठंडा तापमान : नाक का सूखापन >।
ठंडा मौसम : उद्भेदन की खुजली > ; व्रण पीड़ायुक्त।
ठंडी पछुआ हवा : उसके विरुद्ध सवारी करने से सिर में जुकाम हुआ, जिसके बाद क्रूप हुआ।
ठंडी हवाएँ : नाभि के आसपास मंद, शूल-जैसी पीड़ाएँ उत्पन्न करती हैं।
ठंडा, नम मौसम : गला <।
ठंडा पानी पीना : मुँह और होंठों के सूखेपन को > नहीं करता।
मौसम में परिवर्तन : सायाटिका <।
जब मौसम बदलने वाला हो : प्रतिश्यायी स्वरयंत्रशोथ <।
कपड़े उतारना : खाँसी <।
सर्दी लगने के बाद : खाँसी।
ज्वर [40]
पीठ में ठिठुरन, उनींदापन ; गर्म स्थान खोजता है।
ठिठुरन और गर्मी की लहरें बारी-बारी से।
चक्कर और मितली के साथ ठिठुरन, जिसके बाद गर्मी, साथ में ठंडक का संवेदन और कंपकंपी ; कनपटियों में आवधिक, डंक-सी पीड़ाएँ ; प्यास के बिना।
पैरों से ऊपर की ओर चढ़ती ठिठुरन के दौरे और ऐसा संवेदन मानो शीर्ष पर खोपड़ी सिकुड़ गई हो, बार-बार लौटने वाले दौरे।
ठिठुरन, जिसके एक घंटे बाद गर्मी, मुँह और होंठों के सूखेपन के साथ, जिन्हें हर समय गीला करना पड़ता है ; इसके बाद सुबह अत्यधिक प्यास, किंतु पसीना नहीं ; चिड़चिड़ापन।
ठिठुरन, विशेषतः हाथ-पैरों में, और गर्मी की लहरें, जो सर्वांगीन पसीने के साथ बारी-बारी से आती हैं।
शरीर के ऊपरी भाग और चेहरे पर जलनकारी गर्मी, साथ में भीतर ठिठुरन और तीव्र प्यास।
चक्कर ; तीव्र, पीड़ायुक्त वमन, जिसके बाद ललाट में पीड़ा, आँखों में जलन, शरीर के ऊपरी भाग और चेहरे पर अत्यधिक जलनकारी गर्मी, साथ में भीतर ठिठुरन और तीव्र प्यास।
गर्मी की लहरें ; चेहरे पर। θ रजोनिवृत्ति-काल।
हाथों और पैरों में गर्मी ; मितली ; उदर के ऊपरी भाग में पीड़ा ; मुँह में सूखापन ; अनिद्रा ; इसके बाद हाथों, पैरों और जाँघों पर पसीना।
गर्मी की लहरें और सर्वांगीन पसीना बारी-बारी से।
हाथ ठंडे और ठंडे पसीने से तर।
ललाट पर पसीना ; शेष चेहरा सूखा।
पसीना : मलत्याग के प्रयास के समय पीठ पर ; शांत बैठे रहने पर प्रचुर ; ललाट और हाथों पर ठंडा ; हाथों, पैरों और जाँघों पर।
दौरे, आवधिकता [41]
पीड़ाएँ तेजी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर चली जाती हैं, किसी स्थान पर अधिक देर नहीं टिकतीं और बीच-बीच में रुकती हैं।
लक्षण बारी-बारी से आते हैं।
आमाशयिक लक्षण वातजन्य लक्षणों का स्थान ले लेते हैं।
पीड़ाएँ शीघ्र प्रकट होती और अचानक लुप्त हो जाती हैं।
बार-बार लौटने वाले दौरे : ऐसा संवेदन मानो खोपड़ी या शीर्ष सिकुड़ गया हो।
आवधिक दौरे : आधे सिर के सिरदर्द के ; आँतों के आक्षेपी संकोच के ; कनपटियों में डंक-सी पीड़ाओं के।
आवधिक : सिरदर्द ; कब्ज़।
अंतरालों पर : दायीं कनपटी में तीर-सी पीड़ा।
भोजन के एक घंटे बाद : मितली के साथ भोजन का वमन।
ठिठुरन के एक घंटे बाद : गर्मी।
दिन में कई बार : मलत्याग।
सूर्य के साथ आता और जाता है : सिरदर्द।
प्रतिदिन उसी समय : तंत्रिकाशूल।
लगभग प्रतिदिन : सिरदर्द।
डिप्थीरिया के चौथे दिन : अचानक क्रूप-जैसी खाँसी।
बाहरी प्रभाव में आने के बाद कई दिनों तक : खाँसी, भूख का अभाव।
हर दो या तीन सप्ताह में : थोड़ा-सा बाहरी प्रभाव पड़ने पर ठिठुरन और शिथिलता, चेहरा तमतमाया हुआ, सिरदर्द और आधे दिन तक गर्म हाथ।
छह सप्ताह तक : श्वासकष्ट और सूखी खाँसी।
हर तीन या छह महीने में : कब्ज़।
शरद और वसंत : आमाशयिक लक्षण और वातरोग बारी-बारी से।
कई महीनों तक : जीर्ण श्वसनीशोथ।
हर वर्ष : आवधिक पेचिश।
एक वर्ष पहले : ठंड लगने के बाद, खाँसी।
शाम 6 बजे भोजन करता है और लगभग तीन घंटे बाद मुँह में खट्टा पानी भर आता है।
आधे घंटे तक रहता है : शिश्नोत्थान ; पीठ के आर-पार चुभन।
दस घंटे तक रहता है : सिर में दर्द।
कुछ दिनों तक रहते हैं : अग्रबाहुओं पर पिटिकामय उद्भेद।
स्थान और दिशा [42]
दायाँ : दाईं अधिनेत्रगुहिक कटक से आरंभ होकर सिर के एक ओर फैलता दर्द ; आँख और गंडास्थि के चारों ओर दर्द ; आँख की दृष्टि का लोप ; भौंह के मध्य में तीव्र स्पंदन ; छाती के पार्श्व में दर्द ; कनपटी में तीर-सा दर्द ; आँख का पूर्ण पैनस ; आँख में शोथ ; आँख पर एक पुराना क्षतचिह्न ; कान की लौ में खुजली ; होंठ की ओर गलसुआ ; नाक साफ करने पर नाक के पार्श्व में हिंसक शूल ; नासाछिद्र से पानी जैसा स्राव ; नासाछिद्र में अवरोध और रक्तस्राव ; नाक साफ करने पर उसके पार्श्व में हिंसक चुभता दर्द ; नासाछिद्र कठोर पिंडों से भरा हुआ ; नासाछिद्र में अत्यधिक रक्तवाहिकायुक्त, स्पंजी संरचना की सूजन ; नासाछिद्र के किनारे पर छोटा व्रण ; अश्रु-अस्थि का एक स्थान सूजा हुआ और स्पंदित ; नाक के पार्श्व में छोटी गुलिका ; गलसुआ ; निचले जबड़े का मसूड़ा बहुत अधिक सूजा हुआ ; गलतुंडिका पर चकत्ता ; कान तक फैलते दर्द ; अधःपर्शुका में शूल ; अधःपर्शुकीय प्रदेश में दर्द ; अधःपर्शुका में मन्द पीड़ा ; अधःपर्शुका के एक छोटे-से स्थान में दर्द ; अधःपर्शुकीय प्रदेश में निरंतर मन्द कसक ; स्तन के नीचे से अंसफलक के नीचे पीठ तक फेफड़े के आर-पार कौंधते दर्द ; वृक्क-प्रदेश में कसक ; छाती के ऊपरी अग्र और पश्च भाग पर आघात-परीक्षण में मन्द ध्वनि ; फेफड़े के शीर्ष पर दुर्बल खड़खड़ाहटयुक्त श्वास-ध्वनि ; पार्श्व के एक परिसीमित स्थान पर मन्द दर्द ; बाँह में दर्दयुक्त अकड़न ; छाती के पार्श्व में शूल ; नितंब-संधि से घुटने तक दर्द ; अंतर्जंघिका में फाड़ता दर्द ; पिंडली के अग्रभाग पर लाल, दर्दयुक्त, आटे-जैसी मुलायम सूजन ; पादतल पर सीरम से भरा फफोला ; जाँघ पर रक्तयुक्त फोड़ा ; रीढ़ के पार्श्व में रक्तयुक्त फोड़ा ; पादतल पर सीरम से भरे फफोले।
बायाँ : बाईं कनपटी का दर्द दाईं कनपटी तक फैलता है ; सिर के बाएँ पार्श्व और आँख के ऊपर दर्द ; सिर के बाएँ पार्श्व में, गंडास्थि-प्रवर्ध पर हिंसक दर्द ; नेत्रगुहिक चाप के साथ तीर-सा दर्द ; रगड़ने पर नेत्रगोलक स्पर्श-संवेदनशील ; आँख का आंशिक पैनस ; आँख में चुभते, डंक-जैसे दर्द ; स्वच्छमंडल पर छोटी, सफेद, कणिकामय पूयस्फोटिकाएँ ; आँख में अत्यधिक रक्ताधिक्य ; कान में तीर-से दर्द ; कान और कर्णमूल ग्रंथि में शूल ; कान में हिंसक शूल, जो तालु, सिर के पार्श्व और गर्दन तक फैलते हैं ; बाह्य कर्णमार्ग सूजा हुआ और शोथयुक्त ; नासाछिद्र में बहुत ऊपर गुदगुदी ; नासाछिद्र से गाढ़े, पीले पदार्थ का निरंतर स्राव ; गर्दन के बाएँ पार्श्व की पेशी में ऊपर की ओर तीव्र दर्द ; नासाछिद्र के आधे ऊपर तक तीव्र जलनयुक्त दर्द ; नासाछिद्र में स्पंजी सूजन ; ऊर्ध्वहनु-अस्थि में कान की ओर तीर-सा दर्द ; गंडास्थि में भीतर की ओर तीर-सा दर्द ; चेहरे और गर्दन में तारों के झनझनाने जैसा अनुभव ; छाती पर पीड़ादायक स्थान ; गलतुंडिका में तीर-सा दर्द ; जिफॉइड उपास्थि के बाईं ओर एक छोटे-से स्थान में बेचैनी, पीड़ास्पर्शिता और स्पर्श-वेदना ; अधःपर्शुका में दर्द ; नितंब-संधि के पीछे से जाँघ के बाहरी भाग में नीचे की ओर कौंधते तीव्र दर्द ; आँख और ललाट के पार्श्व के आसपास तीव्र दर्द ; गले के पार्श्व में जलनयुक्त अनुभूति ; फेफड़े के शीर्ष पर दुर्बल खड़खड़ाहटयुक्त श्वास-ध्वनि ; पार्श्व से नीचे नितंब-संधि तक कसक ; त्रिकास्थि के बाहरी पार्श्व में दर्द ; अंसफलक के निचले कोण पर शूल ; कोहनी में डंक-जैसा दर्द ; आसन-तंत्रिका के मार्ग में दर्द ; आसन-तंत्रिका में शूल ; नितंब-संधि से घुटने तक दौड़ते दर्द ; टखने में संधि-विच्युति-जैसी अनुभूति।
पहले बायाँ, फिर दायाँ वृक्क-प्रदेश : तीखे, तीर-से दर्द।
बाहर की ओर : कनपटियों और आँखों के ऊपर तीर-सा दर्द।
संवेदनाएँ [43]
छोटे-छोटे स्थानों में दर्द, जिन्हें उँगली के अग्रभाग से ढका जा सकता है।
दर्द पहले एक भाग पर आक्रमण करते हैं, फिर किसी दूसरे भाग में पुनः प्रकट होते हैं।
अनेक भागों में भारीपन की अनुभूति।
मानो सिर फट जाएगा ; शीर्ष पर मानो किसी भार का दबाव हो ; आँखों में मानो रेत पड़ी हो ; मानो नाक फट जाएगी ; मानो नाक सूजी हुई हो ; नाक में किसी कठोर पदार्थ की अकड़ी हुई-सी अनुभूति ; मानो नाक से कोई भारी भार लटक रहा हो ; मानो नासाछिद्र चर्मपत्र के बने हों ; मानो दो ढीली अस्थियाँ एक-दूसरे से रगड़ी जा रही हों ; नाक अत्यधिक भारी लगती है ; बाएँ नासाछिद्र में बहुत ऊपर मानो बाल से गुदगुदी हो ; चेहरे की दाहक अनुभूति से मानो उसकी बुद्धि नष्ट हो रही हो ; जीभ के पिछले भाग पर बाल होने की अनुभूति ; गले में डाट होने की अनुभूति ; मानो अम्लीय द्रव पश्च नासाछिद्रों से होकर तालु पर बह रहा हो ; मानो निगलने के बाद गले में कुछ रह गया हो ; मानो फेफड़ों में रूई ठूँस दी गई हो ; मानो पाचन रुक गया हो ; मानो समूची ग्रासनली में नीचे तक कुछ कठोर हो ; मानो आमाशय ऊपर की ओर झटका खाता हो ; मानो आँतों में कोई वस्तु कुतर रही हो ; गुदा में डाट होने की अनुभूति ; स्वरयंत्र में व्रण जैसा ; गले में गाँठ जैसा ; स्वरयंत्र में सूजन की अनुभूति ; गला मानो धुले हुए मुलायम चमड़े से आस्तरित हो ; उदर में मानो चाकुओं से काटा जा रहा हो ; मानो मूत्र की एक बूँद पीछे रह गई हो ; उरोस्थि पर दर्द, “सुइयाँ चुभने और झनझनाने जैसा” ; मानो श्वासनली के ऊपरी भाग में गाँठ और जीभ के आधार पर आड़े बाल हों ; छाती पर भारी बोझ जैसा ; मानो श्वसनियों की श्लेष्मा-झिल्ली मोटी हो गई हो ; स्वरयंत्र में मानो व्रण के कारण दर्द हो ; मानो छाती में व्रण हो ; गले में बाह्य वस्तु जैसी उत्तेजना ; मानो कटि के आर-पार चाकू घुसा हो ; झुकने पर मानो त्रिकास्थि के आर-पार कुछ चटक गया हो ; मानो दाईं बाँह सो गई हो ; हाथों के क्षतचिह्न ऐसे दिखते हैं मानो उन्हें गद्दी काटने वाले पंच से काटकर निकाला गया हो ; हाथों की अस्थियाँ मानो कुचली हुई हों ; मानो पिंडली की पेशियों के कण्डरा खिंचे हुए हों ; मानो शीर्ष पर कपाल संकुचित हो गया हो ; अस्थियों में मानो सुइयों से शूल हो ; मानो पैर की अस्थि में दर्द हो।
दर्द : अधिजठर में ; एक आँख के ऊपर ललाट में ; दाईं अधिनेत्रगुहिक कटक से आरंभ होकर सिर के एक ओर फैलता हुआ ; बाईं कनपटी में ; पूरे ललाट में ; बाईं कनपटी तक ; दाईं ओर आँख और गंडास्थि के चारों ओर ; सिर के बाएँ पार्श्व और बाईं आँख के ऊपर ; छाती के दाएँ पार्श्व में ; सिर के एक बिंदु पर ; ललाट और शीर्ष में ; पश्चकपाल से ललाट तक ; कानों से ग्रंथियों में ; जीभ बाहर निकालने पर गले में ; सिर के पार्श्व में ; गले से कान तक फैलता हुआ ; कान में, सूजी हुई कर्णमूल ग्रंथि और सिर तक फैलता हुआ ; आमाशय में ; अंगों में ; पीठ के मध्य भाग के आर-पार ; नेत्रगोलकों में ; अधिजठर में ; दोनों अधःपर्शुकाओं में ; दाएँ अधःपर्शुकीय प्रदेश में ; अधिजठरीय गर्त में ; यकृत-प्रदेश में ; उदर में ; आंत्रशोथ जैसा ; प्लीहा-प्रदेश में ; पीठ के आर-पार ; अनुत्रिकास्थि से मूत्रमार्ग तक ; उरोस्थि पर ; गले में ; अधिजठर के आर-पार ; स्वरयंत्र में ; छाती में ; ललाटीय विवरों में ; मध्य उरोस्थि से होकर पीठ तक स्वरयंत्र में ; कटि में ; पार्श्वों में ; त्रिकास्थि में ; कटि के निचले भाग में ; कटि के आर-पार ; os coccygis में ; अनुत्रिकास्थि में ; बाईं आसन-तंत्रिका के मार्ग में, बृहद् ऊरु-कूट के पीछे से पिंडली तक ; नितंब-संधि से घुटने तक ; बाईं नितंब-संधि में ; दाईं नितंब-संधि से घुटने तक ; पिंडलियों की पेशियों के कण्डरों में ; अंतर्जंघिका के मध्य में ; ललाट में ; उदर के ऊपरी भाग में।
अत्यंत कष्टदायक दर्द : कटि के निचले भाग में।
असह्य दर्द : अग्रबाहुओं और हाथों में।
अत्यधिक दर्द : आँखों में।
हिंसक दर्द : कनपटियों में ; सिर में ; सिर के बाएँ पार्श्व में गंडास्थि-प्रवर्ध पर ; पश्चकपाल से ललाट तक ; गले में ; उदर में ; पिंडली की अस्थियों में ; जानुफलक से पैर तक।
तीव्र दर्द : ललाटीय विवरों में ; गर्दन के बाएँ पार्श्व की पेशियों में ऊपर सिर के पार्श्व के एक छोटे-से स्थान तक ; निगलने पर ; बाईं आँख और ललाट के बाएँ पार्श्व के आसपास ; नितंब-संधि में और जाँघ के बाहरी भाग में नीचे की ओर ; अंगों में ; बाँहों में।
बहुत अधिक दर्द : नाक से प्रत्यास्थ डाट निकालने पर ; कलाई के एक स्थान पर ; खड़े होने पर टाँग में।
तीव्र स्पंदनशील दर्द : दाईं भौंह के मध्य में।
फाड़ता दर्द : छाती में ; दाईं अंतर्जंघिका में।
निरंतर फाड़ता दर्द : अधिजठर में।
काटता दर्द : उदर में ; नाभि पर ; निचले अंगों में ; त्रिकास्थि के बाहरी बाएँ पार्श्व में, ऊपर और नीचे की ओर कौंधता हुआ।
छुरा भोंकने जैसा दर्द : तीसरी ग्रीवा-कशेरुका से पाँचवीं वक्षीय कशेरुका तक।
बेधक शूल : कान में ; नाक में।
कौंधते दर्द : सिर में ; फेफड़ों के आर-पार ; बाईं नितंब-संधि के पीछे से बाईं जाँघ के बाहरी भाग में।
हिंसक तीर-सा दर्द : नासामूल से बाईं नेत्रगुहिक चाप के साथ आँख के बाहरी कोण तक, ऊपर घुटने तक।
तीखे, तीर-से, छुरा भोंकने जैसे दर्द : पूरे सिर में।
तीखे, तीर-से, कसकते दर्द : पार्श्वों और पीठ में, पहले बाएँ फिर दाएँ वृक्क-प्रदेश में, जाँघों में नीचे की ओर फैलते हुए।
तीर-सा दर्द : भौंह के ऊपर ; कनपटियों में ; आँखों के ऊपर ; भीतर गले की ओर ; बाईं ऊर्ध्वहनु-अस्थि में ; बाईं गंडास्थि में ; आँख के ऊपर की अस्थि में ; बाईं गलतुंडिका में ; बाएँ कान में ; पीछे से आगे की ओर ; वृक्क-प्रदेश में ; वृक्कों से आँतों तक आर-पार।
तीर-सा दर्द : छाती में ; जाँघों और घुटनों में ; अंगों में।
हिंसक शूल : बाएँ कान में, तालु, सिर के पार्श्व और गर्दन में फैलते हुए ; नाक के दाएँ पार्श्व में।
तीखे शूल : सिर की अस्थियों में ; कर्णपटह के व्रणों में ; दाईं अधःपर्शुका में।
शूल : बाएँ कान और बाईं कर्णमूल ग्रंथि में ; गले में ; अधिजठर और स्तन में, चूचुक तक ; दाईं अधःपर्शुका में ; यकृत-प्रदेश में ; प्लीहा-प्रदेश में ; उदर के आर-पार ; मूत्रमार्ग में ; पुरस्थ ग्रंथि में ; छाती में ; बाएँ अंसफलक के निचले कोण पर ; छाती के दाएँ पार्श्व में ; बाईं आसन-तंत्रिका में।
हिंसक चुभता दर्द : नाक के दाएँ पार्श्व में।
तीखा दर्द : घुटने और नितंब-संधि में।
चुटकी काटने जैसा दर्द : नासासेतु में।
खोदता दर्द : निचले जबड़े की शाखाओं में।
संकुचनकारी दर्द : आमाशय में ; अधःपर्शुकाओं में ; शिश्नमूल पर।
डंक-जैसे दर्द : आँखों में ; जीभ के व्रणों में ; जीभ में ; बाईं कोहनी में ; कनपटियों में ; त्वचा में ; एक कनपटी में ; बाह्य कर्णमार्ग से भीतरी कान तक ; वृक्क-प्रदेश में।
तीव्र जलनयुक्त दर्द : आँख के नीचे गंडास्थि तक फैलता हुआ।
खुरचने जैसा दर्द : दाईं पिंडली के अग्रभाग में।
चुभते दर्द : आँखों में ; बाएँ स्वच्छमंडल की कणिकामय पूयस्फोटिकाओं में ; जीभ में ; गलतुंडिकाओं में ; पीठ के आर-पार ; शिश्नमुण्ड में ; हृदय-प्रदेश में।
दाहक दर्द : सिर में ; ऊपरी पलक पर ; गुदा में ; गले से नीचे और उरोस्थि के साथ ; छाती में ; उरोस्थि में ; अग्रबाहु के मध्य में।
हिंसक कसक : दाईं अधःपर्शुका में ; त्रिकास्थि के एक छोटे-से स्थान में।
स्थिर स्पंदनशील दर्द : त्रिकास्थि में।
व्रण-जैसा दर्द : गले में।
धड़कते दर्द : कानों में।
झटकेदार, कसकता दर्द : बाईं नितंब-संधि में।
कसकता दर्द : सिर के एक ओर ; नासामूल पर ; ललाट में ; पार्श्वों और पीठ में ; वृक्क-प्रदेश में ; बाएँ पार्श्व से नीचे नितंब-संधि तक ; टाँगों में ; नितंब-संधि में ; पिंडलियों में ; जाँघों और घुटनों के सामने।
उड़ते-फिरते दर्द : सिर में ; सभी भागों की ओर।
भटकता दर्द : आँखों में ; नितंब-संधि से घुटने तक ; किसी स्थानविशिष्ट शोथकारी प्रक्रिया के बिना अस्थियों के साथ-साथ ; सभी भागों की ओर।
आमवाती दर्द : आमाशय में ; पीठ में ; दोनों कंधों में ; कोहनियों और कलाई की संधियों में ; उँगलियों की संधियों में ; नितंब-संधियों और घुटनों में ; अंगों में।
छिली हुई-सी पीड़ा : गले से नीचे और उरोस्थि के साथ।
दबावयुक्त दर्द : नासामूल में।
शूलमय दर्द : उदर में।
कुतरता दर्द : अधिजठर पर ; आमाशय में ; अधःपर्शुकाओं में ; नाभि के आसपास ; दाईं ठोड़ी में।
ऐंठन : हाथों में ; पिंडलियों और जाँघ के भीतरी पार्श्व में।
मन्द कसक : दाएँ अधःपर्शुकीय प्रदेश में।
स्पंदित, मन्द, भारी : आँखों के ऊपर ; नाड़ी के साथ स्पष्ट और लयबद्ध ; दाईं अश्रु-अस्थि में।
धकधक : नासामूल के भीतर।
हल्का दर्द : छाती के निचले भाग के आर-पार।
अर्धपार्श्वीय सिरदर्द : छोटे-छोटे स्थानों में।
जठरीय दर्द : आमाशय में।
मन्द दर्द : अधःपर्शुका में ; नाभि के आसपास ; दाएँ पार्श्व में।
मन्द, भारी दर्द : अधोजठर में।
दर्दयुक्त दबाव : गुदा में।
खींचाव : गुदा में ; मूलाधार से मूत्रमार्ग तक दर्दयुक्त।
तारों के झनझनाने जैसा अनुभव : चेहरे और गर्दन के बाएँ भाग में।
कुचले होने जैसी अनुभूति : अस्थियों में।
खरोंचने जैसी अनुभूति : गले में।
जलनयुक्त अनुभूति : प्रभावित भागों में ; अंसफलक के बीच ; गले के बाएँ पार्श्व में ; बाँहों और टाँगों की पूयस्फोटिकाओं की पपड़ियों में ; होंठों की श्लेष्मिक सतह पर।
चुभने की अनुभूति : कान में।
पीड़ास्पर्शिता : सिर की अस्थियों में ; आँखों में ; नाक में ; मसूड़ों की ; जिफॉइड उपास्थि के बाईं ओर एक छोटे-से स्थान में ; गुदा में ; आमाशय पर ; योनि में ; गले की ; स्वरयंत्र की ; छाती की ; एड़ियों में।
छिली हुई-सी अवस्था : योनि में।
हिंसक दाह : दाएँ नासाछिद्र के छोटे व्रण में ; गले में ; टखने के चारों ओर।
अत्यधिक दाहक उष्णता : शरीर के ऊपरी भाग में।
दाह : दोनों आँखों में ; पलकों में ; नाक की ; नासामूल के भीतर ; नासापट की ; चेहरे में ; गले में ; ग्रसनी में ;
आमाशय में ; अधःपर्शुकाओं में ; गुदा में ; उदर में ; मूत्रमार्ग के ग्रंथिल भाग में ; fossa navicularis में ; मूत्रमार्ग के बल्बीय भाग में ; भग के आसपास ; श्लेष्मा-झिल्ली में, जो ऊपर नासाछिद्रों तक फैलती है ; श्वासनली और श्वसनियों में ; पिंडली की अस्थियों में और टाँगों में ऊपर की ओर ; त्वचा में।
गर्मी : आँखों में ; बाह्य कानों में ; बाहरी नाक में ; अधिजठरीय गर्त में ; मूत्रमार्ग में।
दर्दयुक्त अकड़न : दाएँ बाजू की।
मंद, भारी दबाव : यकृत के क्षेत्र में।
संकुचन : आँतों का।
कसाव : हृदय के आसपास ; श्वसनियों के द्विभाजन पर ; छाती में।
दबावकारी अनुभूति : नाक की जड़ पर ; कनपटियों में।
अकड़न : स्वरयंत्र की ; गर्दन के पिछले भाग की ; कंधे के जोड़ की।
अकड़ी हुई अनुभूति : नाक की भित्तियों में।
अंग-अशक्ति : दाएँ बाजू में ; हाथों की।
भराव : आमाशय में ; छाती में।
अत्यधिक भार : अधिजठर-गर्त में ; छाती में।
दबाव : सिर के शीर्ष पर ; आँखों में ; नाक की जड़ पर ; आमाशय में ; गुदा में ; छाती पर ; उरोस्थि पर ; हृदय पर।
भारीपन : सिर का ; ऊपरी पलकों का ; आमाशय में ; छाती पर ; टाँगों का।
दबावजन्य घुटन : छाती में।
हलकापन : सिर में ; पूरे ललाट में।
भ्रमिलता : सिर की।
दम घुटने की अनुभूति : लेटने पर।
शुष्कता : नाक की, मुँह और होंठों की ; गले में ; श्वसनियों में।
मखमली अनुभूति : नाक की भित्तियों पर।
जम्हाई और मूर्छा-जैसी अनुभूति : सिरदर्द के साथ।
बेचैनी : आमाशय में।
जोड़ उखड़ जाने की अनुभूति : बाएँ टखने में।
गुदगुदाहट : बाएँ नथुने में काफी ऊपर ; गले में ; स्वरयंत्र में ; श्वसनियों के द्विभाजन पर।
तीव्र गुदगुदाहट और खुजली : कानों में।
अग्नि-जैसी अत्यंत तीव्र जलती खुजली : पूरे शरीर पर हुए उद्भेद में।
तीव्र खुजली : शरीर की पूरी सतह पर।
खुजलीयुक्त दर्द : जालिकास्थि में।
खुजली : प्रभावित भागों में ; सिर की त्वचा के उद्भेदों में ; पलकों में ; बाहरी कानों में ; कानों के उद्भेद में ; दाएँ कान की लौ में ; चेहरे की पपड़ियों में ; चेहरे की फुंसियों में ; पुरुष जननांगों के रोमयुक्त भागों में ; शिश्नमुण्ड पर ; भग के आसपास ; उरोस्थि के पीछे ; अग्रबाहुओं और हाथों में ; कलाई के ऊपर एक स्थान पर ; ठोड़ी में।
रेंगने की अनुभूति : प्रभावित भागों में।
भीतर शीत और उष्णता : चेहरे में।
शीतलता की अनुभूति : आमाशय और आँतों में।
शीत की अनुभूति : हृदय के आसपास।
ऊतक [44]
कृशता ; रक्ताल्पता ; सामान्य कैकेक्सिया।
नाक, मुँह, गलमुख, ग्रसनी, स्वरयंत्र, श्वासनली, श्वसनियों और यहाँ तक कि गर्भाशय तथा योनि में डिफ्थीरियाई संरचनाएँ।
प्लास्टिक निःस्राव।
किसी भी श्लेष्मकला के रोग, जिनमें चिमड़े, तारदार, चिपके हुए श्लेष्म का स्राव हो अथवा जिसे लंबे तारों के रूप में खींचा जा सके।
प्रतिश्याय का आमवाती दर्दों के साथ एकांतर होना।
आमवात का आमाशयी लक्षणों के साथ एकांतर होना—एक पतझड़ में और दूसरा वसंत में प्रकट होता है।
अस्थियाँ चोट लगी-सी अनुभव होती हैं ; अस्थिक्षय।
तनिक-सी गति से सभी जोड़ों में चटकने की ध्वनि।
लगभग सभी जोड़ों में आमवाती दर्द।
अस्थियों में नुकीली सुइयों की टाँकन-जैसा दर्द।
उपदंश।
स्पर्श। निष्क्रिय गति। चोटें [45]
स्पर्श : ऊपरी पलक पर जलता दर्द ; गर्दन दर्द करती है ; नाक का पृष्ठभाग दर्द करता है ; नथुने के व्रण में तीव्र जलन ; दाएँ निचले जबड़े का मसूड़ा स्पर्श-संवेदनशील ; बायाँ कान और गर्दन दर्द करते हैं ; हाइपोकॉन्ड्रिअक क्षेत्र का दर्द < ; अनुत्रिकास्थि का दर्द < ; गाँठ-जैसी सूजन दर्दयुक्त।
दबाव : दृढ़ दबाव से आँखों के ऊपर की धड़कन > ; सिरदर्द > ; नासासेतु का नोचने-जैसा दर्द > ; दाँत तनिक-सा भी दबाव सहन नहीं कर सकते ; प्लीहा के क्षेत्र में टाँकन < ; उदर संवेदनशील ; पार्श्वों और कटि का दर्द > ; मलाशय का क्षेत्र संवेदनशील ; इससे दर्द गृध्रसी तंत्रिका की पूरी लंबाई में तीर की तरह दौड़ता है।
छाती या गले पर कसे हुए वस्त्र सहन नहीं होते।
दाएँ हाइपोकॉन्ड्रियम के दर्द के कारण तुरंत वस्त्र उतारने पड़ते हैं।
आँखें मलने की इच्छा।
मलना : आँखों की जलती-चुभती अनुभूति <।
खरोंच लगने के बाद : चोट-जैसी सूजन।
ठोड़ी पर प्रहार से : अस्थ्यावरणशोथ।
त्वचा [46]
त्वचा में जलनभरी चुभन।
त्वचा गर्म, शुष्क और लाल।
शरीर का पूरा निचला भाग—सामने नाभि से थोड़ा नीचे और पीछे नितंबों के ऊपरी भाग से लेकर जाँघों तथा टाँगों तक—चिकने, चमकीले, उभरे हुए, चटख लाल उद्भेद से ढका हुआ, जिससे ये भाग उबले हुए लॉब्स्टर के खोल-जैसे दिखते हैं ; त्वचा मोटी और कड़ी हुई दिखाई देती है ; अधिक उत्तेजना या गर्मी नहीं।
रात में बिस्तर में गर्म होने पर त्वचा में गर्मी और खुजली, जिसके बाद आलपिन के सिर से लेकर आधे मटर के आकार तक की लालिमा लिए कठोर गाँठें निकलती हैं ; बीच का भाग धँसा हुआ और उस पर गहरी पपड़ी, जिसके चारों ओर शोथयुक्त आधार होता है।
खसरे-जैसा शुष्क उद्भेद।
उद्भेद निकलते समय भर्राई हुई, क्रूपस, कष्टप्रद खाँसी ; नाक दुखती है, नथुनों में छोटे व्रण और चिमड़ा, गाढ़ा, लसदार तथा कड़ा स्राव ; कफ तारदार और चिमड़ा तथा बड़ी कठिनाई से अलग होता है। θ खसरा।
पिटिकायुक्त उद्भेद, जो पिंडली पर एक स्थान से आरंभ होकर पूरे शरीर पर फैल गया ; बड़े, लाल और अनियमित पिटिकायुक्त उभार, खसरे-जैसे किंतु उससे अधिक उभरे हुए, जिनमें अग्नि-जैसी अत्यंत तीव्र और अत्यधिक जलती खुजली, विशेषकर रात में, जिससे वह पूरी रात कमरे में चलने को विवश होती है ; सामान्य दुर्बलता ; अधिजठर में कुतरने-जैसी पीड़ा और दर्द तथा वहीं भीतर खुजली की अनुभूति, भोजन करने से > ; मलत्याग होता है ; मूत्र गर्म और गहरे रंग का तथा कभी-कभी अल्प ; ऋतुस्राव नियमित।
पूरी त्वचा पर तीव्र खुजली ; फिर छोटी फुंसियाँ बनती हैं, अधिकतर बाजुओं और टाँगों पर ; पपड़ियाँ चुभती, दुखती और जलती हैं ; गर्म मौसम में <, ठंडे मौसम में >।
पूरे शरीर पर चेचक-जैसी छोटी फुंसियाँ ; वे फूटे बिना गायब हो जाती हैं ; अधिकतर चेहरे और बाजुओं पर।
पूरे शरीर पर फुंसियाँ, जो त्वचा के शोथयुक्त भागों पर निकलती हैं, मटर जितनी बड़ी और बीच में छोटी काली पपड़ी वाली।
पूरे शरीर पर उद्भेद, जो त्वचा पर छोटी गाँठ के रूप में आरंभ होता है, फिर शोथयुक्त होकर लाल हो जाता है और अंततः रक्तमिश्रित द्रव छोड़ता है तथा शोथयुक्त आधार वाली छोटी, धँसी हुई, व्रणित सतह छोड़ जाता है, जो भरकर फिर फूट निकलती है ; स्राव जहाँ भी छूता है, वहाँ नया स्थान बन जाता है ; रात में तीव्र खुजली। θ फुंसीदार उद्भेद।
नाखूनों की जड़ों पर छोटी फुंसियाँ, जो हाथों पर फैलकर कलाइयों तक पहुँचती हैं ; बाजू लाल, कांख की ग्रंथियों में पूय बनता है ; हाथों की छोटी फुंसियाँ फूटने पर पानी-जैसा द्रव स्रावित करती हैं ; उन्हें न छेड़ा जाए तो द्रव गाढ़ा होकर पीले, चिमड़े पिंड में बदल जाता है।
फोड़े-जैसा उभार, जो कठोर मध्यभाग और बाहर लटके हुए किनारों वाले बड़े व्रण में बदल गया।
दाईं जाँघ पर रक्तफोड़ा ; मेरुदंड के दाईं ओर, अंतिम पसली के निकट ; तनिक-सी गति से दर्द।
पुटिकायुक्त उद्भेद।
दाएँ पैर के तलवे पर सीरम से भरे फफोले।
ठंड लगने के बाद हरपीज़, बहते प्रतिश्याय और श्वसनी की उत्तेजना के साथ।
उँगलियों अथवा शिश्नमुण्डमाला पर पपड़ियाँ ; हाथों पर गहरे, चुभनयुक्त चिह्न।
गले पर झाइयों-जैसे भूरे धब्बे।
पूययुक्त दाद (ecthyma)।
फुंसीदार सिफिलोडर्मा।
इम्पेटाइगो, फुंसियाँ।
हरपीज़ ज़ोस्टर।
ल्यूपस, जीर्ण रूप, जलन और खुजली के साथ।
उद्भेद गर्म मौसम में आरंभ होता है।
खरोंच लगने के बाद गाँठ-जैसी सूजन, जो अनियमित व्रण बनाती है, शुष्क पपड़ी से ढकी और स्पर्श से दर्दयुक्त ; त्वचा के नीचे घट्टे-जैसी कठोर, चलायमान गाँठ, जिसके बीच में छोटा व्रणित स्थान होता है, जहाँ वह बाह्यत्वचा को छूती है ; भरा हुआ व्रण सफेद त्वचा से ढक जाने के बाद भी कठोर, गाँठदार अनुभूति बनी रहती है।
व्रण : गहरे, पीले, शुष्क, अंडाकार ; किनारे बाहर लटके हुए, चारों ओर चटख लाल परिवलय ; आधार कठोर, क्षरणकारी ; निरंतर गहरे होते हुए ; बीच में कालापन लिए धब्बा ; चिह्न धँसा हुआ रह जाता है ; इतने गहरे मानो पंच से काटकर निकाले गए हों, किनारे नियमित।
उपदंशजन्य व्रण, गहरे और कठोर किनारों वाले, जननांगों, गले, गललुंबिका, नासापट आदि पर।
व्रण ठंडे मौसम में दर्दयुक्त।
पूययुक्त, एकल त्वचीय गुलिकाएँ, जो गहरे छिद्र बनाती हैं।
सिर और उसकी त्वचा बालों की जड़ों पर शुष्क, लाल, शल्कयुक्त चकत्तों से ढकी तथा बाल झड़ते हैं ; रात में बहुत खुजली, किंतु न नमी, न दर्द ; चेहरे और शरीर पर भूरे चपटे धब्बे तथा पिटिकाएँ ; कानों के पीछे की ग्रीवा-ग्रंथियाँ सूजी हुई और दर्दयुक्त ; जानुका से पैर तक “कड़ी-जैसे” प्रकार का तथा मानो अस्थि में हो ऐसा तीव्र दर्द ; दर्द बिस्तर में और लेटने पर < ; रात में उठकर अधिकांश समय चलना पड़ता है ; कभी-कभी अंतर्जंघिका के साथ बहुत सूजन ; टाँग अस्थियों के साथ सूजी हुई और आटे-जैसी दबने वाली अनुभव होती है ; निगलते समय, विशेषकर रात में, गला दुखता है और लाल होता है, किंतु व्रणित नहीं ; जीभ पर कई चपटे, उभरे हुए व्रण और बीच में एक बड़ा चकत्ता ; आवाज भर्राई हुई ; कब्ज ; भोजन के बाद मिचली ; गर्मी की लहरें और पसीना ; ऋतुस्राव नियमित किंतु दर्दयुक्त। θ उद्भेद और अस्थ्यावरणशोथ, संभवतः उपदंशजन्य।
जीवन-अवस्था, देहप्रकृति [47]
स्थूल, हल्के रंग के बालों वाले व्यक्ति, जो प्रतिश्यायी, उपदंशजन्य अथवा स्क्रोफुलस रोगों से पीड़ित हों।
स्थूल, गोल-मटोल, छोटी गर्दन वाले बच्चे, जिनमें क्रूपस शोथ की प्रवृत्ति हो।
लालिमा लिए वर्ण, चकत्तेदार लाल रूप और मोटी त्वचा वाले व्यक्ति।
अपचग्रस्त बीयर पीने वाले।
श्लेष्मिक सतहों के प्रतिश्याय से ग्रस्त होने वाले व्यक्तियों के अनुकूल।
लड़का, æt. 5 महीने ; कब्ज।
बच्चा, æt. 5 महीने, स्क्रोफुलस देहप्रकृति, तीन महीने से अस्वस्थ ; सिर पर उद्भेद।
लड़का, æt. 10 महीने, तेजस्वी, चंचल, हल्के वर्ण वाला ; झिल्लीदार क्रूप।
बच्चा, æt. 11 महीने ; डिफ्थीरिया।
लड़की, æt. 18 महीने ; शरीर पर उद्भेद।
बच्चा, æt. 1 1/2 ; छह महीने पहले काली खाँसी हुई थी, तभी से पीड़ित ; खाँसी।
लड़का, æt. 2 ; स्क्रोफुलस नेत्रश्लेष्मलाशोथ।
लड़का, æt. 2 1/2, नौ महीने से पीड़ित ; स्वरभंग।
लड़का, æt. 3, अच्छी देहप्रकृति ; श्वसनीशोथ।
लड़की, æt. 3 ; झिल्लीदार क्रूप।
बच्चा, æt. 3 ; अतिसार।
लड़का, æt. 4 ; स्क्रोफुलस नेत्रश्लेष्मलाशोथ।
बच्चा, æt. 4 ; डिफ्थीरिया।
लड़की, æt. 4, गोरा वर्ण ; डिफ्थीरियाई क्रूप।
लड़की, æt. 4, हल्का वर्ण, सन-जैसे हल्के सुनहरे बाल ; झिल्लीदार क्रूप।
लड़का, æt. 4, रक्तप्रधान प्रकृति ; जीर्ण अतिसार।
लड़का, æt. 5 ; डिफ्थीरियाई क्रूप।
लड़की, æt. 5, हल्के रंग के बाल, काली खाँसी हुई थी, जिसके बाद ठंड लगी ; आमाशय-आंत्र की उत्तेजना।
लड़की, æt. 5 ; फुंसीदार उद्भेद।
लड़का, æt. 6, दो दिन से पीड़ित ; प्रतिश्यायी नेत्रशोथ।
लड़का, æt. 6 ; स्क्रोफुलस नेत्रश्लेष्मलाशोथ।
बच्चा, æt. 6 ; डिफ्थीरिया।
लड़की, æt. 7, जीवन के अधिकांश समय से प्रभावित ; स्क्रोफुलस नेत्रशोथ।
लड़का, æt. 7, लसीकाप्रधान, पीला वर्ण, रक्तप्रधान प्रकृति ; उद्भेद।
लड़की, æt. 8, चार वर्ष पहले काली खाँसी हुई थी, तभी से अस्वस्थ ; बार-बार होने वाले श्वसनी-आक्रमण।
लड़का, æt. 8, स्थूल, बड़ा सिर, जलने के बाद ; पेचिश।
लड़की, æt. 8 1/2 ; स्क्रोफुलस नेत्रश्लेष्मलाशोथ।
लड़का, æt. 9 ; स्क्रोफुलस नेत्रश्लेष्मलाशोथ।
बच्चा, æt. 10 ; डिफ्थीरिया।
लड़की, æt. 10, छह सप्ताह से अस्वस्थ ; एक्ज़िमा।
लड़की, æt. 11, दो महीने से अस्वस्थ ; वमन।
लड़की, æt. 12, छह वर्ष पहले क्रूप हुआ था, तभी से पीड़ित ; स्वरभंग ; खाँसी।
लड़की, æt. 13, एक महीने से पीड़ित ; स्क्रोफुलस नेत्रशोथ और स्वच्छमंडल का व्रणीकरण।
लड़की, æt. 13 ; गले में दर्द।
लड़की, æt. 13 ; क्रूप।
लड़की, æt. 14, अभी ऋतुस्राव आरंभ नहीं हुआ ; आमाशय का रोग।
लड़का, æt. 14, लसीकाप्रधान, स्नायविक प्रकृति, हल्के बाल, हल्की आँखें ; फुंसीदार उद्भेद।
लड़की, æt. 15, एक वर्ष से पीड़ित ; नाक का प्रतिश्याय ; युवती, æt. 17, अभी-अभी भारत से लौटी ; दाएँ हाइपोकॉन्ड्रियम में दर्द।
लड़की, æt. 17, एक वर्ष पहले ठंड लगी थी, तभी से पीड़ित ; श्वसनीशोथ।
युवती, कई महीनों से पीड़ित, शल्यक्रिया असफल ; नासा-पॉलिप।
लड़की, रक्तप्रधान, लसीकाप्रधान प्रकृति, डिफ्थीरिया के बाद छह वर्ष से ; अंगों में दर्द।
महिला, æt. 22 ; हाइपोकॉन्ड्रिअक क्षेत्र में दर्द।
पुरुष, æt. 22, दो वर्ष पहले उपदंश हुआ था ; टाँग पर व्रण।
स्त्री, æt. 22 ; उपदंश।
पुरुष, æt. 24, आमाशयी और आमवाती कष्ट ; पीठ में दर्द।
युवक, सुनहरे बालों वाला ; आमाशयी विकार।
युवा टेनर गायक, ठंड लगने के बाद ; स्वरयंत्रशोथ।
पुरुष, æt. 24, स्वस्थ, एक महीने पहले कनपटियों में अचानक तीव्र दर्द हुआ, तभी से पीड़ित ; सिरदर्द।
अधिकारी, æt. 24, शक्तिशाली, रक्ताधिक्ययुक्त देहप्रकृति, पित्तप्रधान स्वभाव, 15 महीने पहले शैंकर हुआ था ; उपदंश।
युवती, दो बच्चों की माँ ; गले का व्रणयुक्त दर्द।
स्त्री, दुर्बल स्वास्थ्य वाली, पाँच वर्ष से विवाहित ; उद्भेद और अस्थ्यावरणशोथ।
स्त्री, æt. 25, अविवाहित, तीन महीने से पीड़ित ; व्रणकारी मुखशोथ।
महिला, æt. 25, स्क्रोफुलस देहप्रकृति, कई वर्षों से पीड़ित ; निमोनिया।
पुरुष, æt. 26 ; जीर्ण श्वसनीशोथ।
स्त्री, æt. 26, सुनहरे बालों वाली, छोटी कद-काठी, फौलादी धूसर आँखें, ऑक्सीजनॉइड देहप्रकृति ; छरहरी, किंतु क्षय-प्रवृत्त देहसंरचना नहीं ; अत्यधिक स्नायविक, तनिक-से रोग पर भी चिंता ; चिड़चिड़ापन, ऐंठन की प्रवृत्ति और रोनेवाला स्वभाव ; आसानी से ठंड लगती है और तब प्रतिश्याय तथा खाँसी लंबे समय तक कष्ट देते हैं ; तीव्र आमाशयी और आंत्रिक प्रतिश्याय से पीड़ित रही, जिसके लिए उसने सिल्वर नाइट्रेट की बहुत बड़ी मात्राएँ लीं ; क्षय रोग।
स्त्री, æt. 27, विवाहित ; आधासीसी।
पुरुष, æt. 27 ; पैनस सहित ट्रेकोमा।
स्त्री, æt. 28 ; व्रण।
पुरुष, æt. 28 ; फुंसीदार उद्भेद।
स्त्री, æt. 30, ग्यारह वर्ष पहले उपदंश हुआ था और पारे से उपचार किया गया था; एक मृतजात शिशु हुआ था ; उपदंशजन्य गले की पीड़ा।
आयरिश पुरुष, æt. 30, बलवान और स्वस्थ, दिन में काम कर सकता है और अपने नाश्ते तथा दोपहर के भोजन का आनंद लेता है ; आमाशय का विकार।
पुरुष, æt. 30, कुछ महीने पहले ठंड के संपर्क में आने के बाद ; वृक्कों का विकार।
महिला, æt. 30, अविवाहित, वर्षों से पीड़ित ; ग्रसनी-द्वार और स्वरयंत्र का विकार।
स्त्री, æt. 30, तीन महीने पहले प्रसव के बाद से ; खाँसी।
श्रीमती ---, æt. 30, नाज़ुक स्वास्थ्य वाली, पसीना आने की प्रवृत्ति ; पापुलीय त्वचा-उद्भेदन।
पुरुष, æt. 32 ; अधिनेत्रगुहा तंत्रिकाशूल।
पुरुष, æt. 32, तीन वर्षों से पीड़ित ; दाईं ओर दर्द।
श्रीमती D., æt. 32, क्षयप्रवृत्त शरीर-रचना, लसीकाप्रधान प्रकृति ; जठर-ज्वर के हल्के आक्रमण से स्वास्थ्यलाभ कर रही थीं ; अंतर्जंघिका में दर्द।
स्त्री, æt. 33, कई वर्ष पहले उपदंश हुआ था ; नाक और गले का विकार।
स्त्री, æt. 35, विवाहित, सुनहरे बाल, स्थूल ; लगभग दस दिनों से प्रतिदिन पीड़ित ; दाएँ अधःपर्शु प्रदेश में दर्द।
पुलिसकर्मी, æt. 35, एक महीने से पीड़ित ; सायटिका।
नौकरानी, æt. 36, तीन वर्षों से पीड़ित ; सिर की त्वचा का एक्ज़िमा।
स्त्री, æt. 36, दो महीनों से पीड़ित ; स्वरयंत्र का विकार।
स्त्री, æt ; 37, सात सप्ताह से बीमार ; जठर-विकार।
स्त्री, æt. 38, छह महीनों से पीड़ित, सिरदर्द।
पुरुष, æt. 38, दुबला, सुनहरे बालों वाला, चार स्वस्थ बच्चों का पिता, चार वर्ष पहले उपदंश हुआ था और पारे से कठोर उपचार किया गया था ; स्वाद और गंध लुप्त होने के साथ प्रतिश्याय।
पुरुष, æt. 39, 18 महीनों से पीड़ित ; अपच।
स्त्री, æt. 39, सामान्य स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ, दुर्बल शरीर ; टाँग पर व्रण।
पुरुष, æt. 40 ; सिर पर फोड़े।
पुरुष, æt. 40, दो वर्षों से अस्वस्थ, आमवाती गाउट और आमवाती परितारिका-शोथ हो चुका है ; आँखों का शोथ।
महिला, æt. 40, मोटी, गोरी, लालिमायुक्त वर्ण की, भोजन के साथ बीयर और शाम को व्हिस्की लेती है, यकृत-वृद्धि और पीलिया से पीड़ित ; अपच।
अधेड़ स्त्री, चार वर्षों से पीड़ित ; जठर-विकार।
पुरुष, लंबा, दुबला शरीर, आठ वर्षों से पीड़ित ; सायटिका।
लालिमायुक्त वर्ण और लाल बालों वाली स्त्री, पति को विवाह से पहले उपदंश हुआ था ; पाँच वर्ष पहले गले में पीड़ा और होंठों पर व्रण हुए थे ; पहले दो बच्चे समयपूर्व और मृतजात हुए, शेष दो दुर्बल, अब पिछले छह महीनों से स्तनपान करा रही है ; उपदंशजन्य अस्थ्यावरण-शोथ।
स्त्री, æt. 44, एक पखवाड़े से पीड़ित ; अधिनेत्रगुहा तंत्रिकाशूल।
महिला, æt. 44, स्थूल, लालिमायुक्त मुखाकृति, दीर्घकालिक खाँसी की प्रवृत्ति ; तीव्र श्वसनी-प्रतिश्याय।
पुरुष, æt. 45 ; स्वरयंत्र-शोथ।
श्रीमती ---, æt. 45, स्नायविक प्रकृति ; स्वरयंत्र और श्वासनली का दीर्घकालिक शोथ।
पुरुष, æt. 45 ; दीर्घकालिक श्वसनी-शोथ।
पुरुष, æt. 45 ; खाँसी।
स्त्री, æt. 46, एक महीने से पीड़ित ; सिरदर्द।
पुरुष, æt. 46, सात वर्षों से पीड़ित ; पूयिकामय त्वचा-उद्भेदन।
पुरुष, æt. 48, दीर्घकालिक श्वसनी-शोथ।
पुरुष, æt. 48 ; पूयिकामय त्वचा-उद्भेदन।
पुरुष, æt. 50, पिछले 23 वर्षों में तीन बार शल्यक्रिया हुई ; नासिकीय पॉलिप।
श्रीमती H., æt. 50, सिर में जुकाम और सिर की ओर रक्तसंचय होने की प्रवृत्ति, लगभग दो वर्ष पहले इन्फ्लुएंज़ा के बाद मासिक धर्म बंद हो गया था ; नाक का दीर्घकालिक प्रतिश्याय।
पुरुष, æt. 50, स्थूल, लाल चेहरे वाला, कई महीनों से पीड़ित, दाहक पदार्थों और प्रतिक्षोभकों से उपचार किया गया था ; बहरापन सहित बढ़े हुए टॉन्सिल।
स्त्री, æt. 50, नाज़ुक स्वास्थ्य वाली ; स्वरयंत्र-शोथ।
पुरुष, æt. 50, आमवाती ; सर्वांगीन पीड़ाएँ।
पुरुष, æt. 50, चोट लगने के बाद ; अस्थ्यावरण-शोथ।
पुरुष, æt. 50 ; वृक्कों का विकार।
महिला, æt. 52 ; नेत्रश्लेष्मला का पॉलिप।
पुरुष, æt. 55, मेजर ; स्वरयंत्र और श्वासनली का दीर्घकालिक शोथ।
पुरुष, æt. 55 ; दीर्घकालिक श्वसनी-शोथ।
स्त्री, æt. 60, दुर्बल, आमवाती, कई सप्ताह से नाक से स्वच्छ, जलवत् द्रव के अचानक और प्रचुर स्राव के दौरों से पीड़ित थी, जो अचानक बंद हो गए ; ग्रासनली का विकार।
पुरुष, æt. 60, 16 वर्ष पहले गिरकर टाँग में चोट लगी थी ; अस्थ्यावरण-शोथ।
श्रीमती ---, æt. 60, अपच और मतलीयुक्त सिरदर्द के दौरों की प्रवृत्ति ; ल्यूपस।
पुरुष, æt. 62 ; दीर्घकालिक आमवात।
पुरुष, æt. 64, 40 वर्ष पहले उपदंश हुआ था, किंतु बीच की अवधि में उसका कोई लक्षण नहीं था, पिछले दस वर्षों से ; गाल पर व्रण।
स्त्री, æt. 65 ; खाँसी।
पुरुष, æt. 67 ; श्वसनी-शोथ।
पुरुष, æt. 69 ; दीर्घकालिक श्वसनी-शोथ।
पुरुष, æt. 82, भारत में तीस वर्ष रहा था, ज्वर, पेचिश और श्वसनी-शोथ हुए थे ; मल सामान्यतः ढीला, नस्य लेने का अभ्यस्त ; नाक का दुर्दम व्रणीकरण।
संबंध [48]
इसका प्रतिकार करते हैं : Arsen., Laches . (क्रूप, डिफ्थीरिया आदि), Pulsat . (भटकती पीड़ाएँ)।
यह प्रतिकार करती है : बीयर के प्रभावों का ; आर्सेनिकयुक्त वाष्पों के प्रभावों का ; Mercur., Merc. jod . का।
अनुकूल : पेचिश में Canthar . के बाद ; क्रूप में Iodium के बाद, जब कर्कश खाँसी के साथ दृढ़ झिल्ली, सामान्य दुर्बलता और शीतलता उपस्थित हों ; प्रतिश्यायी विकारों और त्वचा-रोगों में Ant. tart . इसके बाद अच्छा काम करती है।
तुलना करें : क्रूप में Bromium ; नेत्रगुहा की पीड़ाओं में Cannab . ; क्रूप, व्रण आदि में Hepar ; पारे के उपचार के बाद उपदंशजन्य विकारों में Kali i . ; अस्थि-रोगों में Mezer . ; उपदंश में Nitr. ac . ; उपदंशजन्य अस्थि-विकारों में Phytol . ; क्रूप में Spongia ; अस्थि-विकारों में Silica।