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Adolph von Lippe द्वारा — Materia Medica के प्रमुख लक्षण और लाल रेखा लक्षण

चिकित्सकों और विद्यार्थियों के लिए ऐतिहासिक संदर्भ। नीचे दिए गए कथन उल्लिखित लेखक की होम्योपैथिक शिक्षाओं को दर्शाते हैं और उपचार की प्रभावशीलता को प्रमाणित नहीं करते। यह पाठ चिकित्सकीय सलाह नहीं है और इसे उचित निदान या देखभाल का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।

सामान्य नाम: सर्पमूल।

वृद्ध व्यक्तियों में विशेष रूप से उपयोगी, किंतु अन्य व्यक्तियों में भी अच्छी तरह कार्य करती है (N.)।

अंगों को तानने की प्रवृत्ति के साथ अत्यधिक शारीरिक और मानसिक दुर्बलता; साथ में सिर में भारीपन और मंदता (Rhus-T.)।

अत्यधिक कमजोरी, जो छाती से उत्पन्न और छाती में ही स्थित प्रतीत होती है।

बहुत-से लक्षण, विशेषकर छाती के लक्षण, विश्राम के समय बढ़ते हैं और खुली हवा में चलने से घटते हैं।

खुली हवा में चलते समय मूर्छा (Lycps., Sep.; बंद कमरे में रहते समय—Acon., Asaf., Ipec., Lach., Tab.)।

विषैले जीवों के काटने से हुए घाव (Ars., Led.)।

श्लेष्मकलाओं के रोग (Bry., Carb-V., Hydr., Nat-S., Puls.)।

श्लेष्मिक कंठशोथ।

श्वसनीशोथ (Ant-T., Bry., Hep., Kali-C., Kali-M., Lyc., Nat-S., Phos., Rhus-T., Sil.)।

फेफड़ों की सूजन (Ant-T., Bry., Chel., Ferr-P., Lyc., Phos.)।

स्वर-भंग (Arg-N., Calc., Carb-V.)।

ग्रसनी में सूखापन और खुरचने-जैसी अनुभूति (Aesc., Nux-V.)।

गला इतना सूखा कि बोलने पर दर्द होता है (Phos.) (D.)।

छाती में एल्ब्यूमिनयुक्त श्लेष्म का अत्यधिक संचय, जिसका कफ के रूप में निकलना कठिन होता है (Ant-T., Kali-M.) (D.)।

बहुत अधिक घरघराहट, साँस में सीटी की आवाज और साँस लेने में कठिनाई (Ant-T., Carb-V., Nat-S.) (N.)।

खाँसी: निरंतर; गला कसने वाली; दम घोंटने वाली; छींक आने पर समाप्त होती है; दाईं करवट लेटने से अथवा शाम को अधिक होती है (B.)।

इतनी छींकें आती हैं कि चक्कर आने लगता है (B.)।

लगातार मितली (Ant-T., Ipec., Tab.)।

सिर में मंदता, साथ में नेत्रों में दबाव और कमजोरी (Nat-M.) (N.)।

ऐसा अनुभव मानो वक्ष बहुत संकरा हो गया हो, साथ में उसे फैलाने की निरंतर इच्छा (Cact., Ign., Phos.) (N.)।

एम्फिसीमा (Am-C., Ant-Ars., Ant-T., Hep.) (Bl.)।

खाँसी से पहले अथवा उसके बाद छाती में तीव्र जलन (G.)।

छाती पर कुचल देने वाला भारी बोझ रखे होने जैसी अनुभूति (B.)।

बाँहें, विशेषकर बाईं बाँह, हिलाने पर छाती की दीवारों में दुखन; साथ में छाती के भीतर श्लेष्म की बहुत अधिक घरघराहट (Be.)।

ब्रॉन्किएक्टेसिस (Caps., Chin., Sang.) (Bl.)।

अत्यधिक अशक्तता के साथ निमोनिया (Ant-T., Carb-V., Lyc.) (Bt.)।

फुफ्फुसावरण के उपतीव्र अथवा जीर्ण स्रावों तथा प्रतिश्यायी प्ल्यूरो-निमोनिया में उपयोगी, जहाँ Bry. असफल रही हो (Ha.)।

हृदय के आसपास बरमा चलने जैसा दर्द (Bc.)।

रक्त-मिश्रित अथवा एल्ब्यूमिनयुक्त कफ (B.)।

स्वरतंत्रियों का आंशिक पक्षाघात (Caust., Phos.) (Br.)।

मासिक धर्म समय से बहुत पहले आ जाता है (Calc., Ferr., Mill., Sab.)।

प्राथमिक अथवा द्वितीयक एल्ब्यूमिनमेह के बाद होने वाले हाइड्रोथोरैक्स, जलोदर और सर्वांग शोफ में इसे अत्यधिक सफलता के साथ दिया गया है (Ha.)।

कंपकंपी की अनुभूति, किंतु कोई कंपन दिखाई नहीं देता (Sulph-Ac.) (Bt.)।

पानी-जैसे दस्त, साथ में आँतों में मरोड़दार दर्द, मितली और वमन (Coloc., Dios., Nux-V.) (Bt.)।

पानी-जैसा मल, जो गुदा से फुहार की तरह निकलता है (Crot-T., Grat., Thuj.) (C.)।

मूत्र-स्राव कम हो जाता है (Apis, Berb., Canth., Dig., Eup-P., Ferr-P., Gels., Lyc., Merc.)

आरंभ में मूत्र में श्लेष्मिक तंतु मिले रहते हैं; बाद में वह गाढ़ा और धुँधला हो जाता है (J.)।

बार-बार मूत्रत्याग; मूत्र में हरिताभ छटा और उससे धुँधला अवसाद जमता है (Hn.)।

कमर के स्तर पर बाईं पार्श्व में कुतरने जैसा दर्द।

आइराइटिस और स्वच्छपटल पर धब्बे (Hg.)।

पेशीय नेत्र-दुर्बलता और काचाभ द्रव की अपारदर्शिताओं में उपयोगी है (Bl.)।

वस्तुएँ छाया पड़ी हुई दिखाई देती हैं (Chin., Cycl., Gels., Merc., Phos., Puls., Sulph., Zinc.) (Bl.)।

दोहरा दिखाई देना (Bell., Gels., Stram.) (Bl.)।

नेत्रगोलक फैले हुए प्रतीत होते हैं (B.)।

पढ़ते अथवा लिखते समय नेत्रों में जलन (Cob., Lil-T., Nat-Ars., Nat-C., Nat-M., Rhod., Zinc.) (C.)।

ब्लेफराइटिस (Bor., Caust., Graph., Petr.) (C.)।

बरौनियाँ कठोर श्लेष्म से पूरी तरह लदी रहती हैं (C.)।

चेहरे के बाएँ आधे भाग में पक्षाघात-जैसी अनुभूति (Rhus-T.) (C.)।

अधिजठर-गर्त के नीचे दबाव (C.)।

पाचन-विकार (Carb-V., Chin., Ferr., Graph., Hep., Iris, Kali-C., Lyc., Nux-M., Nux-V., Puls.) (C.)।

वृद्धि: शाम को; विश्राम के समय; किसी वस्तु को लंबे समय तक स्थिर दृष्टि से देखने पर; खुली हवा में; ठंडी हवा भीतर लेने से; दबाव से; स्पर्श से; और रात में।

राहत: गति से; सिर पीछे की ओर झुकाने से; और पसीना आने से।

संबंध: प्रतिविष: Arn., Bell., Bry., और Camph.

इसके बाद उपयुक्त औषधियाँ: Calc., Lyc., Phos., और Sulph.

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