Colchicum autumnale

Timothy F. Allen द्वारा — शुद्ध Materia Medica का विश्वकोश

चिकित्सकों और विद्यार्थियों के लिए ऐतिहासिक संदर्भ। नीचे दिए गए कथन उल्लिखित लेखक की होम्योपैथिक शिक्षाओं को दर्शाते हैं और उपचार की प्रभावशीलता को प्रमाणित नहीं करते। यह पाठ चिकित्सकीय सलाह नहीं है और इसे उचित निदान या देखभाल का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

Colchicum autumnale, Linn.

प्राकृतिक कुल , Liliaceæ.

सामान्य नाम (जर्मन), Zeitlose.

तैयारी , वसंत ऋतु में खोदे गए कंद का टिंचर (Stapf के औषध-परीक्षण)। [विश्लेषणों के अनुसार कंद पतझड़ में, फूल खिलने के ठीक बाद, सर्वाधिक सक्रिय होते हैं, Schroff, Œst. Zeit. f. p. Heilk., 1856. T. F. A.]

स्रोत। (1 से 46 , Reil के ग्रंथ और संकलन से, Hom. Vjschfts., 8, 113)।

1 , Stoerck ने ताजी जड़ को दो मिनट तक जीभ से लगाकर रखा; 2 , वही, मद्य के साथ जड़ के 3 ग्रेन लिए; 3 , वही, रोटी में ताजी जड़ का 1 ग्रेन लिया; 4 , Lewins, Edinb. Med. Journ., 1837, एक छात्र ने टिंचर की 20 से 60 बूँदें लीं; 5 , वही, एक छात्र ने वाइन की 30 से 70 बूँदें लीं; 6 , एक अन्य व्यक्ति, आयु 15 वर्ष, ने 30 से 40 बूँदें लीं; 7 , एक अन्य व्यक्ति, आयु 17 वर्ष, ने 30 से 70 बूँदें लीं; 8 , एक अन्य व्यक्ति, आयु 12 वर्ष, ने सुबह और शाम वाइन की 30 बूँदें लीं; 9 , एक अन्य व्यक्ति, आयु 10 वर्ष, ने 15 से 25 बूँदें लीं; 10 , Boecker, Beiträge, ने 15 से 45 बूँदें लीं; 11 , अन्य औषध-परीक्षकों ने 20 से 45 बूँदें लीं; 12 , Schroff, औषध-परीक्षणों का सामान्य सारांश; 13 , Sonnenberg, टिंचर द्वारा औषध-परीक्षण, Boecker के Beiträge से; 14 , Krahmer, पाँच प्रेक्षणों के परिणाम (टिंचर का औषध-परीक्षण), Boecker के Beiträge; 15 , Bennewitz, 60 वर्षीय पुरुष, गाउट-प्रवण व्यक्ति में एक घंटे के भीतर 50 बूँदों का प्रभाव; 16 , जीर्ण संधिवात से पीड़ित 40 वर्षीय पुरुष ने आधा औंस वाइन ली; 17 , Andreæ, 1834, एक 30 वर्षीय पुरुष ने बीजों का टिंचर लिया; 18 , Newbrandt, एक 52 वर्षीय पुरुष ने बीजों के आसव के 6 औंस लिए; 19 , Santlus, बीजों से 4 वर्षीय बच्चे का विषाक्तन; 20 , Shilling, एक 6 वर्षीय लड़के ने पौधे के कुछ भाग खाए; 21 , एक 56 वर्षीय पुरुष ने 1 1/2 औंस वाइन ली, Edin. Med. and S. J., 14; 22 , Boecker, मूत्र पर प्रभाव; 23 , Krahmer, Heller's Archiv., 1847; 24 , Chelius द्वारा प्रयोग; 25 , Dr. Lindemann, 3d से 15th dils. द्वारा सात औषध-परीक्षण; 26 , वही व्यक्ति, औषध-परीक्षणों की दूसरी शृंखला, 3d dil.; 27 , वही, टिंचर की 2 से 10 बूँदों द्वारा औषध-परीक्षण; 28 , W. S., 3d और 15th dils. द्वारा औषध-परीक्षण; 29 , वही, टिंचर लिया; 30 , C. Sch., एक 30 वर्षीय युवती ने 15th dil. लिया; 31 , वही, टिंचर लिया; 32 , G. Schladt, 3d और 16th dils. द्वारा औषध-परीक्षण; 33 , वही, टिंचर की 2 से 10 बूँदों द्वारा औषध-परीक्षण; 34 , Dr. Link ने टिंचर की 4 से 20 बूँदें लीं; 35 , वही; 36 , Louisa Link, आयु 35 वर्ष, ने टिंचर की 5 बूँदें लीं; 37 , Dr. Schlosser, आयु 30 वर्ष, टिंचर द्वारा औषध-परीक्षण; 38 , वही, 3d और 15th dils. लिए; 39 , Dr. Keil, टिंचर द्वारा औषध-परीक्षण; 40 , Dr. Rückert, आयु 59 वर्ष, 1/10th द्वारा औषध-परीक्षण; 41 , E. R., 20 वर्षीय युवती (नेत्रश्लेष्मला की जीर्ण सूजन से पीड़ित), ने 1/10th लिया; 42 , Dr. Zeichmann, आयु 36 वर्ष, ने 15th dil. लिया; 43 , वही, टिंचर लिया; 44 , Dr. Burkner ने टिंचर लिया; 45 , Dr. Fegerl ने तनुकरण लिए; 46 , Dr. Bohler ने 3d dil. लिया; 47 , Dr. Weber, Deutsch St. Arzk., 1864, एक पुरुष ने बीजों का आसव लिया; 48 , एक अन्य पुरुष ने वही लिया; 49 , एक युवक ने वही लिया; 50 , एक 24 वर्षीय युवती ने वही लिया; 51 , Bethmann, Stapf के औषध-परीक्षण, Archiv. f. Hom., 6, 147; 52 , v. Gersdorf, ibid.; 53 , Hahnemann, ibid.; 54 , Schweikert, ibid.; 55 , Stapf, ibid.; 56 , Marges, Journ. d. Med., 23, Stapf से; 57 , Ehrmann, Diss. de Colch., ibid.; 58 , Boerhaave, ibid.; 59 , Peyer, Peonis et Pythag. exercit., 50, ibid.; 60 , Hopf, Comment. Zom., 6 (1800), ibid.; 61 , Actuarius, Method. Med., lib. 3, ibid.; 62 , Nationalzeit, 1810, ibid.; 63 , De Berge, Journ. d. Med., 22, ibid.; 64 , Collin, Ann. Med., P. II, ibid.; 65 , टिंचर तैयार करते समय बीजों को कूटने के प्रभाव, Unsin के प्रकरण-संग्रह से, A. H. Z., 52, 42; 66 , Dierbach, बीजों से दो बच्चों का विषाक्तन, ibid. से; 67 , Ferreday, Lond. Med. and Phys. J., 1832, एक पुरुष ने दो औंस बीज लिए, ibid. से; 68 , Amer. Med. Lib. and Intell., 1839, कुछ सैनिकों ने Colchicum की कुछ वाइन पी, ibid.; 69 , Hufeland's Journ., 1841, प्रतिदिन एक ड्राम वाइन लेने के प्रभाव, ibid.; 70 , Siebert, Trans. of Nat. Hist. Soc. of Brunswick, 1842, सामान्य प्रभाव, ibid.; 71 , Maclagan, Mon. Journ., 1851, एक 26 वर्षीय युवक ने टिंचर की 20 बूँदें लीं, ibid.; 72 , वही, एक अन्य 25 वर्षीय पुरुष ने टिंचर की 10 बूँदें और बाद में 24 तथा 30 बूँदें लीं, ibid.; 73 , वही, एक स्वस्थ युवती ने टिंचर की 5 बूँदें लीं, ibid.; 74 , वही, B. ने 1 से 5 बूँदों की बार-बार दी गई मात्राओं का औषध-परीक्षण किया, ibid.; 75 , Ollivier, Archiv. Gén. de Méd., 1836, एक 20 वर्षीय युवती ने 4 से 5 औंस टिंचर लिया; 76 , Forget, Hygeia, 15, 87, एक 60 वर्षीय पुरुष ने संधिगत संधिवात के लिए प्रतिदिन 1 ड्राम से 1/2 औंस तक की मात्राओं में टिंचर लिया; 77 , Roux, l'Union Méd., 1855, शल्यक्रियाओं के बाद पाँच व्यक्तियों को भूल से China के स्थान पर 60 ड्राम टिंचर दे दिया गया; 78 , Dr. Freree, Journ. Hebdom., 1835, एक 25 वर्षीय युवती ने 5 औंस लिए; 79 , Chevallier, J. de Chim. Méd., विषाक्तन; 80 , Goullon, विषाक्तन (श्नैप्स समझकर टिंचर लेने से); 81 , Sir Ev. Home, वाइन द्वारा स्वयं पर प्रयोग (Phil. Trans., 1816 and 1817); 82 , Dayton, लगभग 2 औंस वाइन से विषाक्तन, Am. Med. Times., 5, 337; 83 , Henderson, लगभग 1 औंस टिंचर से एक स्त्री का विषाक्तन, Lond. Med. Gaz., 24, 763; 84 , Warncke, एक 14 वर्षीय लड़के ने Colch. वाइन का डेढ़ वाइन-ग्लास पिया, Hosp. Tidende, 1863; 85 , Balluf, Diss. de Colch., 1845, बीजों से ढाई वर्षीय लड़के का विषाक्तन।

मन

  • भावात्मक।
  • प्रलाप (दूसरी संध्या), 21।
  • रात में प्रलाप, 76।
  • बिस्तर के कपड़ों को नोचते रहना, 20।
  • प्रफुल्ल मनोदशा (वैकल्पिक क्रिया), (तीसरा दिन), 37।
  • विशेष रूप से प्रफुल्ल मनोदशा (दूसरा दिन), 27।
  • उदास मनोदशा (तीसरा दिन), 37।
  • व्यग्रता, 17, 65, 77।
  • व्यग्रता, जिसके कारण आहें भरता है, 27।
  • चिड़चिड़ा और तुनकमिज़ाज (दूसरा दिन), 32। [10.]
  • बहुत बदमिज़ाज; चिड़चिड़ी मनोदशा (चौथा दिन), 44।
  • मन खराब; आसन्न अनिष्ट की आशंका, 33।
  • खिन्न और चिड़चिड़ी मनोदशा, 11।
  • अत्यंत खिन्न और चिड़चिड़ा, 10।
  • अत्यधिक तुनकमिज़ाजी (दूसरा दिन), 32।
  • रूखा, बदमिज़ाज, कुछ भी ठीक नहीं लगता, 51।
  • बाहरी प्रभाव, उदाहरणार्थ, तेज प्रकाश, तीव्र गंध, स्पर्श और दूसरों के दुष्कृत्य उसे बिल्कुल आपे से बाहर कर देते हैं, 51।*
  • बौद्धिक।
  • रात में विचारों का तीव्र प्रवाह, जो नींद में बाधा डालता है (दूसरी रात), 25।
  • बौद्धिक क्षमताएँ अत्यधिक क्षीण, 15।
  • तार्किक संबंध का बोध पूरी तरह नष्ट हो गया था और विचार-क्रम को बाधित करने वाली अत्यंत मामूली परिस्थितियों से भी उसकी ग्रहण-क्षमता क्षीण हो जाती थी, 15। [20.]
  • सुसंबद्ध रूप से लिखने में असमर्थ था, 15।
  • विचारों को एकाग्र करने में असमर्थता, जिसके साथ माथा तना हुआ-सा प्रतीत होता है, 27।
  • स्मरणशक्ति की दुर्बलता; वह उन शब्दों को भूल जाता है जिन्हें बोलने वाला होता है और बड़ी कठिनाई से अपने विचारों को समेटकर बोलना जारी रख पाता है (तेरहवाँ और पंद्रहवाँ दिन), 51।
  • अत्यंत भुलक्कड़ और अन्यमनस्क, 51।
  • चेतना-लोप, 20।
  • चेतना और नाड़ी का लोप (दूसरा दिन), 20।
  • बिस्तर पर लिटाते ही तुरंत संज्ञामंद हो गया; तथापि उसे आसानी से जगाकर सचेत किया जा सकता था, 85।

सिर

  • धुंधलापन और चक्कर।
  • सिर में धुंधलापन, 12 ; (दूसरी सुबह), 30 ; (दूसरे दिन), 32, 34, 77।
  • सिर के पिछले और ऊपरी भाग में धुंधलापन, 34।
  • सिर में धुंधलापन, साथ में हल्का चक्कर, 71। [30.]
  • सिर में धुंधलापन, साथ में सिरदर्द, 55।
  • ललाट में धुंधलापन (पहला दिन), 25।
  • ललाट में धुंधलापन, हवा में चलने पर अधिक, कमरे में बेहतर, 27।
  • ललाट में कुछ धुंधलापन (एक घंटे बाद), 27 ; (तीसरे दिन), 26।
  • सुबह सिर में कुछ धुंधलापन, 39।
  • चलने के बाद बैठे रहने पर इतना चक्कर कि गिरने लगे (शीघ्र), 32।
  • उठने पर हल्का चक्कर (दूसरा दिन), 32।
  • क्षणिक हल्का चक्कर, 33।
  • सिर में चक्कर और चकराहट का अनुभव (शीघ्र बाद), 36।
  • सिर में चकराहट, साथ में ललाट के मध्य में धुंधलापन, 27।
  • सिर—सामान्य। [40.]
  • सिर में स्पष्ट रूप से अनुभव होने वाला स्पंदन (एक घंटे बाद), 39।
  • सिर पीछे की ओर गिर जाता है, 20।
  • सिर में रक्त-संकुलता, बिना सिरदर्द के, 39।
  • सिर मोटा-सा लगता है, 27।
  • सिर में बहुत तेज दर्द, 3।
  • सिरदर्द, 7 ; (शीघ्र), 20, 66, 84।*
  • सिर की गहराई में सिरदर्द, जो दोनों कानों के बीच से आर-पार और कुछ पीछे की ओर फैलता है, बहुत तीव्र नहीं, 35।
  • शाम को आरंभ होने वाला अत्यंत तीव्र सिरदर्द, जो पूरी रात रहता है (पाँचवाँ दिन), 36।
  • क्षणिक सिरदर्द (चौथा दिन), 10।
  • शाम को क्षणिक सिरदर्द, 13। [50.]
  • ऐसा अनुभव मानो कोई वस्तु सिर को कसकर बाँधे हुए हो (तीसरा दिन), 83।
  • सिर में यहाँ-वहाँ विभिन्न स्थानों पर चिकोटी काटने-जैसे दर्द; क्षणिक, 52।
  • खुली हवा में चलने के बाद कमरे में जाने पर पूरे सिर में दबावकारी दर्द, जो कुछ देर सोने के बाद लुप्त हो जाता है (चौथा दिन), 40।
  • दबावकारी, महीन ढंग से भीतर कुरेदने वाला सिरदर्द, दाईं ओर और शिखर में अधिक (चौथा दिन), 44।
  • सुबह उठने के बाद, विशेषकर सिर हिलाने पर, ऐसा अनुभव मानो पिछला सिरदर्द लौट आएगा; धोने के बाद यह दबावकारी सिरदर्द बन गया और पूरे दिन जारी रहा, शाम की ओर बढ़ता गया तथा सिर के बाहरी पिछले भाग में स्थित था, 34।
  • मस्तिष्क में बार-बार हल्की चुभनें, 39।
  • मस्तिष्क में क्षणिक चुभनें, विशेषकर अग्रभाग में, कोरोनल सीवन के नीचे (एक घंटे बाद), 39।
  • सिर में फाड़ता दर्द, विशेषकर ललाटीय क्षेत्र में, 73।
  • ललाट।
  • पूरे ललाट में अत्यंत तीव्र दर्द, विशेषकर भौंहों के ऊपर, जो नाक के पृष्ठ तक फैलता है (तीसरा दिन), 71।
  • सुबह जागने पर ललाट की दाईं ओर एक छोटे-से स्थान में अत्यंत तीव्र दर्द, 34। [60.]
  • दाएँ ललाटीय उभार में तंत्रिकाशूल-जैसा दबावकारी दर्द, जिसके अनुरूप दाएँ पश्चकपाल उभार में मंद दर्द होता है; दबाव और ठंड से राहत, 38।
  • भोजन करते ही बाईं आँख के ऊपर सिरदर्द, खुली हवा में बेहतर, किंतु कमरे में बना रहता है और बहुत कष्टप्रद होता है, 41।
  • ललाट के मध्य में महीन सिरदर्द, साथ में कपाल-तंत्रिकाओं की विचित्र अतिसंवेदनशीलता, 15।
  • कोरोनल सीवन के निकट ललाट में हल्का मंद सिरदर्द (एक घंटे बाद), 39।
  • दाईं आँख के ऊपर बरमे से छेदने-जैसा ललाटीय सिरदर्द (दूसरी सुबह), 32।
  • बरमे से छेदने-जैसा ललाटीय सिरदर्द, विशेषकर बाईं आँख के ऊपर (दूसरी औषध-परीक्षा, दूसरा दिन), 32।
  • ललाट के बाएँ आधे भाग में एक स्थान पर फाड़ने वाली तनावट, मानो फोड़ा बनने वाला हो, 52।
  • आँखों के ठीक ऊपर क्षणिक, खिंचाव वाला, चिकोटी काटने-जैसा सिरदर्द, 52।
  • ललाटीय क्षेत्र में दबाव, मानो सब कुछ बाहर की ओर दब रहा हो, 73।
  • ललाट और आँखों में दबावकारी अनुभूति (दूसरा दिन), 25। [70.]
  • ललाटीय क्षेत्र में दबावकारी दर्द, 73।
  • दाएँ और उसके बाद बाएँ ललाटीय क्षेत्र में दबावकारी दर्द, 74।
  • पश्चकपाल के दर्द के बाद ललाट के ऊपरी भाग में दबावकारी दर्द; गर्माहट और बिस्तर में विश्राम से राहत, 34।
  • दाईं आँख के ऊपर दबावकारी ललाटीय सिरदर्द (तीसरा दिन), 33।
  • दोपहर बाद आँखों के ऊपर दबाने वाला ललाटीय सिरदर्द (दूसरा दिन), 32।
  • आँखों के ऊपर ललाट में तथा कंधों, कोहनियों और कलाइयों में क्षणिक चुभनें (पहला दिन), 32।
  • दाईं आँख के ऊपर ललाट में क्षणिक चुभनें (पहला दिन), 32।
  • कनपटियाँ।
  • शाम को दाईं कनपटी में सिरदर्द, बिस्तर में शांत पड़े रहने पर राहत, 34।
  • बाएँ कनपटी-प्रदेश में पीड़ादायक खिंचाव, 45।
  • दाईं कनपटी में चुभता दबाव, अधिकतर शाम को, 37। [80.]
  • दाईं कनपटी में फाड़ता दर्द, 52 ; (तीसरे दिन), 33।
  • कनपटियों में झटकेदार फाड़ते दर्द, 71।
  • शिखर।
  • खोपड़ी के शीर्ष में दर्द, मानो कोई वस्तु सिर में छेदती जा रही हो; यह पीड़ादायक स्थान सैजिटल सीवन के साथ-साथ खिसकता है, 71।
  • शिखर में हल्का दबावकारी सिरदर्द (पहला दिन), 44।
  • शिखर में दबावपूर्ण भारीपन, 37।
  • पार्श्विका क्षेत्र।
  • सिर की बाईं ओर के ऊपरी भाग में खिंचाव, जो नीचे नाक तक फैलता है, 52।
  • दाएँ पार्श्विका उभार में दबावकारी सिरदर्द (चौथा दिन), 37।
  • सिर की दाईं ओर के ऊपरी भाग में एक छोटे-से स्थान पर दबावकारी सिरदर्द; क्षणिक, 52।
  • सिर के बाएँ आधे भाग में फाड़ता दर्द, जो शिखर तक फैलता है, 52।
  • सिर के बाएँ आधे भाग में तीखा, अत्यंत पीड़ादायक खिंचता-फाड़ता दर्द, जो अधिकतर उसी ओर के नेत्रगोलक से आरंभ होकर पश्चकपाल की ओर फैलता है और कई दिनों तक रहता है, 51। [90.]
  • सिर की दाईं ओर के ऊपरी भाग में एक छोटे-से स्थान पर रेंगने के साथ छेदता-फाड़ता दर्द; बाद में यही दर्द बाईं ओर प्रकट होता है, 52।
  • पश्चकपाल।
  • शाम की ओर सिरदर्द ललाट से पश्चकपाल की ओर फैल गया, 39।
  • मंद, खिंचाव वाला दर्द, जो गर्दन के पिछले भाग से पश्चकपाल के आर-पार कानों तक फैलता है, 71।
  • अनुमस्तिष्क की गहराई में बहुत तीव्र नहीं, किंतु अत्यंत कष्टप्रद दबाव, जो पढ़ने-लिखने के तनिक-से काम से उत्पन्न होता है, 51।
  • पश्चकपाल की दाईं ओर तीव्र दबाव (आधे घंटे बाद), 54।
  • पश्चकपाल में दबाने वाला भारीपन, विशेषकर गति करने या थोड़ा आगे झुकने पर, 51।
  • पश्चकपाल की बाईं ओर एक छोटे-से स्थान में फाड़ता दर्द, 52।
  • पश्चकपाल की दाईं ओर एक छोटे-से स्थान में दबावकारी-फाड़ता दर्द, 52।
  • सिर का बाहरी भाग।
  • बाल बहुत अधिक झड़ते हैं, 51।
  • ऐसी अनुभूति मानो खोपड़ी की त्वचा पीछे से आगे की ओर खोपड़ी के शीर्ष तक खींची जा रही हो, 71। [100.]
  • खोपड़ी की त्वचा में महीन फाड़ते दर्द, 51।
  • चुभते झटकों के कारण लगभग पूरी रात नींद नहीं आती; ये कभी केवल त्वचा में और कभी सिर तथा चेहरे के कोमल ऊतकों की गहराई में होते हैं, 51।
  • ललाट के नीचे सिर में रेंगने की अनुभूति, 55।

नेत्र

  • वस्तुनिष्ठ.
  • आँखें पूरी खुली हुईं, नशे में व्यक्ति की तरह एकटक देखती हुईं, 85।
  • आँखों के चारों ओर काले घेरे, (84); (अठारह घंटे बाद), 17।
  • आँखों के चारों ओर गहरे काले घेरे, 65।
  • आँखों का आक्षेपपूर्ण ढंग से घूमना (चार सप्ताह बाद), 20।
  • आँखों की विकृति, 85।
  • व्यक्तिनिष्ठ.
  • आँखों में सूखापन, 74।
  • आँखों में भारीपन, मानो उसने पर्याप्त नींद न ली हो, साथ में रक्तवाहिनियाँ रक्तसंचित, 39। [110.]
  • आँखों में मन्द सतत पीड़ा, 52।
  • दाईं आँख में दबावकारी दर्द, 52।
  • दाईं आँख में और उसके चारों ओर अल्पकालिक, तीव्र, नुकीला फाड़ता हुआ दर्द, 52।
  • दाईं आँख में काटने-सी पीड़ा, विशेषतः बाहरी नेत्रकोण में, साथ में कुछ अश्रुस्राव और ऐसा अनुभव मानो पलकें आपस में चिपकी हुई हों, 52।
  • भौं.
  • बाईं आँख के ऊपर की हड्डी में प्रत्येक गति पर दर्द; दोपहर और शाम को यह बाईं आँख के ऊपर इतनी तीव्र मन्द पीड़ा तक बढ़ गया कि हर हल्की आवाज़ भी असहनीय लगती थी; दर्द उसी स्थान पर निरंतर बना रहा (लेने के शीघ्र बाद), अगले दिन सिरदर्द उसी स्थान पर लौट आया; सिर की हर गति से बढ़ता था; तीसरे दिन वही दर्द था, किंतु बाईं आँख के ऊपर होने के बजाय पश्चकपाल के दाहिने भाग में था; सिर पीछे झुकाने या आँखें ऊपर उठाने से बढ़ता था; अगले दिन अत्यंत तीव्र सिरदर्द, जो शाम 6 बजे बाईं आँख के ऊपर आरंभ हुआ और सिर के पूरे बाएँ भाग में फैल गया, रात्रि-भोजन के बाद लुप्त हो गया (चौथा दिन); अगले दिन वह बिना सिरदर्द के जागी, किंतु थोड़े समय में दर्द पश्चकपाल के बाएँ भाग में लौट आया और बाईं आँख तथा यहाँ तक कि चेहरे में भी फैल गया, 36।
  • आँखों के ऊपर संकुचन की अनुभूति (दूसरा दिन), 44।
  • भौंहों में हल्का, क्षणिक दबाव, 27।
  • बाईं भौं के ऊपरी भाग में गहराई तक बेधती चुभन, साथ में ऐसा अनुभव मानो वह ऊपर की ओर खिंच रही हो, 73।
  • दाईं आँख के ऊपर सूक्ष्म चुभनें (दूसरा दिन), 33।
  • पलक.
  • बाईं निचली पलक की Meibomian ग्रंथियों में व्रण, साथ में पलक की सूजन और सामान्यतः तंत्रिकाओं की अत्यधिक चिड़चिड़ाहट, 52। [120.]
  • पलकों में निरंतर गति (दूसरा दिन), 20।
  • दाईं ऊपरी पलक में फड़कन, 52।
  • बाईं निचली पलक में भीतरी नेत्रकोण की ओर धीमा किंतु दिखाई देने वाला खिंचाव (फड़कन जैसा), 52।
  • पलकों के किनारों में जलन और लालिमा, जैसी पलकों के प्रदाह में होती है (चौथा दिन), 37।
  • अश्रु-तंत्र.
  • खुली हवा में इतना अश्रुस्राव कि कई दिनों तक मैं मुश्किल से देख सका, 34।
  • नेत्रगोलक.
  • बाईं आँख के कोने में (जो सामान्यतः दाईं आँख की तरह पूरी तरह स्वच्छ रहता था) एक छोटा, सफेद, स्पष्ट सीमांकित धब्बा हो गया, साथ में श्वेतपटल की कुछ लालिमा (चौथा दिन); [यह लक्षण Tartar emetic, Ipecac, Cinnamon आदि प्रतिकारकों के बाद हुआ। -T. F. A.] अगले दिन नेत्रगोलक बढ़ा हुआ था, और धब्बा केवल अत्यंत सावधानी से जाँचने पर दिखाई देता था; स्वच्छमंडल कुछ धुंधला था और अग्र कक्ष के तल पर थोड़ी मात्रा में पूययुक्त पदार्थ पाया गया; लेंस और लेंस-संपुट धुंधले प्रतीत हुए; ऐसा लगा कि कुछ ही घंटों में पूर्ण संपुटीय मोतियाबिंद विकसित हो गया था; स्थानीय रूप से Acetate of lead, गर्दन पर Tartar emetic मरहम और कुछ दिनों बाद बाईं कनपटी पर जोंक लगाकर इसका उपचार किया गया, तब प्रदाह के लक्षण कम हो गए; लेंस धुंधला था और उसमें हरिताभ प्रतिबिंब था; बाद में अग्र कक्ष में एक झिल्लीदार शल्क दिखाई दिया, जिसका ऊपरी सिरा पुतली के निचले किनारे से जुड़ा था और निचला सिरा अश्रु-नलिका की ओर था; वह लगभग दो लाइन लंबा और आधी लाइन चौड़ा था; लेंस स्पष्टतः धुंधला, परितारिका आविल और पुतली प्रकाश के प्रति अत्यंत संवेदनशील दिखाई दी; दो सप्ताह बाद लेंस की हरिताभ आविलता अधिक पीछे स्थित प्रतीत हुई, 20।
  • स्वच्छमंडल बहुत उत्तल और नुकीला हो गया; अपारदर्शी लेंस बढ़ा हुआ प्रतीत हुआ और आगे की ओर परितारिका पर दबाव डाल रहा था (नवाँ दिन)। बारहवें दिन आँख में सुधार था; पश्च कक्ष में अब भी कुछ धुंधलापन था, जो हरिताभ प्रतिबिंब वाले लेंस के कारण था; परितारिका के पीछे, पुतली के किनारे के चारों ओर पीताभ झिल्लीदार निःस्राव दिखाई देता था, जो बाद में पश्च कक्ष में दृढ़ता से चिपक गया; परितारिका भूरी और धुंधली थी; फिर भी पुतलियाँ प्रकाश के प्रति अत्यंत संवेदनशील थीं; यह झिल्लीदार निःस्राव बाद में अग्र कक्ष के तल पर बैठ गया, 20।
  • बाईं आँख का श्वेतपटल कुछ लाल हो गया, स्वच्छमंडल स्पष्ट सीमांकित सफेद धब्बों से ढक गया; अग्र कक्ष में कुछ पूययुक्त द्रव एकत्र हुआ और पश्च कक्ष में संपुटीय मोतियाबिंद बनता हुआ प्रतीत हुआ (पाँचवाँ और छठा दिन), 20।
  • लेंस का रंग ताँबे पर जमी हरी जंग जैसा था (दो सप्ताह बाद), 20।
  • नेत्रगोलकों की गहराई में खिंचावयुक्त, खोदने जैसा दर्द, 51। [130.]
  • बाएँ नेत्रगोलक में दबावकारी दर्द, 34।
  • दाईं आँख में ऐसा अनुभव मानो नेत्रगोलक दबाया जा रहा हो, जो कई सेकंड तक रहता और बार-बार लौटता था (तीसरा दिन), 71।
  • पुतली.
  • पुतलियों में अस्थिरता (आधे घंटे बाद), 44।
  • पुतलियाँ फैली हुईं, 20।
  • पुतलियाँ कुछ फैली हुईं, 85।
  • पुतलियाँ थोड़ी फैली हुईं, 19।
  • पुतलियाँ बहुत अधिक फैली हुईं (दूसरा दिन), 20।
  • पुतलियाँ संकुचित, 65, 68 ; (अठारह घंटे बाद), 17।
  • दाईं पुतली मध्यम रूप से फैली हुई, बाईं अत्यंत संकुचित (छह सप्ताह बाद), 20।
  • दृष्टि.
  • दृष्टि-क्षमता असामान्य रूप से तीक्ष्ण थी, 15। [140.]
  • आँखों के आगे धुंधलापन (दूसरा दिन), 32।
  • खड़े होने का प्रयास करने पर आँखों के आगे अँधेरा छा गया, 67।

कान

  • बाह्य.
  • बाएँ कान के पीछे दर्द, मानो ग्रंथि सूजी हुई हो, 41।
  • दाएँ कान के पीछे, निचले जबड़े के जोड़ के क्षेत्र में फाड़ता हुआ दर्द; वह स्थान कुछ समय तक स्पर्श करने पर दर्दनाक रहा, 52।
  • आंतरिक.
  • कमरे में कुछ कदम चलने पर कान बंद-से लगते हैं और उनमें गर्जन-सी आवाज़ होती है, 51।
  • दायाँ कान बंद-सा लगता है (चौथा दिन), 26।
  • कान में दर्द, फिर कानों की गहराई में सुइयों जैसी चुभन, 52।
  • दाएँ कान में खोदने जैसा दर्द, शीघ्र ही, 33।
  • कानों में चिमटी काटने जैसे दर्द, 51।
  • बाएँ कान में झटकेदार चुभन, 52। [150.]
  • बाएँ कान में चुभनें, 41।
  • बाएँ कान में क्षणिक चुभनें (सात घंटे बाद), 39।
  • दाएँ meatus auditorius में फाड़ता हुआ दर्द, 51।
  • कानों की गहराई में खुजली; कानों को भीतर तक कुरेदने की इच्छा, जो अंदर से बहुत सूखे थे; कुरेदने से अनुभूति कम नहीं होती और खुजली वाले दर्दनाक स्थान तक पहुँचा भी नहीं जा सकता, 35।
  • श्रवण.
  • सुनने में कठिनाई, 20।
  • दाएँ कान में घंटी बजने जैसी आवाज़, 33।
  • कानों में गर्जन-सी आवाज़, 31।
  • दाएँ कान में बहुत तेज गर्जन-सी आवाज़, 73।

नाक

  • वस्तुनिष्ठ.
  • छींकना (लेने के शीघ्र बाद), 52।
  • नाक और ग्रसनीमुख में प्रतिश्याय (चौथा दिन), 37। [160.]
  • तीव्र नजला, 35।
  • हठी नजला, जिसमें स्राव कभी पतला नहीं होता और नाक से बहुत अधिक गाढ़ा, लसीला श्लेष्म निकलता है, 52।
  • स्पष्ट रूप से बहता हुआ नजला (पाँचवाँ दिन), 37।
  • क्षणिक बहता हुआ नजला (दूसरे से चौथे दिन तक), 25।
  • शाम को नकसीर, 51, 73।
  • व्यक्तिनिष्ठ.
  • नथुने सूखे और कालेपन लिए हुए, 20।
  • छींक आने की हल्की उत्तेजना, 71।
  • नाक की श्लेष्मकला में नजला आरंभ होने जैसी अनुभूति, 71।
  • नाक के भीतर गरमी और रेंगने जैसी अनुभूति, जैसी नकसीर में होती है (पंद्रह और तीस मिनट बाद), 54।
  • नाक के ऊपरी भाग में चिमटी काटने जैसी अनुभूति, 52। [170.]
  • नथुनों में दबाव और फाड़ता हुआ दर्द, 71।
  • नासास्थियों में दबाव, 71।
  • नाक और चेहरे की हड्डियों में दबाव, 71।
  • नासास्थियों में ऐसा अनुभव मानो किसी भार का दबाव हो (डेढ़ घंटे बाद), 54।
  • दाएँ नथुने में नाक के पर्दे में दुखनयुक्त दर्द; विशेषतः उस स्थान को छूने और नाक को हिलाने पर अत्यंत तीव्र, 52।
  • नाक में रेंगने जैसी अनुभूति, 52।
  • नाक में रेंगने जैसी अनुभूति, साथ में छींकें, 52।
  • नाक की नोक में रेंगने जैसी अनुभूति, 54।
  • घ्राण.
  • घ्राणशक्ति अत्यंत तीक्ष्ण हो गई, 11।
  • घ्राणशक्ति इतनी तीक्ष्ण कि प्रयोगशाला का काम लगभग असहनीय हो गया, 10। [180.]
  • घ्राणशक्ति इतनी रुग्ण रूप से तीक्ष्ण है कि जिन गंधयुक्त पदार्थों से वह सामान्यतः बिल्कुल अप्रभावित रहता था, जैसे शोरबा, वे उसे मिचली उत्पन्न करते हैं, 51।
  • ताजा फेंटे हुए अंडे की गंध उसे लगभग मूर्छित कर देती है (चौथा दिन), 51।
  • धुएँ में पकाए गए ham जैसी गंध, 34।

चेहरा

  • वस्तुनिष्ठ।
  • मुखमुद्रा अत्यंत कष्टग्रस्त, 80।
  • शिकायत भरी, उदास मुखमुद्रा, 51।
  • चिंतित मुखमुद्रा, 13।
  • चेहरा अत्यधिक चिंता प्रकट करता है, 67।
  • चेहरे की विवर्णता, 48, 50।
  • अत्यधिक विवर्णता, 78।
  • चेहरा पीला (दूसरा दिन), 32। [190.]
  • चेहरा पीला और धँसा हुआ, 16, 65 ; (अठारह घंटे बाद), 17।
  • चेहरा बहुत पीला, 80, 85।
  • चेहरा नीला-सफेद, 84।
  • चेहरा धँसा हुआ, 68।
  • चेहरा धँसा हुआ, हिप्पोक्रेटिक, 19।
  • नैन-नक्श खिंचे हुए, 76।
  • नैन-नक्श पूरी तरह बदल गए हैं और ऐसे दिखाई देते हैं, मानो वह लंबे समय से बीमार रहा हो (पाँच घंटे बाद), 51।
  • व्यक्तिनिष्ठ।
  • चेहरे में, दाईं ओर कनपटी के पास एक छोटे-से स्थान में दर्द (चौथा दिन), 44।
  • चेहरे में दर्द, या दाएँ जबड़े के जोड़ के पास कानों में रह-रहकर उठने वाली टीस (दूसरा दिन), 44।
  • चेहरे की हड्डियों में अत्यंत अप्रिय अनुभूति, मानो उन्हें बहुत दूर खींचकर अलग किया जा रहा हो; उनमें कुछ खिंचावयुक्त झटकों के साथ, 51। [200.]
  • चेहरे की पेशियों में झटकेदार-खींचता दर्द, हड्डियों की गहराई तक, 51।
  • चेहरे की बाईं ओर फाड़ता दर्द और तनाव, जो कान तथा सिर तक फैलता है, 53।
  • गाल।
  • गाल लाल और गर्म, 27।
  • गाल, होंठ और दाईं पलकें जामुनी-लाल, 13।
  • गाल, होंठ और पलकें जामुनी, 67।
  • गाल और ठोड़ी बारी-बारी से पीले और लाल (छह सप्ताह बाद), 20।
  • दोनों गालों में अनुभूति, मानो उन्हें खींचकर अलग कर दिया जाएगा, 71।
  • दाईं ओर ऊपरी जबड़े में हल्का खिंचाव, जो नेत्रकोटर की किनारी तक फैलता है; क्षणिक और गले के क्षोभ के साथ बारी-बारी से होता है (मुझे दाँत-दर्द नहीं होता), (आधे घंटे बाद), 46।
  • बाएँ गाल में सुई चुभने जैसे दर्द, 73।
  • दाएँ ऊपरी और निचले जबड़ों में फाड़ता दर्द, साथ में ऐसी अनुभूति मानो दाँत बहुत लंबे हों, 54। [210.]
  • बाएँ गाल में मंद दर्द, मानो कुचोट या प्रहार से हुआ हो, 74।
  • होंठ।
  • होंठ बहुत पीले और स्पर्श-संवेदनशील हो गए; मुँह की तनिक-सी गति से निचले होंठ की त्वचा फट जाती थी, 41।
  • होंठ केवल थोड़े लाल, 80।
  • होंठ नीले, 85।
  • होंठ और जीभ नीले तथा शुष्क, 84।
  • होंठ और नाखून नीले, 77।
  • होंठ बैंगनी, 78।
  • ऊपरी होंठ पर Hydroa, 25।
  • होंठ फटे हुए, 56।
  • ऊपरी होंठ के लाल किनारे की बाईं ओर तीखा, काटता-फाड़ता दर्द, 52।
  • निचला जबड़ा। [220.]
  • निचले जबड़े के जोड़ में तीव्र तनाव, जिससे उसे सिगार एक ओर रखना पड़ा, और उसके समाप्त हो जाने पर राहत महसूस हुई, 34।
  • जबड़े के दाएँ जोड़ में चिमटने जैसा दर्द, 52।
  • बाएँ निचले जबड़े के नीचे चुभता दबाव (चार घंटे बाद), 39।
  • निचले जबड़े की बाईं ओर अचानक होने वाले क्षणिक, सुई चुभने जैसे दर्द, 39।
  • चर्वणिका पेशियाँ चौड़ाई में बढ़ी हुई प्रतीत होती हैं, जिससे वह मुँह केवल थोड़ा-सा और दर्द के साथ खोल पाता है, 51।

मुख

  • दाँत।
  • दाँत पीसना (तीन दिन बाद), 20।
  • दाँतों के कुंद होने की अनुभूति, साथ में खींचता दर्द, जो ऊपरी जबड़े के दाँतों के सिरों से जबड़े की हड्डी में फैलता है, 71।
  • दाँत बहुत लंबे प्रतीत होते हैं, 71।
  • दाँत-दर्द; दाँत बहुत लंबे प्रतीत होते हैं, 73।
  • ऊपरी पीछे के दाँतों में दर्दभरी कसमसाहट, 52। [230.]
  • (सड़े हुए दाँत चबाते समय दर्द करने लगे), (दूसरा दिन), 32।
  • निचले जबड़े के कृंतक दाँतों में खिंचाव और ठंडक की अनुभूति, 74।
  • किसी गर्म वस्तु के तुरंत बाद कोई ठंडी वस्तु लेने से होने वाला दाँतों में खींचता दर्द (ढाई घंटे बाद), 54।
  • बाईं ओर के निचले पिछले दाँतों में दबावकारी दाँत-दर्द, 52।
  • दाईं ओर के दाँतों में सुई चुभने जैसे दर्द, 41।
  • बाईं ओर के निचले दाँतों की जड़ों में फाड़ता दर्द, 52।
  • दाँत-दर्द, जिससे दाँत पीड़ायुक्त और संवेदनशील हो जाते हैं, 52।
  • दाँत इतने संवेदनशील हैं कि वह उनसे किसी वस्तु को काट नहीं सकता, 51।
  • मसूड़े।
  • दाएँ कृंतक दाँतों के आसपास मसूड़े का पुटकीय शोथ, 38।
  • दाएँ निचले मसूड़े में फाड़ता दर्द, 35। [240.]
  • बाईं ओर के निचले सामने के दाँतों के मसूड़े में फाड़ता दर्द, 52।
  • मुँह के दाएँ ऊपरी भाग में, एक खोखले दाँत के ऊपर, मसूड़े के ऊपरी भाग में फाड़ता दर्द, 52।
  • जीभ।
  • जीभ बहुत सफेद, 85।*
  • जीभ फीकी-नीली और ठंडी, 72।
  • जीभ बहुत पीली, 65।
  • जीभ लाल, श्लेष्मा से ढकी हुई, 49।
  • जीभ चमकीली लाल, केवल जड़ पर परत चढ़ी हुई, 19।
  • सुबह जीभ पर परत, 11।
  • सुबह जीभ पर कुछ परत, 10।
  • जीभ पर सफेद परत (दूसरा दिन), 32। [250.]
  • जीभ पर पीली मोटी परत (अठारह घंटे बाद), 17।
  • जीभ मोटी भूरी मैल से ढकी हुई (आठ दिन बाद), 20।
  • जीभ में भारीपन; सही शब्द ढूँढ़ना और मिल जाने पर उसका उच्चारण करना कठिन था, 15।
  • जीभ पहले भारी, फिर अकड़ी हुई और अंततः संवेदनाहीन हो गई, जिससे छह घंटे तक उसमें लगभग कोई अनुभूति नहीं रही; इसके बाद वह धीरे-धीरे ठीक हुई, 1।
  • जीभ पर मखमली अनुभूति, 39।
  • जीभ में जलन, 57।
  • जीभ की किनारी पर चुभती हुई जलन (पौने दो घंटे बाद), 37।
  • जीभ पर जलन और महीन चुभन की अनुभूति, 56।
  • जीभ में भरेपन की अनुभूति, 74।
  • अनुभूति मानो जीभ बढ़ी हुई हो, 74। [260.]
  • जीभ हिलाने और निगलने पर उसे जीभ की जड़ के आसपास तीखा दर्द हुआ (तीसरा दिन), 83।
  • जीभ की बाईं ओर के पिछले भाग में फाड़ता दर्द, 52।
  • जीभ के बीच में कुछ क्षणिक, सुई चुभने जैसे दर्द (नौ और तेरह घंटे बाद), 54।
  • जीभ और गले में काटने जैसी अनुभूति, 46।
  • मुख के सामान्य लक्षण।
  • ऊपरी होंठ और मसूड़े के मिलन-स्थल पर मटर के आकार का एक छोटा पुटकीय व्रण, जिसमें जलता दर्द है; Kali bichrom. की एक मात्रा देने के बाद तक वह बढ़ता रहता है (तीसरा दिन), 37।
  • पूरे मुँह की संवेदनशीलता मंद, विशेषकर जीभ की नोक की; तुरंत, 71।
  • मुँह में शुष्कता (पहली रात), 32।
  • मुँह में गर्मी और शुष्कता की अनुभूति (दो घंटे बाद), 39।
  • मुँह में गर्मी, सामान्य से कुछ अधिक प्यास, 55।
  • मुँह और आमाशय में जलन, 70। [270.]
  • मुँह और पूरे ग्रसनी-प्रदेश में जलन, 11।
  • मुँह में अत्यधिक जलन, 17, 65।
  • खुरचने जैसी अनुभूति, साथ में लसदार स्वाद और बहुत भूख, 39।
  • तालु के पिछले भाग में निरंतर खुरचने और रेंगने जैसी अनुभूति, जैसी जुकाम में होती है, 52।
  • मुँह में सुखद चुभन की अनुभूति (जैसी शैम्पेन के कार्बोनिक अम्ल के बाद होती है), साथ में लार का स्राव बढ़ा हुआ, 37।
  • लार।
  • लार का स्राव बढ़ा हुआ, 74 ; (पंद्रह मिनट बाद), 54।
  • सुखद स्वाद वाली लार का स्राव बढ़ा हुआ, 38।
  • लार का स्राव तुरंत बहुत बढ़ गया, 71।
  • पूरे दिन अत्यधिक लार आना, 54।
  • बहुत अधिक लार आना (आठवाँ दिन), 51। [280.]
  • बहुत-सी पानी जैसी लार थूककर निकालना, 51।
  • पानी जैसी लार का बहुत अधिक एकत्र होना, साथ में मितली, पेट में भरापन और बेचैनी (चार घंटे बाद), 51।
  • कई दिनों तक पानी जैसी लार निरंतर एकत्र होती रहती है, साथ में गले में शुष्कता, 51।
  • नमकीन लार, जिसका स्वाद विचित्र रूप से तीखा है (सवा घंटे बाद), 37।
  • मुँह में पानी भरना (पंद्रह मिनट बाद), 54।
  • छींकते समय कुछ हरापन लिए श्लेष्मा अनायास मुँह से बाहर निकल जाता है, 52।
  • स्वाद।
  • स्वाद लसदार (दूसरी सुबह), 32।
  • मुँह में कड़वा स्वाद, 74।
  • मुँह में कड़वा, फीका स्वाद (दूसरा दिन), 44।
  • स्वाद कड़वा और फीका, 27। [290.]
  • क्षणिक कड़वा स्वाद (शीघ्र बाद), 27।
  • तीव्र स्वाद वाला भोजन भी ऐसी अनुभूति कराता है, मानो वह सन के पुराने कपड़े का टुकड़ा चबा रहा हो, 51।

गला

  • वस्तुनिष्ठ।
  • कैरोटिड धमनियों का स्पंदन स्पष्ट अनुभव होता है (नौ घंटे बाद), 39।
  • पूरे गले में शोथ, 51।
  • गले में बहुत श्लेष्मा एकत्र होता है; खाँसकर निकालने पर वह हरापन लिए दिखाई देता है, 52।
  • बार-बार थोड़ा-सा श्लेष्मा खँखारना, 39।
  • व्यक्तिनिष्ठ।
  • गले में शुष्कता (दो घंटे बाद), 38, 48, 50।
  • गले में शुष्कता और खुरचने जैसी अनुभूति, 34।
  • गले में कुछ शुष्कता, 27।
  • गले में अत्यधिक शुष्कता, मानो निगलने पर दर्द हो, जैसे जुकाम आरंभ हो रहा हो, 35। [300.]
  • गले में खुरचने जैसी शुष्कता, 34।
  • गले में शुष्कता की अनुभूति; तालुलंबिका और तालु के चाप हल्के लाल हैं (पहला दिन), 26।
  • गले में खुरचने जैसी शुष्क अनुभूति, साथ में गुदगुदी से होने वाली खाँसी (आधे घंटे बाद), 46।
  • गले में संकुचन, 58।
  • गले के पिछले भाग में चिमटने जैसी अनुभूति, जैसे आरंभिक कंठशोथ में; साथ में गले में अत्यधिक शुष्कता और निगलने में कुछ बाधा (दूसरा दिन), 44।
  • गले में बहुत पीछे, बाईं ओर अधिक, फाड़ता दर्द, 52।
  • सुबह गले में कच्चापन, साथ में स्वर बैठा हुआ, 52।
  • वक्ष में निरंतर रेंगने जैसी अनुभूति, साथ में पतला श्लेष्मा ढीला होकर निकलने लगता है, जिससे उसे बार-बार थूककर निकालना पड़ता है, 52।
  • गले में तीव्र रेंगने जैसी अनुभूति, जो कठोर, छोटी-छोटी खाँसी और श्लेष्मा खँखारने को उकसाती है, 52।
  • गले के पिछले भाग में काटती हुई रेंगन, 52।
  • तालुलंबिका। [310.]
  • तालुलंबिका में दर्द और लालिमा, 27।
  • तालुलंबिका में जलन, जिसके शीघ्र बाद प्रचुर मात्रा में फीका मूत्र आता है (कुछ मिनट बाद), 2।
  • ग्रसनी और ग्रासनली।
  • ग्रसनी में हल्का संकुचन, 71।
  • ग्रसनी में और ग्रासनली के पूरे मार्ग में जलती हुई गर्मी, 77।
  • पीते समय ग्रासनली के आरंभ में ऐसी अनुभूति, मानो वहाँ एक बड़ी गोल सूजन हो, 51।
  • निगलना।
  • निगलने में कठिनाई, 17।
  • निगलना कठिन, 65।
  • निगलना कठिन, साथ में ग्रासनली के पूरे मार्ग में दर्द (अठारह घंटे बाद), 17।

आमाशय

  • भूख।
  • भूख बढ़ी हुई (चार घंटे बाद), 27, 45।
  • दोपहर में भूख बढ़ी हुई (पहला दिन), 33। [320.]
  • रात्रिभोज के लिए भूख बढ़ी हुई (दूसरा दिन), 32।
  • बहुत अधिक भूख, 31।
  • शाम को बहुत अधिक भूख (पहला दिन), 25।
  • पूरे औषध-परीक्षण के दौरान भूख अत्यंत प्रचंड थी, 26।
  • अत्यधिक भूख (तीसरा दिन), 25।
  • दोपहर बाद भूख (पहला और दूसरा दिन), 25।
  • शीघ्र ही भूख की अनुभूति, 28।
  • कुतरने जैसी भूख की अनुभूति; आमाशय में लगभग स्पंदन-सा (पंद्रह मिनट बाद), 44।
  • भूख कम, 11।
  • भूख न लगना, 7, 51 ; (तीसरा दिन), 5। [330.]
  • भूख का पूर्ण अभाव, 3।
  • नाश्ते के लिए भूख नहीं, 10।
  • उसे अलग-अलग चीजें खाने की इच्छा होती है, पर उन्हें देखते ही, या उससे भी अधिक, उनकी गंध आते ही, मितली से सिहर उठता है और कुछ भी नहीं खा पाता, 51।*
  • प्यास।
  • प्यास (शीघ्र), 20।
  • प्यास बढ़ी हुई, 10, 11।
  • बहुत प्यास, 58।
  • बहुत अधिक प्यास, 84, 85 ; (चार घंटे बाद), 82।*
  • दोपहर बाद बहुत अधिक प्यास, 74।
  • अत्यधिक प्यास, 3, 79।
  • आमाशय और आँतों में अत्यंत उग्र दर्द के साथ चरम प्यास, 21। [340.]
  • न बुझने वाली प्यास, 17, 19, 65 ; (पंद्रह घंटे बाद), 67 , आदि।
  • यातनादायक प्यास, 69।
  • दाहकारी प्यास, 78।
  • ठंडे पेय की इच्छा, 17।
  • डकार और हिचकी।
  • डकारें, 45, 71 ; (पाँच मिनट बाद), 73।
  • डकारें और पीले द्रव का प्रचुर वमन, 13।
  • डकारें, आमाशय में जलन के साथ (आधे घंटे बाद), 74।*
  • बार-बार डकारें (दूसरा दिन), 30, 69।
  • बार-बार डकारें और जम्हाइयाँ (कुछ असामान्य नहीं), 39।
  • वमन के बिना लगातार डकारें और वमन-प्रयास, 13। [350.]
  • खाली डकारें (तीसरा दिन), 33।
  • खाली, स्वादहीन डकारें, 39।
  • शीघ्र ही बार-बार खाली डकारें, 32।
  • पूर्वाह्न में बहुत-सी खाली डकारें, 52।
  • लगातार हवा की डकारें, 51।
  • पानी की डकारें, 29।
  • हिचकी, 59।
  • एक बार में घंटों तक हिचकी, 51।
  • अम्लदाह।
  • हल्का अम्लदाह (एक घंटे बाद), 1।
  • मितली और वमन।
  • मितली, 45, 66 ; (तुरंत), 55। [360.]
  • नीचे से पड़ने वाले दबाव के कारण गले में मितली, 34।
  • रात्रिभोज के बाद मितली, जिसमें वह केवल थोड़ा ही खा सका था, 11।
  • रात्रिभोज के दौरान कभी-कभी मितली, 54।
  • शरीर सीधा करते ही मितली, 51।
  • मितली और वमन की प्रवृत्ति (दूसरा दिन), 32।
  • मितली, लार निगलने पर वमन की प्रवृत्ति के साथ, 51।
  • मितली, प्रचुर और सहज वमन के साथ, जिसके तुरंत बाद भूख लगती है, 6।
  • मितली और पित्त का वमन, 7।
  • मितली और चिपचिपे पित्त का वमन, 9। [370.]
  • प्रत्येक मात्रा के बाद मितली बढ़ती गई, यहाँ तक कि उसने तीन बार वमन किया; इसके बाद उसने थोड़ा खाया, पर उसका भी तुरंत वमन हो गया, 6।
  • मितली अत्यंत उग्र हो गई; अगले दिन तक बनी रही, जब उसने प्रातः एक क्वार्ट से अधिक गाढ़े सफेदी लिए पदार्थ का वमन किया; फिर 11 A.M. पर बहुत-से चिपचिपे हरे-से पदार्थ का वमन हुआ, जो शीघ्र ही दोबारा हुआ; 3 P.M. पर ली हुई कुछ ब्रांडी और पानी का भी वमन हुआ; और 4 P.M. पर फिर वमन हुआ; तीसरे दिन भी मितली बनी रही, जिसके दौरान वह धीरे-धीरे घटती गई, 5।
  • खाने के बाद हल्की मितली, 10।
  • प्रातः जागने पर उदर में कंपकंपी तथा पीड़ादायक संकुचन और मरोड़ों के साथ बहुत अधिक मितली (तीसरा दिन), 71।
  • उसे इतनी अधिक मितली और जी मिचलाने की बेचैनी होती है, साथ में लगातार लार इकट्ठी होती है और गला सूखता है, कि वह निराश होकर इधर-उधर होता रहता है तथा उसका मन अत्यंत विक्षिप्त रहता है और शारीरिक शक्ति लुप्त हो जाती है (पाँच घंटे बाद), 51।
  • खड़े होने से मितली बढ़ती है और कड़वे द्रव का वमन होता है, 71।
  • वमन के प्रत्येक दौरे के बाद मितली कुछ समय के लिए कम हो जाती है, 51।
  • जी मिचलाने की बेचैनी, 39।
  • वमन-प्रयास और डकारें (एक घंटे बाद), 71।
  • तीव्र वमन-प्रयास; बहुत देर तक वमन-प्रयास के बाद पीले-से श्लेष्म की बड़ी मात्रा का वमन, जो पित्त जैसा कड़वा था और गले में पित्त जैसा कड़वा स्वाद छोड़ गया, 51। [380.]
  • वमन की प्रवृत्ति, 45।
  • वमन, 59, 69।
  • बार-बार, किंतु अल्प मात्रा में वमन, 7।
  • सफेदी लिए धूसर द्रव का वमन, 80।
  • हरे द्रव का वमन, 20।
  • बहुत-से पीले-हरे पानी का वमन, 65।
  • पतला और श्लेष्मायुक्त वमन, 79।
  • भोजन और हल्के हरे-से श्लेष्म का वमन, 19।
  • अपचित भोजन और पीले द्रव का वमन, जिसके बाद अतिसार, 84।
  • नाश्ते में ली हुई वस्तुओं का वमन (एक घंटे बाद), 82। [390.]
  • पहले पिछली रात खाए भोजन का वमन, जिसके बाद बहुत अधिक मात्रा में गाढ़े पीले पित्त का वमन—कई कटोरे भर (तीन घंटे बाद)। वमित पदार्थ क्रमशः अधिक पतला और कम पीला होता गया तथा अंततः (बीस घंटे बाद) वह हल्के पुआल-रंग का था, जिसमें छोटे-छोटे सफेद चिथड़े-जैसे कण बड़ी मात्रा में थे, 83।
  • वमन, जलीय अतिसार के साथ, 85।*
  • बार-बार वमन, 75।
  • बार-बार वमन, जिसमें उसके पिए हुए पेय पित्त से रंगे हुए निकलते थे (चार घंटे बाद), 82।
  • पीले-हरे द्रव का बार-बार वमन, जो पूरे दिन चला; और इतना उग्र था कि वह तनिक-सा भोजन या पेय भी आमाशय में नहीं रोक सका, 16।
  • पित्त का बार-बार वमन, उदर में तीव्र मरोड़ के साथ, जिसके बाद मुँह और गले में कड़वा स्वाद, 51।
  • लगातार वमन, 77।
  • रंगहीन और गंधहीन द्रव का लगभग निरंतर वमन, 78।
  • अत्यधिक वमन और वमन-प्रयास, 48।
  • भूरे पदार्थ का उग्र वमन, 76। [400.]
  • तीन घंटे पहले खाए गए समस्त भोजन का उग्र वमन (छह घंटे बाद), 51।
  • उग्र वमन और अतिसार, 17, 65।
  • उग्र वमन (कंपकंपी और ऐंठन के साथ), 60।
  • अत्यंत उग्र वमन, पहले हरे-से पानी का, बाद में आमाशय की सामग्री का, 66।
  • उसे शरीर मोड़कर पूरे दिन बिल्कुल स्थिर, तनिक भी हिले बिना लेटे रहना पड़ा, अन्यथा उसे अत्यंत उग्र वमन होने लगता था, 51।*
  • भयावह वमन, 49।
  • भयावह वमन, पहले भूरे, कड़वे चूर्ण से मिले भोजन का, अंत में पानी का और कुछ कड़वे, कुछ फीके स्वाद वाले श्लेष्म का, 47।
  • वह केवल दाईं करवट लेट सकता था; प्रत्येक गति या स्थिति बदलने पर भयावह वमन फिर होने लगता था, 51।
  • आमाशय।
  • आमाशय में गड़गड़ाहट और हलचल, 37।
  • जठरशोथ, 19। [410.]
  • हिचकी लेने की इच्छा, 3।
  • अधिजठर-गर्त में कमजोरी और दबाव, 84।
  • आमाशय में बेचैनी (एक घंटे बाद), 82।
  • आमाशय में अप्रिय अनुभूति, जो पीछे मेरुदंड तक फैलती है (एक घंटे बाद), 71।
  • आमाशय में खालीपन और मूर्च्छा-सी कमजोरी की अनुभूति, नाश्ते के बाद भी, 72।
  • अधिजठर-प्रदेश में ऊष्मा और परिपूर्णता की अनुभूति, 27।
  • आमाशय में बढ़ी हुई ऊष्मा और परिपूर्णता की अनुभूति, 71।
  • आमाशय निरंतर बर्फ जैसा ठंडा प्रतीत होता है, 51।*
  • आमाशय बिगड़ा हुआ महसूस होना, साथ में अपचित भोजन के स्वाद वाली बहुत-सी डकारें (पाँचवाँ दिन), 40।
  • आमाशय में दर्द, 45। [420.]
  • आमाशय और उदर में दर्द, 66।
  • अधिजठर-प्रदेश में दर्द; यद्यपि आमाशय फूला हुआ महसूस होता है, वास्तव में ऐसा नहीं है; वह कोई दबाव सहन नहीं करता, यहाँ तक कि हल्के कपड़े भी कष्ट देते हैं (पाँचवाँ दिन), 36।
  • आमाशय-प्रदेश के ऊपर दर्द, मितली और बार-बार वमन के साथ; दर्द धीरे-धीरे पूरे उदर में फैल गया (एक घंटे बाद), 82।
  • आमाशय-प्रदेश में बहुत अधिक दर्द (तीन घंटे बाद), 83।
  • आमाशय-प्रदेश पर तीव्र दर्द और स्पर्शवेदना, जो आँतों के ऊपर तक फैली हुई थी (चार घंटे बाद), 82।
  • आमाशय में उग्र दर्द, 69।
  • प्रातः आमाशय में उग्र दर्द, 30।
  • अधिजठर में उग्र दर्द (दस घंटे बाद), 67, 75।
  • अधिजठर और पूरे उदर में असहनीय दर्द, 77।
  • अधिजठर पीड़ायुक्त, विशेषतः दबाव से, 78। [430.]
  • पंद्रह मिनट बाद आमाशय में जलन, जो एक घंटे तक बनी रही; अंत में वह उरोस्थि के साथ ऊपर की ओर फैलती हुई प्रतीत हुई, 3।
  • आमाशय में जलन और भारीपन, 61।
  • *अधिजठर में उग्र जलन, 77।
  • आमाशय में उग्र जलन और दर्द, 72।*
  • आमाशय में ऐसी परिपूर्णता, मानो उसने बहुत अधिक खाया हो, 73।
  • आमाशय में ऐसी परिपूर्णता, मानो कपड़ों का दबाव सहन न होता हो (चौथा दिन), 44।
  • अधिजठर-प्रदेश में परिपूर्णता, तनाव और दबाव, विशेषतः चलते समय (तीसरा दिन), 44।
  • अधिजठर-प्रदेश में तीव्र तनाव, 3।
  • आमाशय में कसाव (पौन घंटे बाद), 71।
  • आमाशय में ऐंठन, 45। [440.]
  • छूने पर आमाशय में आक्षेपी संकुचन होने लगा, 18।
  • आमाशय में दबाव, 12।
  • हल्का भोजन करने के बाद आमाशय में दबाव (तीसरा दिन), 33।
  • अधिजठर-प्रदेश में दबाव और असहजता (पौन घंटे बाद), 71।
  • आमाशय में हल्का दबाव, 39।
  • आमाशय में हल्का दबाव, जो उदर के बाएँ भाग में फैलता है (आधे घंटे बाद), 39।
  • आमाशय में दाबकारी दर्द; शाम को चलते समय (दूसरा दिन), 44।
  • अधिजठर-प्रदेश में दबाव की अनुभूति और उग्र दाब (पाँच घंटे बाद), 17।
  • अधिजठर-गर्त में दबाव की अनुभूति और अत्यधिक दाब, 65।
  • अधिजठर-गर्त में हल्की दबाव की अनुभूति, 52। [450.]
  • वमन और दस्त आरंभ होने पर आमाशय में फाड़ने वाले उग्र दर्द (एक घंटे बाद), 21।
  • आमाशय में अप्रिय अनुभूति, मानो वहाँ दुखन हो, 55।
  • अधिजठर-प्रदेश दबाव के प्रति संवेदनशील, 48, 80।
  • अधिजठर दबाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील, 50।
  • अधिजठर-प्रदेश तनिक-सा स्पर्श भी सहन नहीं कर सकता, 51।
  • आमाशय में रेंगने की अनुभूति, 51।
  • शरीर सीधा करने पर आमाशय में रेंगने की अनुभूति, जो वमन की सीमा तक पहुँच जाती है, 51।

उदर

  • अधःपर्शुक प्रदेश।
  • पित्तस्राव में वृद्धि, 69।
  • Colchicum के बाद पित्तस्राव लगातार बढ़ा हुआ था; यह न केवल मल से स्पष्ट था, जो सदैव अत्यधिक पित्तयुक्त और प्रचुर होता था, बल्कि पित्तयुक्त वमन से भी, 22।
  • दाईं ओर की छोटी पसलियों के ठीक नीचे ऐसी पीड़ा, मानो वायु फँसी हुई हो, 52। [460.]
  • आदतन बाईं करवट न ले सकने के कारण नींद न आना; लगातार ऐसा लगता था मानो कोई सिलवट या वैसी ही कोई वस्तु मुझ पर दबाव डाल रही हो; किंतु वास्तव में ऐसा नहीं था, और मैंने पाया कि इसका कारण प्लीहा-प्रदेश की पीड़ा थी, जो विशेष रूप से बाहर से दबाने पर अनुभव होती थी, 34।
  • दोनों अधःपर्शुक प्रदेशों में आड़ा तनाव महसूस होना (साढ़े चार घंटे बाद), 39।
  • बाएँ अधःपर्शुक प्रदेश में हल्की चुभन, 39।
  • बाएँ अधःपर्शुक प्रदेश में फाड़ती पीड़ा, 34।
  • यकृत-प्रदेश में काटती-फाड़ती पीड़ाएँ, 34।
  • शाम को प्लीहा में क्षणिक चुभती पीड़ाएँ (पहला दिन), 33।
  • नाभि-प्रदेश।
  • नाभि के ऊपर, कुछ बाईं ओर, तीक्ष्ण बाहर की ओर दबाने वाली पीड़ा, 52।
  • नाभि-प्रदेश में प्रचंड तीक्ष्ण चुभती पीड़ाएँ, 52।
  • दोपहर का भोजन करने से पहले और उसके आरंभ में, पेट फूलने के साथ नाभि-प्रदेश के आसपास दबावयुक्त शूल, 52।
  • नाभि-प्रदेश के नीचे इधर-उधर चुभनयुक्त शूल, 52।
  • सामान्य उदर। [470.]
  • उदर फूला हुआ (तीसरा दिन), 33।*
  • उदर फूला हुआ, तना हुआ और कठोर, 19।
  • उदर बहुत अधिक फूला हुआ, 85।
  • उदर का अत्यधिक फूलना, 63।
  • उदर का अत्यधिक फूलना, मानो उसने बहुत अधिक खा लिया हो , यद्यपि उसने तनिक भी भोजन नहीं किया था; बहुत हल्का भोजन मध्यम मात्रा में लेने के बाद यह अनुभूति और भी अधिक कष्टकारी हो गई (तीन घंटे बाद), 55।*
  • थोड़े ही समय में उदर अत्यधिक फूल गया, 62।
  • उदर फूला हुआ नहीं, किंतु आटे जैसा मुलायम और तनिक-से दबाव पर भी पीड़ायुक्त (चार सप्ताह बाद), 20।
  • उदर धँसा हुआ, 80।
  • प्रचंड आंत्रशोथ, 79।
  • उदर में ऐसी हलचल, मानो दस्त होने वाले हों, 51। [480.]
  • उदर में शीघ्र ही गुड़गुड़ाहट, 33 ; (पहला दिन), 32।
  • उदर में ऐसी गुड़गुड़ाहट जैसी दस्त में होती है (कुछ असामान्य नहीं), 39।
  • उदर में ऐसी गुड़गुड़ाहट, मानो अनुप्रस्थ बृहदांत्र में वायु इधर-उधर घूम रही हो (दूसरा दिन), 37।
  • उदर में गुड़गुड़ाहट के साथ मरोड़युक्त शूल, 70।
  • उदर में गुड़गुड़ाहट और मलत्याग की हाजत, 11।
  • आँतों में गुड़गुड़ाहट के साथ मलत्याग की हाजत, 10।
  • आँतों में गुड़गुड़ाहट, जिसके बाद नरम मल और आधे घंटे बाद दूसरी बार उससे भी नरम मल (दूसरा दिन), 46।
  • उदर में हल्की गुड़गुड़ाहट, जो शीघ्र ही भूख की अनुभूति में बदल गई, 39।
  • वायु निकलना (दूसरा दिन), 30।
  • गंधहीन वायु निकलना (दूसरा दिन), 32। [490.]
  • शाम को अत्यंत दुर्गंधयुक्त वायु, 72।*
  • बहुत अधिक दुर्गंधयुक्त वायु जोर से निकलना, 35।
  • उदर में असुविधा (दूसरा दिन), 44।
  • उदर में बेचैनी, हलचल और मलत्याग की हाजत के साथ, 72।
  • ऊपरी उदर में दबाने पर अप्रिय अनुभूति (मंद पीड़ा) (दूसरा दिन), 25।
  • उदर में कमजोरी की अनुभूति, जो भूख में बदल जाती है, 39।
  • ऐसा महसूस होना मानो उदर में वायु फँसी हुई हो, 39।
  • उदर में पीड़ाएँ (डेढ़ घंटे बाद), 67।
  • उदर में ऐसी पीड़ा, मानो वायु फँसी हुई हो, 55।
  • आँतों में प्रचंड पीड़ा, 76। [500.]
  • नाभि के नीचे उदर में कुछ जलन, साथ में कमर के निचले भाग की ओर हल्का खिंचाव, 39।
  • उदर में इधर-उधर हल्की जलन, जो धीरे-धीरे प्रचंड हो गई और क्षणिक किंतु तीव्र मरोड़ में बदल गई (कुछ घंटों बाद), 3।
  • उदर में भराव, 39।
  • भोजन के बाद उदर में भराव, जो प्रचुर, पतले, लुगदी-जैसे मल के बाद कम हो गया, 11।
  • उदर में भराव की अनुभूति (पाँचवाँ दिन), 36।
  • रात्रि-भोजन के बाद उदर में भराव का एहसास, 10।
  • ऊपरी उदर में हल्का तनाव, जो दाएँ अधःपर्शुक प्रदेश तक फैलता है, 39।
  • उदर का पीड़ायुक्त संकुचन वमन से पहले होता है, 51।
  • उदर की मांसपेशियों और अंगों की वंकक मांसपेशियों में ऐंठन, 68।
  • शाम को ऊपरी उदर में अत्यंत प्रचंड, काटने जैसी ऐंठनयुक्त पीड़ा, जो नाभि तक फैलती है और आधे घंटे तक रहती है; शूल या दस्त की पूर्वसूचना जैसी, 34। [510.]
  • उदर में मरोड़, 18, 69, 73।
  • उदर में मरोड़, जिसके साथ असंतोषजनक मलत्याग (तीसरा दिन), 33।
  • उदर में मरोड़, जिसके बाद लुगदी-जैसा मल (दूसरा दिन), 33।
  • उदर में मरोड़ और हलचल (पौन घंटे बाद), 18।
  • हल्की मरोड़, मानो पेट फूलने या दस्त के कारण हो (चौथा दिन), 46।
  • उदर में मरोड़युक्त पीड़ाएँ, 72।
  • दाएँ कूल्हे के पास उदर में चिमटी काटने जैसी पीड़ा, 52।
  • पूरे उदर में मंद पीड़ा और असुविधा, 51।
  • उदर में लगातार हल्की खिंचती अनुभूति, मानो शूल होने वाला हो, 39।
  • अनुप्रस्थ बृहदांत्र में खिंचाव और हलचल, 37। [520.]
  • उदर से छाती तक फैलने वाली खिंचाव की अनुभूति, व्याकुलता और गर्मी के साथ, विशेषतः सिर में; दो घंटे तक बनी रही (एक घंटे बाद), 54।
  • उदर में कुतरने जैसी पीड़ा, 11।
  • उदर में कुछ कुतरने जैसी पीड़ा, 10।
  • उदर में दबाव, 55।
  • उदर के बाएँ भाग में ऐसा दबाव, मानो वायु फँसी हुई हो; वह स्थान दबाव के प्रति भी संवेदनशील है, 39।
  • अनुप्रस्थ बृहदांत्र के प्रदेश में दबाव और असुविधा (छठा दिन), 43।
  • सुबह जागने पर ऊपरी उदर में कुछ दबाव, 52।
  • अनुप्रस्थ बृहदांत्र के बाएँ भाग में क्षणिक चुभनयुक्त दबाव (दूसरा दिन), 37।
  • उदर में दबाव की पीड़ायुक्त, असुविधाजनक अनुभूति, जो हाथ से मलने पर कम हो जाती है; इसके बाद स्वादहीन डकारें और वायु निकलना, 43।
  • ऊपरी उदर के बाएँ भाग में चिमटी काटने जैसी दबावयुक्त अनुभूति, जो कूल्हे के प्रदेश तक फैलती है और डकारों से थोड़े समय के लिए कम हो जाती है, 52। [530.]
  • उदर के निचले दाएँ भाग में काटने जैसी पीड़ा, बाद में ऊपरी बाएँ भाग में; किंतु आँतों में पहले हुई काटने जैसी पीड़ा के समान नहीं; वास्तव में यह आँतों में थी ही नहीं, 34।
  • उदर में काटने की अनुभूति (चौथा दिन), 36।
  • उदर में लगातार काटने की अनुभूति (पाँचवाँ दिन), 36।
  • उदर को आड़ा चीरती क्षणिक चुभती पीड़ाएँ, 39।
  • दाएँ कूल्हे के ठीक बाईं ओर उदर में फाड़ती पीड़ा, 52।
  • ऊपरी उदर के दाएँ भाग में कई बार काटती-फाड़ती पीड़ाएँ, 52।
  • शूल, 60।
  • उठने के तुरंत बाद शूल और दस्त, 41।
  • शूल-जैसी पीड़ाएँ और वमन, दस्त के साथ, 77।
  • प्रचंड शूल, 80। [540.]
  • पूरी रात प्रचंड शूल और बार-बार वमन, 19।
  • रात्रि-भोजन के दौरान अधिजठर गर्त के ठीक नीचे बाहर की ओर दबाने वाला शूल, जो डकारों से कम हो गया, 52।
  • बाएँ कूल्हे और पसलियों के बीच, छूने पर भी ऐसी पीड़ा मानो भीतर दुखन हो, 52।
  • उदर और छाती में स्पंदन की अनुभूति, मानो छाती की ओर रक्त का अत्यधिक प्रवाह हो रहा हो (दूसरी सुबह), 40।
  • अधोजठर।
  • दोपहर के भोजन के बाद निचले उदर और गुदा में ऐसी उत्तेजना जैसी दस्त में होती है; उदर में मंद पीड़ा के साथ मलत्याग की हाजत, 35।
  • निचले उदर में बार-बार और लगातार ऐसा शूल जैसा दस्त में होता है, तथा श्लेष्मायुक्त, पानी-जैसे मल का लगभग अनैच्छिक रूप से निकलना, 35।
  • नाभि के बाईं ओर इलियम में दबाव (दो घंटे बाद), 37।

मलाशय और गुदा

  • मलाशय।
  • मलाशय का भ्रंश, 63।
  • दस्त जैसी अनुभूति, जिसके पहले काटने जैसी पीड़ा होती है, किंतु पानी-जैसा या पतला मल नहीं निकलता, 35।
  • मलाशय में हल्की स्पंदनशील जलन-चुभन, 39।
  • गुदा। [550.]
  • sphincter ani में ऐंठन, साथ में पीठ से ऊपर चढ़ती सिहरन; इसके बाद मलत्याग की हाजत, किंतु आँतें पर्याप्त रूप से खाली न कर पाना, 51।*
  • गुदा में दस्त जैसी अनुभूति; प्रचुर मलत्याग, जो पतला नहीं था; इसके बाद मलाशय में दस्त जैसी अनुभूति और गुदा में दुखनयुक्त पीड़ा, 35।
  • गुदा में गर्मी और हल्की सुई चुभने जैसी अनुभूति, 27।
  • गुदा अत्यंत पीड़ायुक्त, 63।
  • गुदा में जलन, 52।
  • गुदा में रुक-रुककर जलन, 52।
  • गुदा के अग्रभाग, मूत्रमार्ग और बाएँ कूल्हे में क्षणिक चुभती पीड़ाएँ, 27।
  • गुदा में सूक्ष्म चुभती-फाड़ती पीड़ा, 52।
  • कठोर मल के साथ गुदा-संकोचक पेशी में ऐसी पीड़ा, मानो वह फट जाएगी, 35।
  • गुदा में रेंगने की अनुभूति और प्रचंड झटके, 52। [560.]
  • गुदा में अचानक तीव्र खुजली, 27।
  • मलत्याग की हाजत।
  • दोपहर बाद मलत्याग की हाजत, जिसके बाद अत्यंत पीड़ादायक मलत्याग हुआ; इसे बहुत सावधानी से करना पड़ा, क्योंकि ऐसा लग रहा था मानो पूरी गुदा-संकोचक पेशी फटकर अलग हो जाएगी, 35।
  • मलत्याग की हाजत, जो बार-बार वायु निकलने से कम हो गई, 27।*
  • मलत्याग की हाजत, उदर में गुड़गुड़ाहट और अधिजठर प्रदेश में दबाव के साथ (आठ घंटे बाद), 71।
  • मलत्याग की हाजत, वायु निकलने के साथ (तीसरा दिन), 27।
  • दिन में कई बार मलत्याग की हाजत, जिसमें थोड़ा कठोर हुआ मल निकलता है या कभी कुछ भी नहीं निकलता, साथ में गुदा में पीड़ा, 54।
  • मलत्याग की काफी हाजत, किंतु मलत्याग असंतोषजनक, 38।*
  • मलत्याग की बहुत हाजत; मल नरम होते हुए भी कठिनाई से निकलता है और इसके बाद कमर के निचले भाग में पीड़ा होती है (पाँचवाँ दिन), 36।
  • बार-बार मलत्याग की हाजत, किंतु निष्फल, 10।
  • बार-बार मलत्याग की हाजत और उदर में कुछ गुड़गुड़ाहट, किंतु निष्फल, 11। [570.]
  • मलत्याग की लगातार हाजत, किंतु निष्फल (तीसरा दिन), 26।
  • मलत्याग की लगातार हाजत, अत्यंत प्रचुर मलत्याग और अत्यंत प्रचंड मरोड़युक्त पीड़ा के साथ; पंद्रह मिनट बाद बृहदांत्र में बहुत अधिक हलचल की अनुभूति हुई, जिसके बाद छह बार प्रचुर, पानी-जैसा, पीला मल निकला, 4।
  • मलत्याग की निष्फल हाजत; मलाशय पूर्णतः निष्क्रिय-सा लगा; मलाशय में मल महसूस होने पर भी कुछ नहीं निकल सका, 35।
  • मलत्याग की अत्यंत पीड़ादायक हाजत; पहले केवल थोड़ा-सा मल निकला, किंतु बाद में पारदर्शी, जिलेटिन-जैसा और अत्यंत झिल्लीदार श्लेष्मा निकला, जिससे उदर की पीड़ा में कुछ राहत मिली (तीन घंटे बाद), 3।
  • दस्त होने की प्रवृत्ति, 55।
  • *कुंथन, 67, 77।
  • लगातार कुंथन, जिसमें केवल थोड़ी मात्रा में मल निकलता है, 13।
  • मलत्याग के साथ बहुत अधिक कुंथन, 74।
  • उसे बार-बार मलत्याग के लिए जाना पड़ता था, किंतु कुछ भी नहीं निकाल पाती थी; इसके पहले शूल होता था, 51।

मल

  • अतिसार।
  • चावल के मांड-जैसे श्लेष्मा से युक्त अतिसार, 84. [580.]
  • निरंतर अतिसार, 63.
  • पित्तयुक्त अतिसार, जो बाद में सफेद झिल्लीदार टुकड़ों से मिश्रित था, 14.*
  • जलीय अतिसार, 51.
  • पित्तयुक्त द्रव का तीव्र विरेचन (तीन घंटे बाद), 83.
  • पेचिश; मलोत्सर्ग श्लेष्मायुक्त और रक्तयुक्त, कुंथन के साथ, 68.*
  • बार-बार मलत्याग, 9, 66.
  • बार-बार मलत्याग और वमन, 18.
  • बार-बार मलत्याग, वमन के साथ बारी-बारी से, 18.
  • बार-बार पतले मल, उदर में मरोड़ों के साथ, 76.
  • मल जलीय और बार-बार, 85. [590.]
  • बार-बार मलत्याग; दुर्गंधित, नारंगी-पीले श्लेष्मायुक्त द्रव से बना, जिसमें अनेक चमकीले पीले शल्क मिले थे और कोई मल-पदार्थ नहीं था, 17.*
  • आँतों से पीड़ायुक्त, बार-बार मलोत्सर्ग; स्राव अधिक मात्रा में और जलीय; पित्त से इस प्रकार रंगा हुआ कि वमन किए पदार्थ जैसा दिखता था (चार घंटे बाद), 82.
  • कई बार अधिक मात्रा में जलीय मलोत्सर्ग, प्रत्येक मलोत्सर्ग के साथ तीव्र मरोड़दार पीड़ा (चार घंटे बाद), 82.
  • पहली रात में दो बार मलत्याग, 28.
  • असामान्य रूप से सुगम दो मलत्याग (दूसरी दोपहर), 25.
  • दिन में दो लेई-जैसे मल (तीसरा दिन), 37.
  • चार पीले, जलीय मल (पहला दिन), 5.
  • मल और मूत्र अनैच्छिक रूप से निकल गए (तीन दिन बाद), 20.
  • पहली रात में मल प्रायः अनैच्छिक रूप से निकला, किंतु रक्तयुक्त नहीं था, 21.
  • बिना किसी अनुभूति के बार-बार जलीय मल, 51. [600.]
  • अत्यधिक मात्रा में पतले मल, जो मृत्यु से पहले अनैच्छिक हो गए; रंग काला और गंध अत्यंत दुर्गंधित थी, 67.
  • प्रचुर मात्रा में पीलेपन लिए जलीय मल, 69.*
  • मल पीले, रक्तयुक्त और पतले, 80.
  • मल जलीय और पीले, 77.
  • बिना किसी पीड़ा के जलीय मल, 8.
  • *आँतों के स्राव में बड़ी मात्रा में छोटे-छोटे सफेद चिथड़े-जैसे कण (बीस घंटे बाद), 83.
  • कुंथन के बिना मल; दुर्गंधित, नारंगी-पीला, श्लेष्मायुक्त द्रव, जिसमें अनेक चमकीले पीले शल्क थे और कोई मल-पदार्थ नहीं था, 65.
  • रक्तयुक्त मल, आँतों में मरोड़ों के साथ, 61.
  • प्रातःकाल सामान्य मलत्याग के बाद कुछ अतिसार-जैसा मल (दूसरी सुबह), 46.
  • अत्यंत प्रचुर, पतला, पीला मल; उससे पहले कुछ पीड़ा, उदर में गड़गड़ाहट और भीतर कुछ घूमने की अनुभूति; मलत्याग के शीघ्र बाद ये अनुभूतियाँ फिर हुईं और निष्फल मलवेग हुआ, 11. [610.]
  • मृदु मल, हल्के कुंथन के साथ (नौ घंटे बाद), 71.
  • लेई-जैसा मल, 39.
  • भोजन के बाद लेई-जैसा मल, आध्मान के साथ; इसके बाद दुर्गंधित वायु निकली (छह घंटे बाद), 39.
  • पतला मल, जिसके पहले शूल था, 51.
  • बिना किसी अनुभूति के पतला, जलीय मल निकलता है, 51.
  • मल पतला, जलीय, झागदार और पीड़ारहित, 11.
  • मल पानी जितना पतला, झागदार और पीड़ारहित, 10.
  • मल पतला, पीला और लेई-जैसा, वेग से निकला; मलत्याग के समय और उसके बाद उदर में बेचैनी की, लगभग पीड़ाजनक अनुभूति, 11.
  • मल पतला, पीला और प्रचुर; इसके बाद कुछ पीड़ा, उदर में गड़गड़ाहट और भीतर हलचल, साथ में कुछ कुंथन, 10.
  • मल पतला, पीलेपन लिए और लेई-जैसा, बहुत वेग से निकला; साथ में उदर में बेचैनी की, लगभग पीड़ाजनक अनुभूति, 10. [620.]
  • दोपहर में श्लेष्मायुक्त मल, अत्यधिक जोर और कुंथन के साथ (तीसरा दिन), 74.
  • मल जलीय, श्लेष्मायुक्त, भूरा-काला, साँप-जैसे रूप वाला और मलयुक्त, मानो ताजे पित्त या ताजे रक्त से मिश्रित हो, 10.
  • मल अत्यंत जलीय, श्लेष्मायुक्त, हरापन लिए काला और दुर्गंधित; गंध ताजे पित्त अथवा ऐसे ताजे रक्त जैसी, जो कुछ मिनटों तक जल-स्नान में रखा रहा हो, 11.
  • मल दुर्गंधित, कुछ पतला, जिसमें सफेद झिल्ली के छोटे-छोटे टुकड़े थे (बारह घंटे बाद), 18.*
  • मलत्याग, कुंथन और अतिसार-जैसी अनुभूति के साथ, 71.
  • बहुत अधिक दुर्गंधित मल-पदार्थ निकला (तीसरा दिन), 26.
  • कब्ज।
  • कब्ज (तीसरा दिन), 33.
  • कई दिनों तक कब्ज; मल आने पर उसकी मात्रा अत्यंत कम थी और खाए गए भोजन की मात्रा के अनुपात में नहीं थी, 52.
  • कब्ज, मलाशय में भरेपन की अनुभूति के साथ (तीसरा दिन), 44.
  • मलत्याग अत्यंत मंद और अल्प, 26. [630.]
  • मल मृदु, किंतु निकालना कठिन; उसका कुछ भाग गुदा में रह गया, 34.
  • मल कठोर नहीं था, किंतु सामान्य से अधिक कठिनाई से निकला (दूसरा दिन), 44.
  • मल कठोर नहीं हुआ था, किंतु अत्यंत अल्प था; बहुत परिश्रम से निकला, 52.

मूत्रांग

  • मूत्रनली।
  • मूत्रत्याग के समय पूरी मूत्रनली में जलन, मूत्राशय-ग्रीवा के हल्के संकुचन के साथ (नौ घंटे बाद), 71.
  • मूत्रनली में हल्की जलन (तीसरा दिन), 33.
  • मूत्रमार्गों में तीव्र जलन, 63.
  • प्रातः बिस्तर में, मूत्रत्याग के बाद मूत्रनली में असह्य रेंगती हुई जलन; ऐसा लगता था मानो और मूत्र निकलेगा, और कुछ बूँदें निकलते समय ऐसी जलन मानो वे दहकती हुई गरम हों; साथ में गुदा में जलन (यही पीड़ा आठ दिन बाद फिर हुई, तब भी प्रातः बिस्तर में), 52.
  • मूत्रत्याग करते समय मूत्रनली में जलन की अनुभूति, मानो उसमें दुखन हो, 51.
  • मूत्रनली में खिंचाव और फाड़ती पीड़ा, 51.
  • मूत्रनली में दबावकारी खिंचाव, 52. [640.]
  • मूत्रनली के सबसे निचले भाग में खिंचाव की अनुभूति, 52.
  • मूत्रनली में खिंचावयुक्त पीड़ा, 51.
  • मूत्रनली के अग्रभाग में काटती पीड़ा, 52.
  • मूत्रत्याग के समय हल्की काटती पीड़ा (तीसरा दिन), 33.
  • नौकाकार गर्त में गुदगुदी, 39.
  • मूत्रत्याग का वेग, 37, 55, 70.
  • मूत्रत्याग का अत्यधिक वेग, 27.
  • मूत्रत्याग।
  • बार-बार मूत्रत्याग, 20.
  • दिन-रात बार-बार मूत्रत्याग (तीसरा दिन), 27.
  • बार-बार गहरा पीला मूत्र, सामान्य से अधिक मात्रा में, 39. [650.]
  • सामान्य से अधिक बार मूत्रत्याग, 52.
  • प्रत्येक आधे घंटे में मधुमेही प्रकृति का मूत्र निकला (दो सप्ताह बाद), 20.
  • मूत्र-स्राव बढ़ा हुआ, 51.
  • गहरे रंग के मूत्र की मात्रा बढ़ी हुई, 70.
  • पहले बारह घंटों में मूत्र कुछ बढ़ा हुआ, साथ में कुछ मूत्रवेग, 54.
  • मूत्र प्रचुर, सुनहरा-पीला और स्वच्छ; बाद में उसमें तैरते हुए सफेद बादल-जैसे कण (तीसरा दिन), 33.
  • मूत्र प्रचुर और गरम, 27.
  • मूत्र प्रचुर और गँदला, विशिष्ट गुरुत्व 1034 से 1014, 69.
  • मूत्रत्याग कम, 63.*
  • मूत्र अल्प, 85 ; (पंद्रह घंटे बाद), 67.* [660.]
  • मूत्र अल्प, अग्नि-जैसा लाल और जलन के साथ (तीन घंटे बाद), 3.
  • मूत्र-स्राव अल्प, 16.
  • मूत्रावरोध, 77, 80.
  • मूत्र नहीं आया, 76.
  • मूत्र।
  • मूत्र सामान्य से अधिक गहरे रंग का, 55.*
  • भूरा-काला मूत्र, 64.*
  • रक्तयुक्त मूत्र, मूत्रकृच्छ्र के साथ, 70.*
  • मूत्र पहले गँदला, फिर स्वच्छ और पीला, 52.
  • मूत्र चूने के पानी जैसा; गँदलापन अमोनियम यूरेट के कारण, 69.
  • Colchicum का मूत्र-उत्सर्जन पर कोई उल्लेखनीय प्रभाव नहीं है; जब मूत्र के घटकों में कमी देखी जाती है, तब वह आँतों से बढ़े हुए मलोत्सर्ग के साथ संबद्ध होती है, 10. [670.]
  • दो परीक्षकों में मूत्र के ठोस घटक, विशेषतः नाइट्रोजनयुक्त अंश, कम हो गए थे; किंतु दोनों परीक्षणों के दौरान मल सामान्य से अधिक मात्रा में था, जिससे मूत्र के घटकों में हुई कमी का स्पष्टीकरण मिल सकता है, 22.
  • Colchicum के प्रयोग के दौरान यूरिक अम्ल निश्चित रूप से बढ़ा हुआ था, 24.
  • यूरिक अम्ल में निश्चित वृद्धि (चार प्रेक्षणों के दौरान), 23.
  • यूरिक अम्ल और यूरिया दोनों में निश्चित वृद्धि, 14.
  • परीक्षण के दौरान यूरिक अम्ल पूर्णतः लुप्त हो गया, 22.
  • तीन परीक्षणों में यूरिया तथा स्थिर लवण बढ़े हुए थे, जबकि मूत्र की कुल मात्रा कम थी, 23.
  • उसने सामान्य से प्रतिदिन 1.02 ग्राम कम नाइट्रोजन उत्सर्जित किया, जो 2.18 ग्राम यूरिया के समतुल्य था, 13.
  • स्थिर लवण बढ़े हुए और पार्थिव फॉस्फेट घटे हुए प्रतीत हुए, 22.

जननांग

  • पुरुष।
  • शिश्नमुण्ड में फाड़ती पीड़ा, 52.
  • बाएँ वृषण में अत्यंत संवेदनशील, महीन पीड़ाएँ, मानो वह कुचला गया हो; केवल बायाँ पैर धरते समय अनुभव हुईं; स्पष्टतः झटके के कारण, क्योंकि दबाव देने पर वे अनुभव नहीं हुईं, 34. [680.]
  • बाईं शुक्ररज्जु में फाड़ती पीड़ा, 51.
  • संभोग की अत्यधिक और असामान्य इच्छा (दूसरा दिन), 26.
  • भोजन के बाद अत्यधिक कामेच्छा, 27.
  • स्त्री।
  • मासिक धर्म नियत समय से कुछ दिन पहले, 41.
  • मासिक धर्म सामान्य से सात दिन पहले, 53.
  • अभी-अभी आरंभ हुआ मासिक धर्म बंद हो गया, 51.

श्वसनांग

  • स्वरयंत्र, श्वासनली और श्वसनी।
  • टिंचर निगलते समय उससे वायुमार्गों में क्षोभ हुआ, जिसके कारण हल्की सूखी खाँसी हुई, 2.
  • स्वरयंत्र में पीड़ा, वहीं से क्रूपस प्रकार का कफ-निष्कासन, 35.
  • स्वरयंत्र के ऊपर की पेशियों में दबावकारी पीड़ा, मध्य से कुछ बाईं ओर, भीतर और बाहर दोनों तरफ, 52.
  • स्वरयंत्र में खुरचन-सी अनुभूति (शीघ्र), 33. [690.]
  • स्वरयंत्र में गुदगुदी, 33.
  • श्वासनली और वक्ष में रेंगने-सी अनुभूति, खाँसी के साथ, 52.
  • आवाज।
  • खोखली, गंभीर आवाज, 33.
  • हल्का स्वरभंग (शीघ्र), 33 ; (दूसरा दिन), 32.
  • हैजे के समान आवाज चली जाना, 76.
  • खाँसी और कफ-निष्कासन।
  • (खाँसी और प्रतिश्याय बारी-बारी से), 26.
  • खाँसी और गहरी श्वास (दूसरा दिन), 25.
  • स्वरयंत्र से बार-बार और आसानी से कफ-निष्कासन; श्लेष्मा जिलेटिन अथवा मांड-जैसी डलियों में, बिना किसी खाँसी के, 35.
  • श्वसन।
  • यद्यपि त्वचा से स्वेदन और आँतों से मलोत्सर्ग की मात्रा बढ़ी हुई थी, फिर भी फेफड़ों से उच्छ्वसित कार्बोनिक अम्ल लगभग समान रहा और एक दिन सामान्य से बहुत अधिक था, 11.
  • अनियमित श्वसन (तीन दिन बाद), 20. [700.]
  • श्वसन बीच-बीच में रुकता रहा; आक्षेप अधिक बार होने लगे और गर्दन तथा चेहरे तक फैल गए; जबड़े अधिक दृढ़ता से भिंच गए, मुँह से झाग आने लगा और आँखें विकृत हो गईं (छह सप्ताह बाद), 20.
  • बार-बार गहरी श्वास लेने की इच्छा, 27.
  • कठिन श्वसन, 63, 65.
  • कठिन श्वसन और अत्यधिक व्याकुलता (अठारह घंटे बाद), 17.
  • श्वासकष्ट, 63.
  • श्वासकष्ट और वक्ष का संकुचन, 69.
  • अत्यधिक श्वासकष्ट, 75.

वक्ष

  • छाती में रक्त के उमड़ने की अनुभूति, और एक विचित्र संवेदना मानो उसके भीतर कोई जीवित वस्तु काम कर रही हो; दिन में बार-बार, पर विशेषकर शाम को भोजन के बाद (दूसरा दिन), 40।
  • छाती में क्षणिक बेचैनी, विशेषकर बायीं ओर (चौथा दिन), 71।
  • छाती में भराव और दबाव (चौथा दिन), 44। [710.]
  • छाती में भराव की संवेदना, साथ में उदर में स्पंदन, 39।
  • छाती में बार-बार तनने की संवेदना, 52।
  • छाती में कसाव, 78।
  • छाती में कुछ कसाव, जिसके कारण गहरी साँस लेना आवश्यक हो (नौ घंटे बाद), 39।
  • छाती में बार-बार कसाव, साथ में छाती के आर-पार चुभते और छेदते दर्द, जो हमेशा बायें स्तनाग्र के नीचे अधिक तीव्र होते थे, 72।
  • छाती में कसाव की संवेदना, 65।
  • छाती में कसाव की संवेदना, साथ में साँस लेने में कठिनाई (पाँच घंटे बाद), 17।
  • छाती में दबावकारी दर्द, पूरे दिन, 54।
  • छाती में चुटकी काटने जैसी-दबावकारी संवेदना, 53।
  • छाती में दबाव और घुटन, 84। [720.]
  • चलते समय छाती में दबाव और घुटन (दूसरा दिन), 44।
  • छाती में बदलता हुआ दबाव और घुटन (आधे घंटे बाद), 54।
  • छाती में व्याकुलतापूर्ण दबाव और घुटन, जो पूरे दिन रहे (तीन घंटे बाद), 54।
  • छाती में दबाव और घुटन की अनुभूति, 75।*
  • वक्ष को हिलाने पर वक्षीय पेशियों में चुभाव, 33।
  • छाती में इधर-उधर बार-बार आर-पार बेधने वाले चुभाव, किंतु श्वसन को प्रभावित किए बिना (पाँचवाँ दिन), 40।
  • छाती के आर-पार काटते-फाड़ते दर्द, 34।
  • सामने।
  • खिंचता-छेदता दर्द, जो उरोस्थि के मध्य से बायें स्तनाग्र तक फैलता था; दर्द क्षणिक था, किंतु छाती की दायीं ओर भी इधर-उधर अनुभव हुआ; यद्यपि यह बायीं ओर कहीं अधिक तीव्र था, फिर भी गहरी साँस लेने से न केवल बढ़ता नहीं था, बल्कि कुछ घटता था; बाद में यह पूरी छाती में फैल गया और वहाँ कसाव की ऐसी संवेदना उत्पन्न हुई मानो उस पर कोई भारी बोझ रखा हो, 72।
  • ऐसा अनुभव मानो उरोस्थि और मेरुदण्ड को पेंच से कसकर एक साथ जोड़ दिया गया हो; दबाव उरोस्थि से आरंभ होता है, 71।
  • छोटे तीखे चुभाव, जो छाती की सामने की भित्ति में आरंभ होकर पीछे की भित्ति तक आर-पार दौड़ते थे (चौथा दिन), 71।
  • पार्श्व। [730.]
  • दायीं वक्षीय पेशियों में फड़कन (शीघ्र), 33।
  • लिखते समय वक्ष की दायीं ओर चारों तरफ इतने प्रचण्ड दर्द कि मुझे लिखना बंद करना पड़ा, 34।
  • छाती की बायीं ओर छेदते दर्द, जो रात में लगभग 10 बजे विशेष रूप से प्रचण्ड होते थे, और छाती की जकड़न इतनी तीव्र हो गयी कि वह बड़ी कठिनाई से साँस ले सका और तत्काल अत्यंत व्याकुल हो गया, 72।
  • छाती की दायीं ओर अचानक प्रचण्ड कसाव, जिससे मैं उछलकर उठ बैठा, 34।
  • छाती के बायें आधे भाग में ऐंठनयुक्त दबाव, साथ में श्वसन में कठिनाई (नौ घंटे बाद), 71।
  • छाती की दायीं ओर छोटे-छोटे स्थानों में रुक-रुककर दबाव, कभी ऊपरी तो कभी निचले भाग में, 52।
  • छाती की दायीं ओर ऊपरी भाग में, बाँह के निकट, मंद चुभता दबाव, 52।
  • छाती की बायीं ओर हल्का दबाव और घुटन, जो हृदय से आरंभ होती थी और गहरी साँस लेना आवश्यक कर देती थी, 27।
  • नाक साफ करते समय छाती की बायीं ओर के सामने के निचले भाग में काटता दर्द, 34।
  • छाती की बायीं ओर काटता दर्द, जो श्वसन को प्रभावित नहीं करता था, 34। [740.]
  • छोटे-छोटे स्थानों में काटते या चुटकी काटने जैसे दर्द, कभी छाती के सामने और निचले भाग में दायीं ओर, कभी यकृत-प्रदेश में गहराई में, और फिर बायीं ओर प्लीहा-प्रदेश में, 34।
  • छाती की दायीं ओर अत्यंत प्रचण्ड काटता दर्द, मानो तीखे चाकुओं से काटा जा रहा हो, जिससे साँस लगभग रुक जाती और वह चीख उठती; ये अत्यंत प्रचण्ड दर्द लगभग पंद्रह मिनट तक रहे, फिर घटकर छाती में हल्के काटते दर्द में बदल गये; ऐसा प्रतीत होता था मानो लगातार अनुभव होने वाले तीखे काटते दर्द न तो अधिक गहराई तक प्रवेश करते थे, न ही कम संवेदनशील भागों को प्रभावित करते थे (चौथा दिन), 36।
  • छाती की बायीं ओर के सामने और निचले भागों में इधर-उधर चुटकी काटने जैसे-काटते दर्द, 34।
  • पूरा उच्छ्वास करने पर छाती की बायीं ओर गहराई में मंद चुभाव, किंतु अंतःश्वास पर नहीं; तथापि शीघ्र बाद केवल अंतःश्वास पर, 52।
  • छाती की दायीं भित्ति में क्षणिक, चुभता, वातरोग-जैसा दर्द, 38।
  • छाती की दायीं ओर चुभाव, 45।
  • छाती की बायीं ओर, आठवीं पसली के निकट, चुभाव, 73।
  • छाती की दायीं ओर निचले भाग में, फेफड़े में, चुभाव, 35।
  • अंतःश्वास पर छाती की बायीं ओर चुभाव, और खाँसने पर भी, यद्यपि कम, 52।
  • बायें हंसली-अस्थि के नीचे क्षणिक चुभाव (ग्यारह घंटे बाद), 39। [750.]
  • छाती की दायीं ओर मंद चुभाव, 52।
  • छाती की दायीं ओर भीतर से बाहर की दिशा में प्रचण्ड चुभाव, 52।
  • छाती की बायीं ओर ऊपरी भाग में प्रचण्ड चुभाव, 52।
  • दायीं छाती के बहुत भीतर मंद चुभता-फाड़ता दर्द, जहाँ यह पहचानना कठिन था कि वह पीठ में अधिक था—जहाँ से वह फैलता हुआ प्रतीत होता था—या छाती में, 52।
  • सुबह बिस्तर में छाती की बायीं ओर कई प्रचण्ड चुभाव, और बाद में कुछ शारीरिक परिश्रम करने पर भी, 52।
  • छाती की दायीं ओर तीखे, नुकीले चुभाव, 52।
  • छाती की दायीं ओर जलता हुआ चुभाव, मानो बाहर की ओर हो, 52।
  • बायें स्तनाग्र के क्षेत्र में, छाती के भीतर गहराई में, एक इंच से भी कम चौड़े छोटे स्थान में दुखनयुक्त दर्द; स्थान अत्यंत संवेदनशील था और अंतःश्वास पर अधिक दर्द करता था—अंतःश्वास जितना गहरा होता, वह स्थान उतना ही अधिक दर्द करता; बिस्तर से उठने के बाद राहत, 35।
  • छाती की दायीं ओर, बगल के निकट, मंद फाड़ता दर्द, जो बाद में दुखन की संवेदना में बदल गया; स्पर्श और गति पर भी, 52।

हृदय और नाड़ी

  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में हल्की क्षणिक धड़कन और क्षणिक चुभाव, 27। [760.]
  • रात में बायीं करवट लेटने पर हृदय में ऐसा भराव और दबाव मानो रक्त ठहर गया हो, जिससे उसे दायीं करवट लेटना पड़ा, 38।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में दबाव और व्याकुलता, 16।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में दबाव और घुटन, साथ में ऐसा अनुभव मानो उसे मस्तिष्काघात होने वाला हो; इधर-उधर चलने से राहत (चौथा दिन), 37।
  • दोपहर बाद प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में क्षणिक दबाव (पहला दिन), 26।
  • हृदय पर दबाव और घुटन, 33 ; (शीघ्र), 32।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में दबाव और घुटन, साथ में हृदय की हल्की धड़कन (दूसरा दिन), 25।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में हल्का दबाव और घुटन, 27।
  • हृदय में चुभाव, 45।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में क्षणिक चुभाव (शीघ्र), 33, 45।
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र में फाड़ता दर्द, 52। [770.]
  • प्रीकॉर्डियल क्षेत्र दबाने पर संवेदनशील, 49।
  • हृदय-स्पंदन, 31, 59 ; (शीघ्र), 32।*
  • दोपहर बाद हृदय-स्पंदन, 28।
  • आवधिक हृदय-स्पंदन, साथ में हृदय पर दबाव और घुटन (दूसरा दिन), 32।
  • जागने पर हृदय-स्पंदन (तीसरा दिन), 33।
  • प्रबल हृदय-स्पंदन, 51।
  • सोने जाते समय हृदय का प्रबल स्पंदन (12th dil. से), 41।
  • रात में सुनाई देने वाला हृदय-स्पंदन, 32 ; (दूसरा दिन), 33।
  • हृदय की कुछ मंद, अनियमित, मानो दबी हुई धड़कनें, साथ में छाती में एक विचित्र, अवर्णनीय संवेदना (शीघ्र), 34।
  • हृदय की धड़कन मुश्किल से अनुभव होती थी, किंतु उदर में स्पंदन बहुत स्पष्ट अनुभव होता था, 39।
  • नाड़ी। [780.]
  • तेज नाड़ी, 76।
  • नाड़ी तेज, 3, 39।
  • नाड़ी तेज, छोटी, रुक-रुककर नहीं चलती, 85।
  • *नाड़ी छोटी, तेज, 18, 60।
  • नाड़ी छोटी और कुछ तेज (बारह घंटे बाद), 18।
  • नाड़ी दुर्बल, 80 से 90 के बीच, 80।
  • नाड़ी बड़ी, भरी हुई और कठोर; एक मिनट में 90 से 100 स्पंदन, 51।
  • नाड़ी 170; दुर्बल और धागे जैसी पतली, 69।
  • नाड़ी 190 (नौवाँ दिन), 20।
  • औषधि लेने के बाद (तीसरी मात्रा, तीसरा दिन) नाड़ी 50; एक घंटे बाद 60; अगली सुबह 60; दोपहर में 70, 29। [790.]
  • नाड़ी धीमी, 66 (शीघ्र), 32।
  • नाड़ी धीमी, 61 (शीघ्र), 33।
  • नाड़ी धीमी, 45 और अत्यंत क्षीण (चार घंटे बाद), 82।
  • नाड़ी छोटी, धीमी, दुर्बल, 67।
  • जब तक मितली बनी रही, नाड़ी दुर्बल और धीमी रही, 9।
  • नाड़ी छोटी, धीमी और दुर्बल, 13।
  • नाड़ी धागे जैसी पतली, अत्यंत धीमी, 78।
  • नाड़ी की आवृत्ति एक मिनट में दस या बीस स्पंदन घट गयी (बारह घंटे बाद), 81।
  • औषधि लेने से पहले नाड़ी 70, दो घंटे बाद 60; बारह घंटे बाद, शाम को, 65 (3d dil. से), 28।
  • औषधि लेने से पहले नाड़ी 70; दो घंटे बाद 65, अत्यंत दुर्बल; बारह घंटे बाद शाम को 57; उसके एक घंटे बाद 70, 29। [800.]
  • पहले चौबीस घंटों में नाड़ी दुर्बल और धीमी, उसके बाद चौबीस घंटों तक 100, दुर्बलता के अतिरिक्त किसी रोगात्मक लक्षण के बिना, 7।
  • नाड़ी 108, दुर्बल, उत्तेज्य, अत्यंत अनियमित, कभी तेज और कभी धीमी, 48।
  • नाड़ी रुक-रुककर चलती, मुश्किल से अनुभव होने योग्य (पंद्रह घंटे बाद), 67।
  • संकुचित, ऐंठनयुक्त नाड़ी, 80, 17, 65।
  • नाड़ी छोटी, 177।
  • नाड़ी छोटी, संकुचित, 19।
  • नाड़ी छोटी और तनी हुई, 16।
  • नाड़ी छोटी, मुश्किल से अनुभव होने योग्य, 84।
  • नाड़ी उत्तरोत्तर छोटी और अधिक संकुचित, 75। [810.]
  • नाड़ी अनुभव नहीं होती; किंतु कुछ घंटों बाद वह धागे जैसी पतली और काँपती हुई हो गयी, 20।

गर्दन और पीठ

  • गर्दन।
  • ग्रीवा-धमनियों में दिखाई देने वाला स्पंदन, जो विशेषकर चुपचाप बैठे रहने पर अनुभव होता था, 39।
  • गर्दन की पेशियों का पक्षाघात, जिससे बच्चे को ऊपर उठाने पर उसका सिर पीछे की ओर गिर जाता था और मुँह पूरा खुला रहता था (नौवाँ दिन), 20।
  • गर्दन में आमवाती पीड़ा, विशेषकर दाहिनी ट्रैपेज़ियस पेशी में, जो इतनी पीड़ादायक थी कि गर्दन से कोई गलत हरकत होने पर वह चीखने को विवश हो जाता था; यह दो या तीन सप्ताह तक रही, 71।
  • गर्दन के पिछले भाग और पश्चकपाल में अत्यधिक अकड़न और दर्द, जो सिर हिलाने से बढ़ता था (तीसरा दिन), 83।
  • गर्दन और पश्चकपाल में दर्द तथा अकड़न (तीसरा दिन), 14।
  • गर्दन के पिछले भाग में दर्द, 84।
  • गर्दन के पिछले भाग की दाहिनी ओर, बाहरी सतह पर जलन, 52।
  • दाहिनी ग्रीवा-पेशियों में तनने जैसा दर्द, जो बाहर से और निगलते समय अनुभव होता था (आधे घंटे बाद), 54।
  • गर्दन के ऊपरी भाग में, कान के नीचे और जबड़ों के संधिस्थल के पास दबावकारी दर्द; स्पर्श करने पर कुछ दुखन के साथ, 52। [820.]
  • ग्रीवा-पेशियों में कुछ चुभनें, 51।
  • पीठ।
  • शांत लेटे रहने पर पीठ में खिंचावयुक्त दर्द, चलने-फिरने से बेहतर (दूसरा दिन), 32।
  • मेरुदंड के बाईं ओर पीठ में फाड़ता हुआ दर्द, 52।
  • पृष्ठीय भाग।
  • वक्ष से आने वाला अंसफलक-संबंधी दर्द; देर तक बैठने पर (पाँचवाँ दिन), 40।
  • अंसफलक और गर्दन के पिछले भाग में अत्यंत तीव्र आमवाती दर्द, जो अधिकांशतः बारी-बारी से तनने और दबावकारी प्रकार का था तथा गर्दन को स्वतंत्र रूप से हिलने नहीं देता था, विशेषकर उसे बाईं ओर मोड़ने या बहुत पीछे तक तानने में, 35।
  • दबावकारी, आवधिक आमवाती दर्द; गर्दन के पिछले भाग की अपेक्षा अंसफलकों में अधिक, 35।
  • दाहिने अंसफलक के बाईं ओर स्थित ऊपरी कोण पर निरंतर मंद चुभन, 52।
  • पीठ में, अंसफलकों के नीचे और उनके बीच तीव्र, दबावकारी, मंद और निरंतर चुभन, 52।
  • कटि-भाग।
  • कटि-प्रदेश में दर्द, 54।
  • कटि-कशेरुकाओं के दोनों ओर मंद दबाव (नौ घंटे बाद), 7। [830.]
  • कटि-प्रदेश में निरंतर चुभता-फाड़ता दर्द, 34।
  • कटि और मूत्रमार्गों के प्रदेश में तीव्र मरोड़, निरंतर मूत्रत्याग की इच्छा के साथ (दो घंटे बाद), 3।*
  • कमर के निचले भाग में भारीपन का अनुभव, साथ में ऐसी अनुभूति मानो मलाशय ठूँसकर भर दिया गया हो, 39।
  • कमर के निचले भाग में दर्द, 45।
  • जागने पर कमर के निचले भाग में खिंचाव, 39।
  • कमर के निचले भाग में खिंचाव, जो चलने-फिरने से बढ़ता था, 51।
  • कमर के निचले भाग में हल्का खिंचावयुक्त दर्द (तीसरा दिन), 33।
  • कमर के निचले भाग में चुभती हुई चुभनें, 51।
  • सुबह कमर के निचले भाग में कुचले जाने जैसा अनुभव, 39।
  • (कमर के निचले भाग में कुचले जाने जैसा दर्द), 25, 26 । [यह लक्षण, जो इस व्यक्ति पर किए गए औषध-परीक्षणों के दौरान बार-बार प्रकट होता है, केवल इसे अस्वीकार करने के लिए उल्लिखित है, क्योंकि यह औषध-परीक्षण से पहले भी उसके सामान्य लक्षणों में से एक था। -T. F. A.] [840.]
  • (कमर के निचले भाग का कुचले जाने जैसा दर्द लुप्त हो जाता है), 25 । [यह उपचारात्मक प्रभाव है, क्योंकि औषध-परीक्षक प्रायः कमर के निचले भाग में आमवाती दर्द से पीड़ित रहता था।]
  • वृक्कों के प्रदेश में तनाव, 70।
  • त्रिकास्थि-प्रदेश।
  • त्रिकास्थि में निरंतर दर्द के कारण वह रात में बार-बार जाग गया (पहली रात), 37।
  • दोपहर बाद त्रिकास्थि की गहराई में दबाव (पहला दिन), 37।
  • त्रिकास्थि और अनुत्रिकास्थि के प्रदेश में चुभता हुआ दर्द, 45।
  • अंतिम कशेरुकाओं और त्रिकास्थि के संधिस्थल पर निरंतर दबावकारी दर्द, जो खड़े रहने या चलने से बढ़ता था, 37 । [इसे पहले भी (औषध-परीक्षण से पूर्व) आमवाती विकार के रूप में देखा गया था।]
  • त्रिकास्थि में जलनयुक्त चुभनें, 52।
  • त्रिकास्थि के मध्य में, हथेली के आकार का अत्यंत पीड़ादायक स्थान, मानो वहाँ पू बन रही हो; जो किंचित स्पर्श से भी असहनीय रूप से दुखता था, 51।
  • पीठ में, गुदा के ठीक ऊपर दर्द, साथ में गर्म, खुजलीयुक्त जलन की अनुभूति, मानो फफोला पड़ गया हो; त्वचा का वह भाग हल्के स्पर्श के प्रति संवेदनशील प्रतीत होता था, परंतु जोर के दबाव के प्रति नहीं; उसे खुजलाने की इच्छा होती थी, जिससे आराम मिलता था और कुछ लालिमा हो जाती थी, 27।

सामान्य रूप से अंग

  • वस्तुगत।
  • बाईं कोहनी और घुटने की संधियाँ सूजी हुई, गर्म और पीड़ादायक थीं, जबकि दाहिनी ओर आंशिक पक्षाघात था और संवेदना लगभग समाप्त थी, 20। [850.]
  • कभी-कभी पैर और हाथ की उँगलियाँ पीड़ापूर्वक मुड़ जाती थीं (ग्यारह घंटे बाद), 83।
  • अंगों में हल्की फड़कनें, 85।
  • सभी अंगों में बिजली के झटकों जैसी झटकनें, विशेषकर प्रपदास्थि-संधियों में (चौबीस घंटे बाद), 71।
  • अंगों में कंपन, जो बढ़कर तीव्र आक्षेपी गतिविधियों के दौरे में बदल गया (आठ घंटे बाद); तीन घंटे बाद वैसा ही एक और दौरा हुआ, जिसके अंत में दो बार उलटी हुई, 20।
  • हाथ-पैरों में कंपन; ये गतिविधियाँ अधिक तीव्र और आक्षेपी हो गईं, साथ में मुँह से बहुत अधिक सफेद-सा झाग बहने लगा; पंद्रह मिनट बाद दौरा opisthotonos जैसा हो गया; रात 11 से 2 बजे तक शांत नींद के बाद उसी प्रकार और उतनी ही अवधि का एक और दौरा हुआ, 20।
  • अंगों की ऐसी दुर्बलता कि वह चल नहीं सकी, 79।
  • सुबह अंगों में दुर्बलता, 28।
  • सभी अंगों में अत्यधिक दुर्बलता, मूर्च्छा-सी अनुभूति, उनींदापन और गहन शक्तिहीनता, साथ में काम करने की अनिच्छा, 11।
  • दाहिने पैर और बाईं बाँह का पक्षाघात, 20।
  • सुबह अंग थके हुए लगते हैं, 74। [860.]
  • सभी अंगों में दुर्बलता और गहन शक्तिहीनता की अनुभूति, 73।
  • उसने अंगों की पेशियों में इतनी अधिक दुर्बलता अनुभव की कि उसे लगा, वह गिर जाएगी, 51।
  • चलने का प्रयास करने पर ऐसा लगता है मानो अंगों की शक्ति समाप्त हो गई हो, 67।
  • पैरों और हाथों में सुन्नपन, जिसके बाद सुइयाँ चुभने जैसी अनुभूति हुई, मानो “वे सो गए हों” (ग्यारह घंटे बाद), 83।
  • रात में सभी अंगों में बेचैनी (पाँचवाँ दिन), 36।
  • अंगों में दर्द, 84।
  • सभी अंगों में दर्द, 77।
  • हाथ और पैर की उँगलियों की सभी संधियाँ तथा कलाइयाँ और टखने भी अत्यंत पीड़ादायक थे (ग्यारह घंटे बाद), 83।
  • इस रोगावस्था की सबसे उल्लेखनीय विशेषता हाथों और पैरों में आमवाती प्रकार का तीव्र दर्द था, जो सबसे पहले आरंभ हुआ और रोगावस्था की उत्पत्ति तथा प्रगति के दौरान बना रहा; वह इतना तीव्र हो गया कि वह न तो अपनी उँगलियों की संधियों पर दबाव सह सकती थी और न उन्हें उनकी अर्ध-मुड़ी अवस्था से सीधा किया जाना, 83।
  • आराम की अवस्था में कंधे और घुटने पीड़ादायक, चलने-फिरने पर बेहतर; बेचैनी, जिसके कारण उसे अंगों को निरंतर हिलाना पड़ता था (पहला दिन), 33। [870.]
  • कंधों, अंगों और मेरुदंड में तीव्र खिंचावयुक्त दर्द (छह दिन बाद), (प्रतिविषों के बाद)। अंततः लगभग सभी अस्थियाँ और संधियाँ दर्द से प्रभावित हो गईं; दर्द का स्वरूप कुतरने और घसीटने जैसा था, 83।
  • कभी चुभता हुआ, कभी झटकेदार खिंचाव (विशेषकर सुबह), कभी कंधे की पेशियों में, तो कभी दाहिनी ओर के नितंब-संधि प्रदेश में, 51।

ऊपरी अंग

  • वस्तुगत।
  • दाहिनी बाँह और हाथ लकवाग्रस्त; अंगूठा भीतर की ओर खिंचा हुआ और शेष उँगलियाँ ऐंठन के साथ उसके ऊपर बंद थीं (चार सप्ताह बाद), 20।
  • आत्मगत।
  • दोपहर में दाहिनी बाँह में कमजोरी की अनुभूति, 33।
  • बायीं ऊपरी बाँह और अग्रबाहु विकल तथा दुर्बल लगे, 27।
  • पूरी बायीं बाँह में लकवे जैसी अनुभूति, 71।
  • बाँहें भारी लगती हैं, 73।
  • *बाँहों में इतना तीव्र पक्षाघात-जैसा दर्द कि वह हल्की-से-हल्की वस्तु भी मजबूती से नहीं पकड़ सकता, 51।
  • बाँहों में चीरता दर्द, साथ में लकवे जैसी अनुभूति, 73। [880.]
  • बायीं बाँह में काटता-चीरता दर्द, 34।
  • कंधा।
  • कंधे की संधि में दर्द (दूसरे दिन), 14।
  • कंधों की संधियों में दर्द, जिसके बाद कूल्हों और कटि-प्रदेश में दर्द हुआ; इसकी तीव्रता इतनी बढ़ गई कि उसने कहा, उसे लगा कि वह पागल हो जाएगी (ग्यारह घंटे बाद), 83।
  • बाएँ कंधे पर चिकोटी काटने जैसा दर्द, 52।
  • दाएँ कंधे में चीरता दर्द (दूसरे दिन), 33।
  • दाहिनी ओर कांख के नीचे मंद, चीरता हुआ दबाव, 52।
  • बार-बार चीरता-दबाता दर्द, कभी दाहिनी तो कभी बायीं कांख में, 52।
  • दाएँ कंधे और दाएँ अग्रबाहु में चीरता दर्द, 71।
  • दाएँ कंधे में क्षणिक चुभती टीसें (पाँच घंटे बाद), 39।
  • दाहिनी कांख के नीचे और लगभग कांख में ही एक छोटे-से स्थान पर ऐसा दर्द, जैसा चोट लगने के बाद होता है, 52। [890.]
  • बायीं कांख में बुलबुले उठने की तीव्र अनुभूति, जो बाहर से भी महसूस की जा सकती थी, 52।
  • ऊपरी बाँह।
  • बायीं ऊपरी बाँह में कोहनी के ऊपर दबाव की अनुभूति, जो दोपहर बाद बाँह हिलाने पर, विशेषकर उसे ऊपर उठाने पर, तीव्र दर्द में बदल गई; इसलिए अकेले कोट पहनना असंभव था; विश्राम के समय और न ही रात में यह महसूस हुआ, 42।
  • बायीं ऊपरी बाँह की भीतरी ओर, कांख के निकट, जलता-दबाता दर्द, 52।
  • बायीं ऊपरी बाँह में अत्यंत कष्टदायक चीरती पीड़ाएँ, 35।
  • कोहनी।
  • ऊपरी बाँहों से फैलता हुआ, दोनों कोहनियों की भीतरी ओर चीरता दर्द, 52।
  • शीघ्र ही बायीं कोहनी में क्षणिक चुभती टीसें, 33।
  • बायीं कोहनी में लंबी चुभती टीसें, जिनके बाद वह स्थान स्पर्श के प्रति संवेदनशील था, 34।
  • अग्रबाहु।
  • दोनों अग्रबाहुओं में दर्द की लगातार शिकायत (दूसरे दिन), 20।
  • दोनों अग्रबाहुओं में दर्द, जो हल्के-से-हल्के स्पर्श के प्रति भी अत्यंत संवेदनशील था (सोलह घंटे बाद), 20।
  • बाएँ अंगूठे से अग्रबाहु की अंगूठे की ओर वाली पूरी सतह के साथ ऊपर तक खिंचाव, 71। [900.]
  • कलाई के निकट अग्रबाहु में चीरता दर्द, 52।
  • बाएँ अग्रबाहु की पूरी मोड़क सतह में चीरती पीड़ाएँ, जो ऊपर कोहनी की संधि तक फैलती थीं, 71।
  • अग्रबाहु की प्रसारक सतह पर अंतरालों में अत्यंत कष्टदायक चीरता दर्द, मानो कुछ तंत्रिकाएँ फट रही हों, 34।
  • बाएँ अग्रबाहु की प्रसारक सतह पर महीन चीरता दर्द, जो कुछ उँगलियों तक फैलता था, 34।
  • दाएँ अग्रबाहु में अत्यंत कष्टदायक महीन चीरता दर्द, विशेषकर मांसपेशियों की बाहरी ओर; विश्राम या गति से अप्रभावित, 35।
  • अग्रबाहु की प्रसारक सतह पर अत्यंत महीन, भेदती-चीरती पीड़ाएँ, जो उँगलियों तक फैलती थीं, मानो बिजली के झटकों से हों, 34।
  • बाएँ अग्रबाहु की बाहरी ओर चीरता दर्द, मानो पेशी-आवरण में हो, 34।
  • दाहिनी बाँह में झटकेदार चीरती पीड़ाएँ, जो कोहनी से कलाई तक फैलती थीं; यह बार-बार दोहराया गया, किंतु हर बार केवल एक सेकंड तक रहा; बाद में ऐसा ही दर्द कलाई से उँगलियों के सिरों तक फैला, 72।
  • बाएँ अग्रबाहु की बाहरी ओर बुलबुले उठने की अनुभूति, 32।
  • कलाई।
  • दाहिनी कलाई में दर्द (शीघ्र), 20। [910.]
  • बायीं कलाई की हथेलीवाली सतह पर चुभन और गर्मी, बाद में दाहिनी कलाई में, 38।
  • दोनों कलाइयों और कोहनियों में हल्की चुभती टीसें (पहली रात), 32।
  • दाहिनी कलाई में चीरता दर्द, 52।
  • हाथ।
  • हाथों का ऐंठनयुक्त संकुचन, जिससे उँगलियाँ सीधी तनी हुई थीं और अंगूठे का उभार हथेली की ओर मुड़ गया था, 50।
  • हाथों में कंपन, 48।
  • दायाँ हाथ इतना काँपता है कि लिखना लगभग असंभव हो जाता है, 52।
  • हाथ इतने शक्तिहीन लगते हैं कि ऐसा प्रतीत होता है, मानो वह पकड़ी हुई वस्तुओं को हाथ से जमीन पर गिरने से रोक नहीं सकेगी, 73।
  • बाएँ करभास्थि-प्रदेश में, विशेषकर तीसरी और चौथी उँगलियों के बीच, गति करने पर और खासकर हाथ मोड़ने पर दर्द, 43।
  • हाथों में निरंतर खिंचाव, जो उँगलियों तक फैलता है, 73।
  • दाएँ हाथ के पृष्ठभाग पर चीरता दर्द, 52। [920.]
  • दाएँ हाथ में और छोटी उँगली की अंतिम अंगुलास्थि के नीचे चीरता दर्द; कभी-कभी अत्यंत तीव्र, 52।
  • चुभता-चीरता दर्द, विशेषकर दाएँ हाथ के निचले भाग में, 52।
  • उँगलियाँ।
  • उँगलियों के सिरे और नाखून नीले, 84।
  • नाखून नीले, 68।
  • उँगलियाँ ऐंठन के साथ मुड़ी हुईं, यद्यपि निरंतर गति में, 84।
  • दाएँ हाथ की तीसरी और चौथी उँगलियाँ भीतर की ओर खिंची हुई हैं, 51।
  • दाएँ अंगूठे की करभास्थीय संधियों में वातरोगीय खिंचाव, 52।
  • दाएँ अंगूठे के पृष्ठभाग और उभार में दबावयुक्त खिंचाव, 52।
  • दाएँ अंगूठे की करभास्थीय संधि में ऐसा दर्द, मानो उसमें कोई काँटा गड़ा हो, 52।
  • उँगलियों के सिरों की हथेलीवाली सतह पर ऐसा दर्द, मानो काँटा लगा हो, 34। [930.]
  • बाएँ अंगूठे में चुभती टीसें (डेढ़ घंटे बाद), 39।
  • दाएँ हाथ की उँगलियों की संधियों में चीरता दर्द, 52।
  • बायीं तर्जनी के नाखून के नीचे चीरता दर्द, 52।
  • दाएँ हाथ की मध्यमा और अनामिका की करभास्थियों में चीरता दर्द, 52।
  • बायीं छोटी उँगली में चीरती पीड़ाएँ, 34।
  • बाएँ हाथ की छोटी उँगली और अनामिका की अंतिम अंगुलास्थियों में चीरता दर्द, 52।
  • दाहिनी छोटी उँगली के स्नायुबंधों में चुभता-चीरता दर्द, 51।

निचले अंग

  • चलने का प्रयास करने पर ऐसा लगता है मानो उसके अंगों का उपयोग समाप्त हो जाएगा, 13।
  • कूल्हा।
  • बाएँ कूल्हे में हल्का चटकना, 27।
  • बाएँ कूल्हे में कोई जीवित चीज़ होने जैसी अनुभूति, 27। [940.]
  • कूल्हों और कटि में दर्द (तीसरा दिन), 14।
  • कूल्हे की संधियों में खिंचाव (शीघ्र), 33।
  • रात में इधर-उधर चलने पर कूल्हे की हड्डी में हल्का खिंचता दर्द (दूसरा दिन), 32।
  • दाएँ कूल्हे पर और उसके ऊपर चिमटने जैसा दबाव, 52।
  • कूल्हों में क्षणिक चुभनें, विशेषकर बाएँ में, 27।
  • कूल्हे के क्षेत्र में चीरता दर्द, 52।
  • दाएँ कूल्हे की संधि में हल्का चीरता दर्द, जो जाँघ से होकर घुटने तक फैलता है (सात घंटे बाद), 71।
  • बाएँ कूल्हे के क्षेत्र में भीतर गहरा खिंचता-चीरता दर्द, जिसका स्थान स्नायुबंधों में प्रतीत होता है; रात में अधिक, 51।
  • जाँघ।
  • जाँघें बाहर की ओर फैली हुई, 80।
  • बाईं जाँघ में अकड़न, जिससे चलना कठिन होता है, 71। [950.]
  • जाँघ में ऐंठन जैसा चिमटना, मानो वह सुन्न पड़ गई हो, 52।
  • जाँघ की मांसपेशियों में भीतर गहरा खिंचाव, 51।
  • बाईं जाँघ की हड्डी में खिंचते दर्द, कभी अधिक, कभी कम, मानो अत्यधिक थकान से हों, अथवा बढ़ने की अवस्था के दर्द जैसे, 34।
  • बाएँ नितंब के नीचे अचानक चुभता-खींचता दर्द, जो मूलाधार-प्रदेश तक फैलता है और आधे मिनट तक रहता है, 39।
  • शाम को बिस्तर में पूरी दाईं जाँघ में तीव्र, पक्षाघात-जैसा खिंचाव, 52।
  • जाँघों की हड्डियों पर दबाव; मध्य भाग विशेष रूप से दर्दनाक, 35।
  • जाँघ में चीरता दर्द, जो कूल्हे की ओर फैलता है, 52।
  • बाईं जाँघ के ऊपरी भाग में चीरता दर्द, 52।
  • दाईं जाँघ की भीतरी ओर बहुत ऊपर चीरता दर्द, 52।
  • नितंब में भीतर गहरा चीरता दर्द, गुदा की ओर, 52। [960.]
  • शाम को बिस्तर में बाईं जाँघ के मध्य भाग में चीरता दर्द, 52।
  • दाईं जाँघ के ऊपरी भाग में झटके जैसा चीरता दर्द, 52।
  • बाएँ कूल्हे की संधि से टाँग की ओर झटके से दौड़ता क्षणिक चीरता दर्द, 52।
  • घुटना।
  • दाएँ घुटने की बाईं सतह पर हल्का, क्षणिक चटकना, 27।
  • सीढ़ियाँ चढ़ते समय घुटना टूटा-सा (थका हुआ) लगता है, 27।
  • शाम को बिस्तर में दाएँ घुटने की संधि में दर्द, साथ में ऐसा अनुभव मानो वह पक्षाघातग्रस्त हो (पाँचवाँ दिन), 71।
  • लंबी दूरी तक चलते समय दाएँ घुटने के मोड़ में दर्दनाक अनुभूति, जो पिंडली तक उतरती है, जहाँ तनाव था, 43।
  • बाएँ घुटने में अत्यंत तीव्र, लगातार दर्द, 75।
  • दाएँ घुटने की भीतरी ओर दबाता हुआ दर्द, 52।
  • घुटनों और टखनों में क्षणिक चुभनें (पहला दिन), 32। [970.]
  • घुटने की चकती के ठीक नीचे चीरते दर्द, 34।
  • शाम को बिस्तर में बाएँ घुटने के ठीक ऊपर चीरता दर्द, 52।
  • घुटने की चकती के नीचे, पीछे की ओर चीरते दर्द, 34।
  • घुटने की संधि में चुभनें (दूसरा दिन), 33।
  • टाँग।
  • टाँगों में दर्द, 76।
  • पिंडलियों और पैरों में दर्द, 19।
  • पिंडलियों की हड्डियों के अग्रभाग पर ऐसा दर्द मानो हड्डियों में ठिठुरन हो, जो गर्मी से कम नहीं होता, 34।
  • टाँग के अग्रभाग में तीव्र दर्द, मानो ठिठुरन से हो, विशेषकर पिंडली की हड्डी पर; निचली टाँगों में ठंडापन, यहाँ तक कि बिस्तर में भी, 34।
  • पिंडली की हड्डी के अग्रभाग में अत्यंत संवेदनशील मंद दर्द, मानो हड्डी ठिठुर गई हो, अथवा बढ़ने की अवस्था के दर्द जैसा, 34।
  • टाँगों में ऐंठनें, 69।* [980.]
  • दोनों पिंडलियों और दाएँ मध्यपाद में खिंचाव (सात घंटे बाद), 71।
  • दाईं पिंडली के निचले भाग में चीरता दर्द, 52।
  • बाईं पिंडली की बाईं ओर चीरता दर्द, 52।
  • बाईं पिंडली की हड्डी के बाईं ओर के निचले भाग में तनावयुक्त चीरता दर्द, 52।
  • दाएँ tendo Achillis के जुड़ाव-स्थल पर चिमटता-चीरता दर्द, 34।
  • टखना।
  • बाईं गुल्फ-संधियों में चीरता दर्द, 52।
  • दाएँ बाहरी गुल्फ पर थकान जैसा दर्दनाक दबाव, रात 8 बजे (पहला दिन), 37।
  • पैर।
  • पैरों में कमजोरी (शीघ्र), 33।
  • पैरों में कमजोरी की अनुभूति, 30।
  • पैरों में अत्यधिक भारीपन, जो नीचे की ओर निचली टाँगों में फैलता है (दूसरा दिन), 44। [990.]
  • पैरों में ऐंठन, 77।
  • दोनों पैरों में बहुत दर्दनाक ऐंठनें, विशेषकर बाएँ में, 75।
  • पैरों में चीरता दर्द, मानो वे पक्षाघातग्रस्त हों, 73।
  • पूरे बाएँ पैर में आर-पार चीरते दर्द, 73।
  • मध्यपाद-संधियों की भीतरी ओर चीरते दर्द, 34।
  • बाएँ पैर के ऊपरी भाग में चीरता दर्द, 52।
  • दाएँ पैर के ऊपरी मेहराबी भाग पर खिंचता-चीरता दर्द, 52।
  • दोनों तलवा-प्रदेशों में तीव्र, दर्दनाक ऐंठनें (शीघ्र), 78।
  • बाएँ तलवे में, पैर की उँगलियों से अधिक दूर नहीं, चीरता दर्द, 52।
  • दाएँ पैर की भीतरी मेहराब पर, अँगूठे की जड़ के गद्देदार भाग और एड़ी के बीच चीरता दर्द, 52। [1000.]
  • दाएँ पैर के अग्रभाग में एक छोटे-से स्थान पर, गुल्फ से तीन अंगुल की दूरी पर, तलवे के निकट चीरता दर्द, 52।
  • बाएँ तलवे में खिंचता-चीरता दर्द, 51।
  • बाएँ तलवे में, मध्यपाद के एक छोटे-से स्थान पर चीरते दर्द, 34।
  • दाईं एड़ी में तलवे के निकट चीरता दर्द, 52।
  • पैर की उँगलियाँ।
  • बाएँ अँगूठे में दर्द, मानो नाखून मांस में धँस जाएगा, 52।
  • पूरे बाएँ अँगूठे में दबाता-खींचता दर्द, बाद में दाएँ में भी, और फिर बाएँ पैर की बीच की उँगलियों में; दर्द उँगलियों की निचली सतह पर अधिक प्रतीत होता है, 52।
  • दाएँ अँगूठे में चुभती-खींचती अनुभूति, 39।
  • दाएँ अँगूठे के सिरे पर, नाखून के ऊपरी भाग के आर-पार अत्यंत संवेदनशील, तीखी, छेदती चुभनें, 52।
  • दाएँ अँगूठे की जड़ के गद्देदार भाग में, उसकी निचली ओर के निकट चुभता-चीरता दर्द, 52।

सामान्य लक्षण

  • वस्तुगत।
  • फाइब्रिन-रहित रक्त के ठोस घटक कम हो गए थे; साथ ही रक्त-कणिकाओं और प्लाज़्मा की निरपेक्ष मात्रा भी कम हो गई थी, 22. [1010.]
  • रक्त में रंगीन कणिकाओं की मात्रा कुछ कम हो गई थी, 11.
  • चाल बहुत अस्थिर और लड़खड़ाती हुई थी—आंशिक रूप से दुर्बलता के कारण और आंशिक रूप से अचानक होने वाले चुभते-फाड़ते झटकों के कारण, जो अस्थि-आवरण में आर-पार दौड़ते थे और सदैव पक्षाघात की अनुभूति तथा वास्तविक क्षणिक पक्षाघात के साथ होते थे, 51.
  • अंगड़ाइयाँ, 39.
  • आक्षेप; दाहिनी बाँह सीधी नहीं की जा सकती थी, बाईं बाँह मोड़ी नहीं जा सकती थी; दोनों पाँव ऊपर की ओर खिंचे हुए थे; तलवे अर्धवृत्त बनाते थे और पैर की अंगुलियाँ आक्षेपपूर्वक भीतर की ओर खिंची हुई थीं (सात सप्ताह बाद), 20.
  • बाईं ओर तथा चेहरे की मांसपेशियों में आक्षेप (दसवाँ दिन), 20.
  • रोगी में धीरे-धीरे आक्षेप विकसित हुए, जिनमें हाथ-पाँव आक्षेपपूर्वक मुड़ जाते थे; हाथों और पैरों की अंगुलियाँ मुड़ जाती थीं; आँखें आक्षेपपूर्वक घूमती थीं; बायाँ हाथ, जो लगातार शिश्न को पकड़े रहता था, काँपता था; आक्षेप अधिकाधिक बार होने लगे और गर्दन की मांसपेशियों तक फैल गए; निचला जबड़ा ऊपरी जबड़े से दृढ़ता से दब गया; और रोगी के मुँह से झाग निकलने लगा, 20 . [इस प्रकरण की प्रगति के दौरान प्रतिविषों—Tartar emetic, Ipecac आदि—के दिए जाने के बाद दर्ज शेष लक्षणों को सम्मिलित नहीं किया गया है।]
  • दुर्बलता, 39.
  • परिश्रम के बाद जैसी दुर्बलता, 55.
  • पूरे दिन दुर्बलता और श्रांति, जो शाम को लुप्त हो जाती थी, 13 ; (पाँचवाँ दिन), 10.
  • सुबह अत्यधिक दुर्बलता, 37. [1020.]
  • अत्यधिक दुर्बलता और थकावट, 69.
  • सामान्य दुर्बलता, 39 ; (शीघ्र), 33.
  • शक्ति का अचानक ह्रास, यहाँ तक कि दस घंटे बाद वह मुश्किल से बोल पाता या कमरे के पार चल पाता था, 51.
  • मांसपेशियों की पीड़ायुक्त शक्तिहीनता, विशेषकर घुटनों के जोड़ों के आसपास, जिससे घुटने बार-बार जवाब दे जाते थे, खासकर किसी ऊँची वस्तु—उदाहरणार्थ देहरी—के ऊपर से कदम रखने के लिए पैर उठाते समय, 51.
  • वह बिल्कुल शक्तिहीन था और पूरा शरीर, विशेषकर बाँहें, पक्षाघातग्रस्त-सा प्रतीत होता था, 51.
  • थकावट, 50.
  • अत्यधिक थकावट, 19, 80 ; (दूसरी शाम), 21.
  • सामान्य घोर अशक्ति, 19.
  • अत्यधिक घोर अशक्ति और दुर्बलता (चौबीस घंटे बाद), 71.
  • दाहिनी ओर का पूर्ण पक्षाघात, जिसमें केवल थोड़ी-सी संवेदना शेष थी; तनिक-सा स्पर्श होते ही पैर की अंगुलियाँ तलवे की ओर खिंच जाती थीं (नौवाँ दिन), 20. [1030.]
  • प्रचुर मलोत्सर्ग के बाद बेहोशी-सी अनुभूति, 7.
  • बेचैनी, 11.
  • अत्यधिक बेचैन, सिर को लगातार बाएँ से दाएँ घुमाता हुआ (दूसरी सुबह), 20.
  • व्याकुलता, 85.
  • अत्यधिक व्याकुलता (सोलह घंटे बाद), 20.
  • आत्मगत।
  • तनिक-से स्पर्श के प्रति अत्यधिक संवेदनशील (दूसरा दिन), 20.
  • काम करने की अनिच्छा, 39.
  • सुबह जागने पर श्रांति (दूसरा दिन), 32.
  • सुबह उठते समय अत्यधिक श्रांति, 30.
  • मलोत्सर्ग के बाद अत्यधिक श्रांति, आलस्य, उनींदापन, हाथ-पाँव में घोर अशक्ति और काम करने की अनिच्छा, 10. [1040.]
  • अत्यंत अधिक श्रांति और घोर अशक्ति, 16.
  • सीढ़ियाँ चढ़ते समय श्रांति की अनुभूति (दस मिनट बाद), 27.
  • पूरे शरीर में दुर्बलता की अनुभूति; पाँव थके हुए लगते हैं (पाँच घंटे बाद), 71.
  • शांत बैठे रहने पर पूरे शरीर में दुर्बलता की अत्यंत तीव्र और कष्टदायक अनुभूति, साथ में गले में एक प्रकार की मिचली और सिर में भ्रम; हिलने-चलने पर, विशेषकर खुली हवा में, तुरंत राहत, किंतु बैठते ही तत्काल पुनः लौट आती थी, 35.
  • बेचैनी के साथ घोर अशक्ति की तीव्र अनुभूति (चार घंटे बाद), 82.
  • अत्यधिक घोर अशक्ति की शिकायतें, 78.
  • मानसिक शक्ति का इतना अधिक ह्रास और पूरे शरीर में ऐसी श्रांति, पीड़ा तथा संवेदनशीलता थी कि वह बड़ी कठिनाई से रोना रोक पाता था, 51.
  • सभी मांसपेशियाँ, विशेषकर हाथ-पाँव की, पक्षाघातग्रस्त-सी प्रतीत होती हैं, 51.
  • बेहोश होने की प्रवृत्ति।
  • अत्यधिक असहजता (पाँचवाँ दिन), 36. [1050.]
  • उसके कष्ट असहनीय प्रतीत होते हैं, 51.
  • हैजे-जैसा आक्रमण, जिसमें चावल के मांड-जैसी लगातार उलटियाँ और उसी प्रकार के तीव्र, जोर से निकलने वाले तथा मलत्याग की निष्फल हाजत से युक्त दस्त थे, 68.
  • शाम को पूरे शरीर में, विशेषकर पीठ, ऊपरी बाँहों और कंधों में आमवाती पीड़ा, 35.
  • उससे पूछा गया कि क्या उसे आमवाती ज्वर नहीं हो गया था। कमरे में उपस्थित कुछ स्त्रियाँ भी लक्षणों की समानता से प्रभावित हुईं, 83.
  • (पैरों और उदर में विविध प्रकार की अत्यंत तीव्र पेशीय पीड़ाएँ, वक्ष, बाँहों और पीठ में कुछ कम; संभवतः इन्हें पाँच घंटे की घुड़सवारी से संबंधित माना जा सकता है; वे लगभग आठ दिनों तक बनी रहीं), 46.
  • दोपहर में, विशेषकर भोजन के तुरंत बाद, पूरे शरीर में उपवास के कारण होने वाली कंपकंपी जैसी अनुभूति, 52.
  • शरीर में इधर-उधर छोटे-छोटे स्थानों पर फाड़ती हुई तनावट, उदाहरणार्थ अधिजठर के गर्त से कुछ नीचे, बाईं ओर की पसलियों में कांख से थोड़ा नीचे, तथा दाहिने जानुपश्च गर्त में, 52.
  • शाम को पैर की कुछ अंगुलियों, दाहिने पाँव के अग्रतल के उभरे भाग, हाथ की अंगुलियों, कानों और चेहरे की त्वचा के अनेक स्थानों में ऐंठनकारी पकड़ और रेंगने की अनुभूति, जैसे ठंड लगने के बाद या मौसम बदलने पर होती है, 54.
  • कृंतक दाँतों, पलकों, चेहरे की मांसपेशियों और शरीर के अन्य भागों में इधर-उधर हल्का खिंचाव और झटके, साथ ही फाड़ती हुई पीड़ा, 51.
  • शरीर के आधे भाग में आर-पार अचानक फाड़ते हुए झटके, विद्युत्-आघातों जैसे, 52. [1060.]
  • बार-बार एक-एक फाड़ता हुआ झटका, अधिकतर बाईं ओर, 54.
  • शाम को पीड़ाएँ असहनीय होती प्रतीत होती हैं; यदि उसमें शक्ति होती तो वह स्वयं पर क्रोधित हो उठता, 51.
  • किसी भी काम से, विशेषकर पढ़ने या लिखने से, बहुत अधिक प्रभावित (छठा दिन), 36.
  • Pulsatilla की एक मात्रा के बाद राहत (पाँचवाँ दिन), 36.

त्वचा

  • वस्तुगत।
  • त्वचा का पीलापन, 77.
  • त्वचा नीली-काली, शुष्क और गर्म (दूसरा दिन), 20.
  • पूरा शरीर सिंदूरी लाल हो गया (कुछ घंटों बाद), 20.
  • चर्मोद्गार।
  • बाईं जाँघ की भीतरी सतह और अंडकोश के उसके अनुरूप भाग पर Pityriasis (एक महीने बाद), 37.
  • (इस परीक्षण के दौरान गर्दन के पीछे मस्से जैसी दो सूखी फुंसियाँ, जो छह सप्ताह तक रहीं और त्वचा की परत उतरने के साथ गायब हो गईं), 32.
  • होंठ की लाल सीमा पर एक छोटा गोल व्रण, 34. [1070.]
  • त्वचा में चुभन, जो पूरे शरीर में झटके की तरह दौड़ती है, 51.
  • विभिन्न स्थानों पर पिस्सू के काटने जैसी तीव्र, झटकेदार सुई-चुभनें, जो मुझे खुजलाने के लिए विवश करतीं और फिर लुप्त हो जातीं, 34.
  • पूरे शरीर में खुजली, 30.
  • पूरे शरीर में खुजली, जैसे बिच्छू-बूटी या जेलीफ़िश के स्पर्श से हो, 61.
  • शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा में खुजली, 51.
  • इधर-उधर छोटे-छोटे स्थानों पर जलती हुई खुजली; खुजलाने के बाद त्वचा लाल हो जाती है और खुजली दूसरे स्थान पर चली जाती है, 34.
  • शरीर के विभिन्न भागों में चुभती हुई खुजली (पहला दिन), 34.
  • त्वचा में इधर-उधर अत्यंत जलनयुक्त, चुभती खुजली, जो खुजलाने के लिए विवश करती थी और खुजलाने से दूसरे भाग में चली जाती थी, 34.
  • दाहिने पाँव की बड़ी, दूसरी और तीसरी अंगुलियों की भीतरी सतह पर रेंगने की अनुभूति, मानो वे सुन्न पड़ गई हों, 52.
  • चेहरे पर खुजली और चर्मोद्गार, 56. [1080.]
  • दोनों अग्रबाहुओं की त्वचा में, छोटी उँगली की ओर वाले पार्श्व पर, संवेदनशील खुजली; वहाँ खुजलाए बिना ही त्वचा लाल हो जाती है, 71.
  • हाथों में हठीली खुजली, 56.

नींद और स्वप्न

  • जम्हाई, 39.
  • भोजन के बाद उदर में गड़गड़ाहट के साथ जम्हाई, जिसके बाद अत्यंत प्रचुर मलोत्सर्ग हुआ (दूसरा दिन), 46.
  • बार-बार जम्हाई (शीघ्र), 32.
  • बार-बार जम्हाई लेने के लिए विवश था, 51.
  • दिन में उनींदापन, 51.
  • उनींदापन; काम करने की अनिच्छा; साथ में सिर में भ्रम (आधे घंटे बाद), 54.
  • दोपहर में असामान्य उनींदापन (पहला दिन), 33 ; (दूसरा दिन), 32.
  • शाम को असामान्य उनींदापन (पहला दिन), 32. [1090.]
  • रात्रिभोज के शीघ्र बाद अत्यधिक उनींदापन (पाँच घंटे बाद), 27.
  • दोपहर में अत्यधिक प्रबल उनींदापन, 35.
  • आधी रात तक बहुत उनींदा; फिर आमाशय में भारी दबाव की अनुभूति से जागा, जिसके बाद दो घंटे तक पूरी तरह जागता रहा, 32.
  • सोने की असामान्य रूप से तीव्र इच्छा (तीसरी रात), 25.
  • शाम को सोने की अदम्य इच्छा (पहला दिन), 25.
  • रात में सजीव स्वप्नों और दाँत पीसने के साथ गहरी नींद, 32.
  • ढाई घंटे तक संज्ञाहीन-सी गहरी तंद्रावस्था, 12.
  • बच्चा बिस्तर पर पीठ के बल, आँखें आधी खुली और जोर से साँस लेता हुआ, संज्ञाहीन-सी गहरी तंद्रावस्था में पाया गया, 19.
  • अनिद्रा।
  • अनिद्रा, 76.
  • बेचैन नींद, 55. [1100.]
  • चिंताजनक स्वप्नों के साथ बेचैन नींद (तीसरा दिन), 26.
  • नींद बेचैन और स्फूर्तिहीन करने वाली, 74.
  • नींद अत्यंत बेचैन (दूसरा दिन), 30.
  • दोपहर में सोफ़े पर ली गई झपकी बहुत बेचैन थी और उससे केवल थोड़ी ताजगी मिली, 10.
  • दोपहर की झपकी से उसे ताजगी नहीं मिली, 11.
  • नींद बेचैन और थका देने वाली, 71.
  • अनेक स्वप्नों के साथ बेचैन नींद, 39.
  • बोझिल स्वप्नों के साथ अत्यंत बेचैन रात, 28.
  • इस धारणा के साथ भयभीत होकर नींद से बार-बार जागना कि बिस्तर में चूहे थे; लगातार दो रातों तक, 52.
  • रात में अनेक स्वप्न (पहली रात), 27. [1110.]
  • सुबह के निकट स्तंभन के साथ कामुक स्वप्न, 39.

ज्वर

  • शीतानुभूति।
  • तापमान कम, 16।
  • त्वचा का तापमान ठंडा, 17।
  • त्वचा शीतल, 65।
  • त्वचा और जीभ ठंडी, 69।
  • त्वचा, जीभ और श्वास ठंडी, 68।
  • शीतानुभूति (शीघ्र), 33 ; (दूसरे दिन), 32।
  • कमरे में शीतानुभूति, 29।
  • पूरे दिन शीतानुभूति, 10।
  • पूरे शरीर में शीतानुभूति, कमरे में भी, 34। [1120.]
  • पूरे दिन शीतानुभूति, जो 7 P.M. तक रहती है, 11।
  • दोपहर में शीतानुभूति (दूसरे दिन), 40।
  • दोपहर में खुली हवा में शीतानुभूति (पहले दिन), 25।
  • कमरे में शीतानुभूति, उसके शीघ्र बाद चक्कर, 28।
  • शीतानुभूति और गर्मी बारी-बारी से, 65।
  • शीतानुभूति और गर्मी बारी-बारी से, 17।
  • रात में सिर की गर्मी के साथ शीतानुभूति (दूसरे दिन), 32।
  • लगातार शीतानुभूति (दूसरे दिन), 32।
  • दोपहर में लगातार शीतानुभूति (दूसरे दिन), 32।
  • दोपहर में भोजन के बाद ठंडक (तीसरे दिन), 10। [1130.]
  • सारे शरीर में ठंडक, 77, 78।
  • क्रमशः बढ़ती ठंडक, 75।
  • ठंडक की अनुभूति, 45।
  • शाम को ठंडक की अनुभूति, जो गर्म ओढ़ने से दूर हो जाती है, किंतु बिस्तर पर जाने पर दाँत किटकिटाने वाली शीतानुभूति के रूप में लौटती है; चुपचाप लेटे रहने पर थोड़ी देर में लुप्त हो जाती है, पर हिलने पर उसके फिर लौटने की आशंका होती है, 35।
  • पूरे शरीर में गर्मी का सामान्य अभाव, बिस्तर में भी, 34।
  • सिर की त्वचा में शीतानुभूति, 45।
  • घुटनों में शीतानुभूति, 34।
  • उदर में, विशेषतः आमाशय में, दर्द और दुर्बलता सहित हल्की ठंडी अनुभूति, 51।
  • पीठ में कंपकंपी (दूसरे दिन), 33।
  • सभी अंगों में कंपकंपी, 51। [1140.]
  • पीठ से नीचे की ओर बार-बार कंपकंपी (पंद्रह मिनट बाद), 3।
  • नाक, गाल और पैरों के तलवे ठंडे, 20।
  • हाथ-पैरों का तापमान कम, 80।
  • हाथों और टाँगों की त्वचा में उल्लेखनीय ठंडक, बिस्तर में भी, 34।
  • *हाथ-पैर ठंडे, 17, 19 ; (चार घंटे बाद), 82 , आदि।
  • पैर और हाथ ठंडे, 52 ; (दूसरे दिन), 33।
  • हाथ, पैर और माथा ठंडे, 48।
  • उँगलियाँ ठंडी (दूसरे दिन), 25।
  • उँगलियाँ ठंडी और झुनझुनी-सी महसूस होती हैं, 71।
  • पैर ठंडे, 67। [1150.]
  • दोपहर में पैर ठंडे (दूसरे दिन), 40।
  • गर्मी।
  • रात में शरीर में गर्मी, 55।
  • रात में शुष्क गर्मी, 32।
  • त्वचा की शुष्क गर्मी, 51।
  • कुछ शुष्क गर्मी, 28।
  • त्वचा गर्म, 85।
  • त्वचा गर्म, 76।
  • दोपहर में बार-बार आने वाली गर्मी की लहरें (तीन से चवालीस दिनों तक), 46।
  • आमाशय-संबंधी विकारों के साथ ज्वर, 12।
  • बिस्तर में छाती और सिर की त्वचा में रक्त का झोंका दौड़ने जैसी गर्मी की अनुभूति (शीघ्र), 34। [1160.]
  • कमर में गर्मी की अनुभूति, जो मलाशय तक फैलती है (ग्यारह घंटे बाद), 39।
  • बैठे समय कमर के पार्श्व में गर्मी और धड़कन की अनुभूति, 27।
  • गर्मी, जो सिरदर्द में बदल जाती है, 39।
  • सिर के अगले भाग में गर्मी, 29।
  • सिर में गर्मी की लहरें (पंद्रह मिनट बाद), 3।
  • चेहरे में अत्यधिक गर्मी, 41।
  • गर्म कमरे में रीढ़ के साथ ऊपर चढ़ती गर्मी की लहरें, 27।
  • हाथों और पैरों में गर्मी की लहरों की अनुभूति, 73।
  • हथेलियाँ गर्म (दूसरे दिन), 25।
  • अधिजठर-गर्त के निकट, दाहिनी ओर बाहर से जलन, 52।
  • पसीना। [1170.]
  • त्वचा से स्राव बढ़ा हुआ, 69।
  • पसीना, 55।
  • रात में हल्का पसीना (पहले दिन), 33।
  • आधी रात के बाद जागने पर हल्का पसीना (पहले दिन), 32।
  • सारे शरीर में हल्की खट्टी गंध वाला पसीना (पहली रात), 25।
  • पतले कपड़े पहने होने पर भी बहुत आसानी से प्रचुर पसीना, 11।
  • अत्यंत खट्टी गंध वाले बहुत प्रचुर पसीने (ग्यारह घंटे बाद), 83।
  • त्वचा चिपचिपे पसीने और नीले धब्बों से ढकी, विशेषतः रीढ़ के साथ, 84।
  • खट्टी गंध वाला पसीना, 14।
  • चलने पर आसानी से पसीना, 10। [1180.]
  • पूरी रात हल्का पसीना, 11 ; (पहली रात), 10।
  • Colchicum से त्वचा का स्वेदन निरंतर बढ़ा रहता था; वह प्रायः प्रचुर पसीने की मात्रा तक पहुँच जाता था, 22।
  • त्वचा नम, चिपचिपी और हैजे की भाँति ठंडी, 80।
  • स्वेदन दबा हुआ, 51।
  • त्वचा शुष्क, गर्म और सीसे जैसे रंग की, 20।
  • त्वचा शुष्क, शरीर गर्म, 19।
  • माथा चिपचिपे पसीने से ढका, 19।
  • चेहरा पसीने से ढका (छह सप्ताह बाद), 20।

परिस्थितियाँ

  • वृद्धि।
  • ( सुबह ), सिर में भ्रम; उठने के बाद, विशेषतः सिर हिलाने पर, सिर में अनुभूति; जागने पर दाएँ माथे में दर्द; जीभ पर मैल ; गले में खराश आदि; जागने पर मिचली आदि, आमाशय में दर्द; जागने पर ऊपरी उदर में दबाव; अतिसार-जैसा मल; बिस्तर में मूत्रमार्ग में जलन; बिस्तर में बाईं छाती में चुभनें; जागने पर हृदय-स्पंदन; जागने पर कमर में खिंचाव; कमर में कुचले जाने जैसी अनुभूति; अंगों की दुर्बलता; अंग थके हुए लगते हैं; कंधों की मांसपेशियों और आँखों में खिंचाव; दुर्बलता; जागने पर थकावट; उठने पर थकावट।
  • ( पूर्वाह्न ), डकारें।
  • ( दोपहर ), ललाटीय सिरदर्द; शाम की ओर, माथे से पश्चकपाल की ओर सिरदर्द; भूख; प्यास; मलत्याग की हाजत; श्लेष्मायुक्त मल; हृदय-पूर्व क्षेत्र में दबाव; हृदय-स्पंदन; त्रिकास्थि में दबाव, विशेषतः भोजन के तुरंत बाद; पूरे शरीर में अनुभूति; उनींदापन; शीतानुभूति ; भोजन के बाद ठंडक; पैर ठंडे; गर्मी की लहरें।
  • ( शाम ), सिरदर्द ; कनपटी में सिरदर्द; कनपटी में दबाव; नाक से रक्तस्राव; अत्यधिक भूख; चलते समय आमाशय में दर्द; प्लीहा में चुभनें; उदर में दर्द; खाने के बाद छाती में अनुभूति; बिस्तर में जाँघ में खिंचाव; बिस्तर में जाँघ के मध्य भाग में फाड़ता दर्द; बिस्तर में घुटने का जोड़ दर्दनाक; बिस्तर में घुटने के ऊपर दर्द; पूरे शरीर में दर्द; मरोड़ आदि; पैर की उँगलियों में; दर्द असह्य हो जाते हैं; ठंडक की अनुभूति।
  • ( रात ), रात आरंभ होने से भोर तक सभी प्रकार के दर्द; प्रलाप; विचारों का तीव्र प्रवाह; उदरशूल आदि; लगभग 10 बजे बाईं छाती में दर्द; बाईं करवट लेटने पर हृदय में परिपूर्णता आदि; सुनाई देने वाला हृदय-स्पंदन; त्रिकास्थि में दर्द; सभी अंगों में बेचैनी; इधर-उधर हिलने पर नितंबास्थि में दर्द; नितंब-प्रदेश में फाड़ता दर्द; सुबह की ओर कामोत्तेजक स्वप्न; शीतानुभूति आदि; शरीर में गर्मी; शुष्क गर्मी; पसीना।
  • ( आधी रात के बाद ), जागने के बाद हल्का पसीना।
  • ( खुली हवा ), अश्रुस्राव।
  • ( आगे झुकने पर ), पश्चकपाल में भारीपन।
  • ( सिर पीछे झुकाने पर ), पश्चकपाल में सिरदर्द।
  • ( नाक साफ करने पर ), बाईं छाती में दर्द।
  • ( कॉफी ), वृद्धि।
  • ( भोजन के दौरान ), मिचली।
  • ( भोजन के बाद ), मिचली; निचले उदर में क्षोभ; लेई-जैसा मल; जम्हाई आदि।
  • ( खाने के बाद ), आँख के ऊपर सिरदर्द; मिचली; उदर में परिपूर्णता; कामेच्छा।
  • ( सीधी अवस्था ), मिचली; आमाशय में रेंगने की अनुभूति।
  • ( शांत लेटने पर ), पीठ-दर्द।
  • ( मानसिक परिश्रम ), लक्षणों में अत्यधिक वृद्धि।
  • ( गति ), पश्चकपाल में भारीपन; आँख के ऊपर दर्द; वमन; कमर में खिंचाव; विशेषतः हाथ मोड़ने पर करभास्थि-प्रदेश में दर्द।
  • ( दबाव ), प्लीहा-प्रदेश में दर्द; ऊपरी उदर में अनुभूति।
  • ( आँखें ऊपर उठाने पर ), पश्चकपाल में सिरदर्द।
  • ( उठने पर ), चक्कर।
  • ( बिस्तर में उठकर बैठने पर ), लक्षण।
  • ( खुली हवा में चलने के बाद कमरे में जाने पर ), सिर में दर्द।
  • ( बैठे समय ), गर्मी की अनुभूति आदि।
  • ( बहुत देर बैठने पर ), कंधे की पत्ती में दर्द।
  • ( निश्चल बैठे रहने पर ), ग्रीवा की धमनियों में धड़कन।
  • ( चलने के बाद बैठने पर ), चक्कर।
  • ( सोने जाते समय ), हृदय-स्पंदन।
  • ( खड़े रहने पर ), मिचली आदि; अंतिम कशेरुकाओं और त्रिकास्थि के संधिस्थल पर दर्द।
  • ( सीढ़ियाँ चढ़ने पर ), घुटना टूटा हुआ-सा लगता है।
  • ( मलत्याग के बाद ), मूर्च्छा-जैसी दुर्बलता; थकावट आदि।
  • ( चलने पर ), अधिजठर-प्रदेश में परिपूर्णता आदि; छाती में दबाव; अंतिम कशेरुकाओं और त्रिकास्थि के संधिस्थल पर दर्द।
  • ( लंबी पैदल चाल के दौरान ), घुटने के मोड़ में अनुभूति।
  • ( हवा में चलते समय ), माथे में भ्रम।
  • ( काम ), विशेषतः पढ़ने या लिखने से, बहुत अधिक वृद्धि।
  • शमन।
  • ( रात ), ऊपरी बाँह की अनुभूति।
  • ( खुली हवा ), सामान्य राहत; आँखों के ऊपर सिरदर्द।
  • ( ठंड ), ललाटीय उभार में दर्द।
  • ( डकार ), उदर में अनुभूति; उदरशूल।
  • ( गति ), पीठ-दर्द; विशेषतः खुली हवा में, पूरे शरीर की अनुभूति।
  • ( दबाव ), ललाटीय उभार में दर्द।
  • ( विश्राम ), ऊपरी उदर में अनुभूति।
  • ( बिस्तर में विश्राम ), माथे में दर्द; कनपटी में सिरदर्द; शीतानुभूति।
  • ( कमरे में ), माथे का भ्रम।
  • ( हाथ से मलने पर ), उदर में अनुभूति।
  • ( नींद ), सिरदर्द।
  • ( वमन ), मिचली।
  • ( इधर-उधर चलने पर ), हृदय-पूर्व क्षेत्र में दबाव आदि।
  • ( गर्मी ), माथे में दर्द।

परिशिष्ट: COLCHICUM। प्रामाणिक स्रोत।

86 , J. Y. Clark, M.D., Am. Med. Rec., vol. i, 1818, p. 369, John R. Peckworth ने टिंचर की 100 बूँदें लीं; 87 , ibid., लेखक ने 100 बूँदें लीं; 88 , Thos. Kennard, M.D., Am. J. of M. S., 1857 (1), p. 69, छप्पन वर्ष की एक महिला ने बारह घंटों में एक औंस Colch. मद्य लिया; 89 , Dr. Fifield, Bost. Med. and Surg. Journ., vol. lvi, 1857, p. 78, अट्ठाईस वर्ष के एक पुरुष ने, जो गठिया से पीड़ित था, आधा औंस Colch. मद्य लिया; 90 , W. A. Hammond, M.D., Am. Med. Monthly, Feb., 1861, p. 83, ने 8 A.M., 2 और 10 P.M. पर 1 fluid drachm लिया (पहले दिन); 1 1/2 fluid drachms तीन बार (दूसरे और तीसरे दिन); 1/2 drachm (चौथे दिन); 1 1/2 drachms (पाँचवें दिन); 91 , ibid., तेईस वर्ष के एक पुरुष ने 1 drachm टिंचर तीन बार लिया (पहले दिन); 1 1/2 drachms तीन बार (दूसरे दिन); 92 , John H. Garner, M.D., Canada Lancet, vol. iii, 1871, p. 307, R. H. ने लगभग एक पिंट टिंचर पी लिया; 93 , ibid., J. M. J. ने उतनी ही मात्रा ली; 94 , ibid. T. H. ने थोड़ी मात्रा ली; 95 , W. E. Porter, Med. Times and Gaz., 1874 (2), 723, चार और दो वर्ष के दो बच्चों में विषाक्तता; 96 , Canada Pharm. Journ. (Pacif. M. and S. Journ., April, 1874, p. 572), सत्रह व्यक्तियों के समूह में प्रत्येक ने एक या दो औंस से लेकर एक पिंट तक मद्य पिया, सात की मृत्यु हो गई; 97 , J. Pierre, Comptes Rendus, vol. lxxix, p. 633 (Pharm. Journ. and Trans., Oct., 1864, p. 325), लेखक ने पूर्णतः खिले हुए कुछ फूल तोड़े, बाद में किसी भी संपर्क से सावधानीपूर्वक बचते हुए फूलों के एक बड़े झुरमुट के ऊपर अपना हाथ फैलाया, और वही परिणाम हुआ।

मन

  • कभी-कभी बड़बड़ाया और उन्मत्त होकर प्रलाप किया, किंतु यह केवल कुछ मिनटों तक रहा, 93।
  • संज्ञाहीन अवस्था, 92।

सिर। [1190.]

  • तीव्र सिरदर्द, 92।

आँख

  • आँखें लाल और पानी से भरी, तथा पुतलियाँ फैली हुईं, 92।

कान

  • कानों में बहुत अधिक आवाज़ें, 92।

चेहरा

  • मुखाकृति का भाव चिंतित और क्षीण, 92।
  • कभी-कभी गाल की हड्डियों पर क्षय-ज्वर जैसी लाली, 92।

मुँह

  • जीभ बीच में शुष्क और भूरी तथा किनारों पर लाल, 92।

आमाशय

  • अत्यधिक प्यास, 92, 95।
  • मिचली, 94।
  • उबकाई, 95।
  • पैंतालीस मिनट से डेढ़ घंटे के भीतर वमन, 96। [1200.]
  • वमनित पदार्थ पहले पित्तयुक्त और फिर चावल के माड़ जैसा था, 96।

उदर

  • उदर पर अत्यधिक स्पर्श-वेदना तथा बीच-बीच में होने वाले तीव्र दर्द, जो ठीक उदरावरणशोथ जैसे थे, 92।
  • मरोड़दार उदरशूल, 95।

मलाशय और गुदा

  • मलत्याग की वेदनापूर्ण निष्फल हाजत, 95।

मल

  • बार-बार दस्त, 96।
  • तीव्र अतिसार (दूसरे दिन), 91।
  • तीव्र रूप से दस्त और वमन हुए, 92।
  • बड़ी मात्रा लेने पर पौन घंटे से डेढ़ घंटे के भीतर दस्त; मात्रा कम होने पर अधिक देर से, 96।

मूत्र-अंग

  • प्रयोग आरंभ होने से ठीक पहले के तीन दिनों में मूत्र की औसत दैनिक मात्रा 1425 घन सेंटीमीटर और sp. gr. 1021.73 था। ठोस पदार्थ की औसत मात्रा 64.28 ग्राम थी; इसमें 30.18 ग्राम अकार्बनिक और 34.10 ग्राम कार्बनिक पदार्थ था। प्रत्येक चौबीस घंटे की अवधि में उत्सर्जित यूरिक अम्ल की औसत मात्रा 0.77 ग्राम थी। उत्सर्जित मूत्र की मात्रा 1685 घन सेंटीमीटर, sp. gr. 1021.5; ठोस पदार्थों की कुल मात्रा 70.15 ग्राम, जिसमें 30.90 ग्राम अकार्बनिक और 39.25 ग्राम कार्बनिक पदार्थ; यूरिक अम्ल की मात्रा 0.81 ग्राम (पहला दिन)। मूत्र की मात्रा 1720 cc., sp. gr. 1020.87; कुल ठोस पदार्थ 75.29 ग्राम; अकार्बनिक ठोस पदार्थ 32.44 ग्राम; कार्बनिक ठोस पदार्थ 42.85 ग्राम; यूरिक अम्ल 0.69 ग्राम (दूसरा दिन)। मूत्र की मात्रा 1784 cc.; sp. gr. 1022.57; कुल ठोस पदार्थ 80.13 ग्राम; अकार्बनिक लवण 35.11 ग्राम; कार्बनिक ठोस पदार्थ 45.03 ग्राम; यूरिक अम्ल 0.82 ग्राम (तीसरा दिन)। मूत्र की मात्रा 1540 c.c.; sp. gr. 1023.17; कुल ठोस पदार्थ 69.23 ग्राम; अकार्बनिक ठोस पदार्थ 31.09; कार्बनिक ठोस पदार्थ 38.14; यूरिक अम्ल 0.78 ग्राम (चौथा दिन)। मूत्र की मात्रा 1698 cc.; sp. gr. 1023.68; कुल ठोस पदार्थ 76.14 ग्राम; अकार्बनिक ठोस पदार्थ 32.36 ग्राम; कार्बनिक ठोस पदार्थ 42.88 ग्राम; यूरिक अम्ल 0.76 ग्राम (पाँचवाँ दिन), 90।
  • मूत्र की औसत दैनिक मात्रा 989 cc.; sp. gr. 1020.14; कुल ठोस पदार्थ 51.20 ग्राम; अकार्बनिक ठोस पदार्थ 22.45 ग्राम; कार्बनिक ठोस पदार्थ 28.75 ग्राम; यूरिक अम्ल 0.47 ग्राम (प्रयोग से पूर्व); मूत्र की मात्रा 1021 cc.; sp. gr. 1024.18; कुल ठोस पदार्थ 63.25 ग्राम। अकार्बनिक ठोस पदार्थ 23.57 ग्राम; कार्बनिक ठोस पदार्थ 40.68 ग्राम; यूरिक अम्ल 0.59 ग्राम (पहला दिन); मूत्र की मात्रा 8875 cc.; sp. gr. 1026.11; कुल ठोस पदार्थ 60.25 ग्राम; अकार्बनिक ठोस पदार्थ 20.38 ग्राम; कार्बनिक ठोस पदार्थ 39.87 ग्राम; यूरिक अम्ल 0.51 ग्राम (दूसरा दिन), 91।

श्वसन-अंग। [1210.]

  • नियमित अंतरालों पर तीव्र रूप से खाँसा, 92।
  • बलगम में रक्त, 92।
  • श्वास तेज़; भारी, लगभग खर्राटेदार (कुछ घंटों के बाद), 92।

छाती

  • छाती में अत्यधिक भराव, 92।

नाड़ी

  • नाड़ी 80 (प्रयोग से पूर्व); 78 (पाँच और दस मिनट में); 76 (पंद्रह और बीस मिनट में); 78 (पच्चीस और तीस मिनट में); 80 (पैंतीस, चालीस और पैंतालीस मिनट में); 78 (पचास मिनट में); 76 (पचपन मिनट में); 72 (साठ मिनट में); 70 (पैंसठ मिनट में); 68 (सत्तर और पचहत्तर मिनट में); 72 (अस्सी और पंचानवे मिनट में); 70 (सौ मिनट में); 72 (एक सौ पाँच, एक सौ दस और एक सौ पंद्रह मिनट में); 76 (एक सौ बीस मिनट में); 80 (एक सौ अस्सी और दो सौ चालीस मिनट में), 86।
  • औषधि लेने के पाँच मिनट बाद उसकी नाड़ी बल और आवृत्ति, दोनों में काफी घट गई; पैंतीस मिनट में फीके रंग के मूत्र का प्रचुर उत्सर्जन हुआ और उसकी नाड़ी बहुत बढ़ गई; पचास मिनट में बहुत नींद आई, नाड़ी फिर घट गई; सत्तर मिनट में उसकी मानसिक क्षमताएँ अत्यधिक उद्दीप्त हो गईं, नाड़ी बहुत धीमी और कोमल थी; नब्बे मिनट में वह सभी असामान्य अनुभूतियों से पूर्णतः मुक्त था, नाड़ी कुछ बढ़ गई थी; एक सौ अस्सी मिनट में नाड़ी बिल्कुल सामान्य थी, 86।
  • नाड़ी 70 (प्रयोग से पूर्व); 52 (पाँच मिनट में); 48 (दस मिनट में); 46 (पंद्रह मिनट में); 42 (बीस और पच्चीस मिनट में); 48 (तीस मिनट में); 43 (पैंतीस मिनट में); 45 (चालीस और पैंतालीस मिनट में); 39 (पचास मिनट में); 43 (पचपन मिनट में); 46 (साठ मिनट में); 50 (पैंसठ, सत्तर और पचहत्तर मिनट में); 45 (अस्सी, पचासी और नब्बे मिनट में); 47 (पंचानवे मिनट में); 50 (सौ, एक सौ पाँच, एक सौ दस, एक सौ पंद्रह, एक सौ बीस और एक सौ पच्चीस मिनट में); 53 (एक सौ तीस मिनट में); 55 (एक सौ पैंतीस मिनट में); 57 (एक सौ चालीस मिनट में); 60 (एक सौ पैंतालीस, एक सौ पचास, एक सौ पचपन, एक सौ साठ और एक सौ पैंसठ मिनट में); 65 (दो सौ मिनट में); 70 (दो सौ पचहत्तर और तीन सौ मिनट में), 87।
  • औषधि लेने के पाँच मिनट बाद मेरी नाड़ी बल और आवृत्ति, दोनों में घट गई; पंद्रह मिनट में मैंने अपने चेहरे पर गर्मी की काफी लहरें दौड़ती हुई अनुभव कीं, जिनके बाद काफी चक्कर आया; पचास मिनट में मेरी नाड़ी और भी घट गई; पैंसठ मिनट में मुझे कुछ नींद आ रही थी; और पचहत्तर मिनट में मुझे बहुत नींद आ रही थी, जिसके साथ हल्का स्वेदस्राव था; एक सौ तीस मिनट में मेरी नाड़ी की आवृत्ति बढ़ने लगी, किंतु उसका बल घटा रहा; और दो सौ पैंतीस मिनट में वह बल और आवृत्ति, दोनों की दृष्टि से सामान्य हो गई, 57।
  • नाड़ी 160; दुर्बल होती गई (कुछ घंटों के बाद), 92।

ऊपरी अंग

  • बाँहों में सुन्नपन, 97। [1220.]
  • कुछ ही क्षणों में उसकी उँगलियों का रंग बदल गया और उनमें आरंभिक विघटन की अवस्था वाले शव का विशिष्ट नीलाभ-हरित वर्ण आ गया। लगभग दस सेकंड बाद त्वचा का रंग वापस आ गया, 97।
  • उँगलियों में ऐंठन, 96।

सामान्य लक्षण

  • आक्षेप, 95।
  • अत्यधिक निढालपन, अत्यधिक मिचली और वमन से पीड़ित, साथ में हल्के दस्त, कंठ-द्वार में गर्मी और जलन, असाधारण प्यास, ठंडी और चिपचिपी त्वचा, दुर्बल नाड़ी, नेत्रकोटर के ऊपर प्रचंड दर्द और कष्टदायक आमाशय-शूल तथा अत्यंत चिंतित मुख-मुद्रा, 88।
  • पीला और ठंडा, लगातार वमन और दस्त, तथा अत्यधिक प्यास और अधिजठर प्रदेश में दर्द की शिकायत, 89।
  • लक्षण मुख्यतः तीव्र वमन-दस्त वाले आमाशयांत्रशोथ के थे, 96।
  • दुर्बलता, 94।
  • अत्यधिक थका-हारा, 92।
  • लक्षण समान, किंतु अधिक हल्के थे; सिरदर्द इसका अपवाद था, जिसे उसने अत्यंत तीव्र बताया, 93।

नींद

  • अनिद्रा, 96।

ज्वर। [1230.]

  • कँपकँपी, 95।
  • शीतलता, 95।
  • पूरा शरीर ठंडा और चिपचिपा, 92।
  • पैर और हाथ ठंडे, 92।
  • माथे पर ठंडा पसीना, 92।

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